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Kushinagar News: सामूहिकता की भावना से होगी लोक संस्कृति की रक्षा
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तुर्कपट्टी। विश्व एक अजीब संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश में फांसीवादी संस्कृति मजबूत हो रही है। भारत में विश्व गुरु की भावना मजबूत हो गई। लोक संस्कृति की रक्षा सामूहिकता की भावना से ही सम्भव होगी। इसके लिए एक संयुक्त मोर्चा का जीवंत होना जरूरी है।
ये बातें नागपुर महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक डॉ. सुरेश खैरनवार ने कही। वे लोकरंग के दूसरे दिन रविवार को लोक संस्कृति का भविष्य बनाम भविष्य की लोक संस्कृति विषयक गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित किया। उन्होंने युवाओं को लोकसंस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए प्रेरित किया।
अध्यक्षीय संबोधन में अलवर राजस्थान के वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर शंभू गुप्ता ने कहा कि लोक संस्कृति को बचाने के लिए कबीर की सहजता जरूरी है। प्रतिरोध, सहजता व सामूहिकता लोक संस्कृति की प्रमुख विशेषता है। आंदोलनधर्मी होकर इसकी रक्षा नहीं की जा सकती। संस्कृति की रक्षा के लिए मध्य वर्ग को आगे आना होगा। किसी भी क्रांति का अगुवा मध्य वर्ग से निकलता है। युवाओं को अतीत से भविष्य की सीख लेनी चाहिए। रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश कुशवाहा ने कहा कि लोक संस्कृति में मिथकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मिथक इतिहास से मजबूत होता है। परिवर्तन की क्रांति में लोक संस्कृति का भविष्य है। कोलकाता विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशा सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति का आधुनिकीकरण होना चाहिए।
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आत्मसात के गुण को अपनाना जरूरी है। इसके बाद लोक संस्कृति जन संस्कृति बन जाएगी। गोष्ठी को साउथ अफ्रीका डरबन के भोजपुरी गायक केम चानलाल, पूर्व संपादक चंद्रभूषण, आदिवासी लेखिका वंदन टेटे, डॉ. मोतीलाल, बीएचयू के डॉ. महेंद्र कुशवाहा, कहानीकार दीपक शर्मा, छत्तीसगढ़ की डॉ. अपर्णा कुमारी, डॉ. मोतीलाल आदि ने संबोधित किए। गोष्ठी का संचालन प्रोफेसर रामजी यादव ने की। इसके पूर्व आयोजक पूर्व आरटीओ सुभाष चंद्र कुशवाहा ने विषय का प्रवर्तन करते हुए लोक संस्कृति पर प्रकाश डाला।
इस दौरान दीनानाथ मौर्य, प्रोफेसर अनिल कुमार सिंह, डॉ. शिवानंद, बृजेश यादव, रामवृक्ष कुशवाहा, रामध्यान प्रसाद, इजरायल अंसारी, जोहान बाबू, नितांत सिंह, राम सुरेश आदि मौजूद रहे।
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ये बातें नागपुर महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक डॉ. सुरेश खैरनवार ने कही। वे लोकरंग के दूसरे दिन रविवार को लोक संस्कृति का भविष्य बनाम भविष्य की लोक संस्कृति विषयक गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित किया। उन्होंने युवाओं को लोकसंस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए प्रेरित किया।
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अध्यक्षीय संबोधन में अलवर राजस्थान के वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर शंभू गुप्ता ने कहा कि लोक संस्कृति को बचाने के लिए कबीर की सहजता जरूरी है। प्रतिरोध, सहजता व सामूहिकता लोक संस्कृति की प्रमुख विशेषता है। आंदोलनधर्मी होकर इसकी रक्षा नहीं की जा सकती। संस्कृति की रक्षा के लिए मध्य वर्ग को आगे आना होगा। किसी भी क्रांति का अगुवा मध्य वर्ग से निकलता है। युवाओं को अतीत से भविष्य की सीख लेनी चाहिए। रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश कुशवाहा ने कहा कि लोक संस्कृति में मिथकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मिथक इतिहास से मजबूत होता है। परिवर्तन की क्रांति में लोक संस्कृति का भविष्य है। कोलकाता विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशा सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति का आधुनिकीकरण होना चाहिए।
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आत्मसात के गुण को अपनाना जरूरी है। इसके बाद लोक संस्कृति जन संस्कृति बन जाएगी। गोष्ठी को साउथ अफ्रीका डरबन के भोजपुरी गायक केम चानलाल, पूर्व संपादक चंद्रभूषण, आदिवासी लेखिका वंदन टेटे, डॉ. मोतीलाल, बीएचयू के डॉ. महेंद्र कुशवाहा, कहानीकार दीपक शर्मा, छत्तीसगढ़ की डॉ. अपर्णा कुमारी, डॉ. मोतीलाल आदि ने संबोधित किए। गोष्ठी का संचालन प्रोफेसर रामजी यादव ने की। इसके पूर्व आयोजक पूर्व आरटीओ सुभाष चंद्र कुशवाहा ने विषय का प्रवर्तन करते हुए लोक संस्कृति पर प्रकाश डाला।
इस दौरान दीनानाथ मौर्य, प्रोफेसर अनिल कुमार सिंह, डॉ. शिवानंद, बृजेश यादव, रामवृक्ष कुशवाहा, रामध्यान प्रसाद, इजरायल अंसारी, जोहान बाबू, नितांत सिंह, राम सुरेश आदि मौजूद रहे।