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कोई दो आंसू बहाए क्यों, दो फूल चढ़ाए क्यों
विपिन त्रिवेदी, कानपुर
Updated Mon, 27 Jul 2015 01:47 AM IST
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‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’...यह शेर सुनकर सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है पर अफसोस, ये नगमे-तराने सिर्फ बजाए ही जाते हैं, इन पर शिद्दत से अमल नहीं होता।
रविवार को पूरा देश जब कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा था, अपना शहर शहीद को भूला बैठा रहा। कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए नौबस्ता के सूबेदार विजय पाल सिंह यादव के घर कोई दो फूल चढ़ाने भी नहीं गया। शहर ही नहीं, शासन और सरकार भी शहीद को भूल गए।
शहीद की पत्नी को दिया गया पेट्रोल पंप सालों से सीज है। आज शहीद की पत्नी किराए के घर पर रहने को मजबूर है।
मूलरूप से फतेहपुर के जाहूपुर गांव निवासी रामसागर और सुखदेई के पुत्र विजय पाल सिंह 10 पैरामिलिट्री फोर्स में सूबेदार के पद पर तैनात थे। विजय पाल पत्नी सुषमा और एक बच्ची विजेता के साथ नौबस्ता गल्ला मंडी में रहते थे। कारगिल युद्ध के समय वह द्रास में तैनात थे।
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कारगिल की लड़ाई में दुश्मनों से लड़ते हुए वे 10 जून 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। विजेता तब तीन माह की थी। आज 15 साल की हो चुकी विजेता अपने नाना रामसेवक के साथ मिलकर पिता की तस्वीर के आगे मोमबत्ती जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रही थी।
आंखें नम थीं, लेकिन पिता की बहादुरी और जांबाजी से उसका सिर गर्व से ऊंचा था। परिजनों, मोहल्लेवालों से सुनी बातें और अखबार में छपी खबरों से उसे पता चला था कि पंद्रह साल पहले जब वह महज तीन माह की थी तो उसके पिता सूबेदार विजय पाल सिंह यादव ने देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाई थी।
उस समय शहीद के परिवार को सांत्वना देने के लिए कई अफसर और देश, प्रदेश के कई नेता आए थे, पूरा शहर उमड़ पड़ा था। पंद्रह साल बाद आज शहर के इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि देने के लिए न तो जिला प्रशासन के पास समय है और न ही जनप्रतिनिधियों को उनकी शहादत याद है।
इस उपेक्षा की टीस विजेता के चेहरे पर दिखती तो जरूर है लेकिन देशभक्ति का जज्बा पिता की तरह उसमें भी हिलोरें मार रहा है। विजेता के मुताबिक वह एनडीए ज्वाइन करेगी, ताकि अपने पापा की तरह ही देश की सेवा कर सके।
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रविवार को पूरा देश जब कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा था, अपना शहर शहीद को भूला बैठा रहा। कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए नौबस्ता के सूबेदार विजय पाल सिंह यादव के घर कोई दो फूल चढ़ाने भी नहीं गया। शहर ही नहीं, शासन और सरकार भी शहीद को भूल गए।
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शहीद की पत्नी को दिया गया पेट्रोल पंप सालों से सीज है। आज शहीद की पत्नी किराए के घर पर रहने को मजबूर है।
मूलरूप से फतेहपुर के जाहूपुर गांव निवासी रामसागर और सुखदेई के पुत्र विजय पाल सिंह 10 पैरामिलिट्री फोर्स में सूबेदार के पद पर तैनात थे। विजय पाल पत्नी सुषमा और एक बच्ची विजेता के साथ नौबस्ता गल्ला मंडी में रहते थे। कारगिल युद्ध के समय वह द्रास में तैनात थे।
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कारगिल की लड़ाई में दुश्मनों से लड़ते हुए वे 10 जून 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। विजेता तब तीन माह की थी। आज 15 साल की हो चुकी विजेता अपने नाना रामसेवक के साथ मिलकर पिता की तस्वीर के आगे मोमबत्ती जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रही थी।
आंखें नम थीं, लेकिन पिता की बहादुरी और जांबाजी से उसका सिर गर्व से ऊंचा था। परिजनों, मोहल्लेवालों से सुनी बातें और अखबार में छपी खबरों से उसे पता चला था कि पंद्रह साल पहले जब वह महज तीन माह की थी तो उसके पिता सूबेदार विजय पाल सिंह यादव ने देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाई थी।
उस समय शहीद के परिवार को सांत्वना देने के लिए कई अफसर और देश, प्रदेश के कई नेता आए थे, पूरा शहर उमड़ पड़ा था। पंद्रह साल बाद आज शहर के इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि देने के लिए न तो जिला प्रशासन के पास समय है और न ही जनप्रतिनिधियों को उनकी शहादत याद है।
इस उपेक्षा की टीस विजेता के चेहरे पर दिखती तो जरूर है लेकिन देशभक्ति का जज्बा पिता की तरह उसमें भी हिलोरें मार रहा है। विजेता के मुताबिक वह एनडीए ज्वाइन करेगी, ताकि अपने पापा की तरह ही देश की सेवा कर सके।