UP: कानपुर के बुकनू को मिलेगा GI Tag, सवा सौ साल पुराना है जायका, 80 इकाइयों में होता है उत्पादन
जिला कृषि विपणन जिला विदेश व्यापार अधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि पहले बुकनू का उत्पादन जहानाबाद (फतेहपुर) में होता था, लेकिन अब कानपुर इसके उत्पादन का इकलौता केंद्र बन गया है। देश के विभिन्न राज्यों के साथ ही विदेश में भी भेजा जाता है।
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कानपुर में बनने वाले बुकनू को भी जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिल सकता है। इसकी कवायद शुरू कर दी गई है। जीआई टैगिंग के लिए नोडल बनाए गए कृषि विपणन एवं विदेश व्यापार विभाग ने शासन को इस संबंध का प्रस्ताव भेजा है। इसमें कहा गया है कि बुकनू का इतिहास करीब सवा सौ साल पुराना है। जिले की करीब 80 छोटी बड़ी इकाइयों में इसे बनाया जाता है।
जिला कृषि विपणन जिला विदेश व्यापार अधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि पहले बुकनू का उत्पादन जहानाबाद (फतेहपुर) में होता था, लेकिन अब कानपुर इसके उत्पादन का इकलौता केंद्र बन गया है। देश के विभिन्न राज्यों के साथ ही विदेश में भी भेजा जाता है। जीआई टैगिंग मिलने के बाद नकल कर इस उत्पाद को बाजार में नहीं उतारा जा सकेगा।
साढे़ तीन सौ टन होता है सालाना उत्पादन
कुमार कहते हैं कि हर महीने जिले की विभिन्न इकाइयों में करीब 30 टन बुकनू का उत्पादन होता है। सालाना साढ़े तीन सौ टन तैयार होने वाला बुकनू देश ही नहीं श्रीलंका, दुबई, सऊदी अरब, बांग्लादेश व अन्य देशों में भेजा जाता है।
पाचन क्रिया में मददगार होता है बुकनू
बुकनू को कई मसालों के मिश्रण से बनाया जाता है और इसे विशेष तौर पर पाचन क्रिया में मदद के लिए खाया जाता है। भारत में इसका उपयोग खाना खाने के साथ किया जाता है। औषधीय महत्व की वजह से ही बुकनू मध्यमवर्ग के साथ ही ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों में भी पसंद किया जाता है।
बिठूर की जामुन के लिए भी कदमताल
बुकनू के साथ ही बिठूर में पैदा होने वाली जामुन को भी जीआई टैगिंग दिलाने की तैयारी है। विनोद कुमार ने बताया कि करीब डेढ़ सौ किसान जामुन की पैदावार कर रहे हैं। इस पूरे क्षेत्र में जामुन के करीब पचास हजार पेड़ चिह्नित किए जा चुके हैं और माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में होने वाली जामुन का स्वाद कहीं और होने वाली जामुन से अलग है। इसी वजह से इसे बचाने और बढ़ावा देने के लिए जीआई टैगिंग दिलाने की कोशिश की जा रही है।