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ये है बेटियों की शिक्षा का मंदिर
ओपी वाधवानी, कानपुर
Updated Mon, 08 Feb 2016 02:15 AM IST
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शहर में खुला है बेटियों की शिक्षा का मंदिर। इसमें पढ़कर गरीब घर की बेटियां उज्ज्वल भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही हैं। गोविंदनगर के सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनिल विश्नोई ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की मुहिम को आत्मसात करते हुए घर में ही गरीब बच्चों के लिए नि:शुल्क कोचिंग खोल रखी है।
यहां के शिक्षक उनकी पत्नी, भाभी और बहन हैं। कोई इंग्लिश पढ़ाता है तो कोई बायो। यहां वह बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं देते, कंप्यूटर की शिक्षा भी दी जाती है। इसके लिए कंप्यूटर लैब भी है, जिसमें चार कंप्यूटर और एक लैपटाप है।
कानपुर से ही सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले अनिल विश्नोई ने वर्ष 2013 में डिग्री हासिल की। पास आउट होते ही उन्हें जर्मनी की सिमेंस कंपनी से तीन लाख रुपये प्रति माह पैकेज का ऑफर आया, पर उनके दिल में कुछ और था। बच्चियों की अशिक्षा उन्हें कचोटती थी।
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वर्ष 2013 में उन्होंने घर पर ही बच्चियों के लिए नि:शुल्क कोचिंग खोल दी। अब यहां कक्षा एक से एमए तक की लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है। कंप्यूटर सिखाया जाता है। अनिल की पत्नी स्मिता (एमए इंग्लिश), भाभी पूजा (एमए हिंदी) और बहन ज्योति (एमएससी बायो) इन्हें पढ़ाती हैं। अनिल के अनुसार तीन साल में सौ से ज्यादा बच्चियां यहां से पढ़कर निकली हैं।
सैलरी से चलता है कोचिंग का खर्चा
अनिल के अनुसार वह और उनका परिवार बच्चों का पूरा ख्याल रखता है। वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाते हैं। घर पर शाम चार से सात बजे तक क्लास लगती है, जिसमें कंप्यूटर, गणित, इंग्लिश, मैथ और हिंदी पढ़ाते हैं। अनिल, सैलरी के एक हिस्से और घरवालों के सहयोग से शिक्षा में आने वाला खर्च वहन करते हैं।
सरकारी स्कूलों में बढ़े संसाधन
अनिल विश्नोई का कहना है कि यहां के सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी है। शहर के और लोगों को बेटियों पढ़ाने के लिए ऐसे प्रयास करने चाहिए। जो पढ़ा सकते हैं वह किसी न किसी गरीब बेटी को पढ़ाएं।
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यहां के शिक्षक उनकी पत्नी, भाभी और बहन हैं। कोई इंग्लिश पढ़ाता है तो कोई बायो। यहां वह बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं देते, कंप्यूटर की शिक्षा भी दी जाती है। इसके लिए कंप्यूटर लैब भी है, जिसमें चार कंप्यूटर और एक लैपटाप है।
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कानपुर से ही सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले अनिल विश्नोई ने वर्ष 2013 में डिग्री हासिल की। पास आउट होते ही उन्हें जर्मनी की सिमेंस कंपनी से तीन लाख रुपये प्रति माह पैकेज का ऑफर आया, पर उनके दिल में कुछ और था। बच्चियों की अशिक्षा उन्हें कचोटती थी।
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वर्ष 2013 में उन्होंने घर पर ही बच्चियों के लिए नि:शुल्क कोचिंग खोल दी। अब यहां कक्षा एक से एमए तक की लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है। कंप्यूटर सिखाया जाता है। अनिल की पत्नी स्मिता (एमए इंग्लिश), भाभी पूजा (एमए हिंदी) और बहन ज्योति (एमएससी बायो) इन्हें पढ़ाती हैं। अनिल के अनुसार तीन साल में सौ से ज्यादा बच्चियां यहां से पढ़कर निकली हैं।
सैलरी से चलता है कोचिंग का खर्चा
अनिल के अनुसार वह और उनका परिवार बच्चों का पूरा ख्याल रखता है। वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाते हैं। घर पर शाम चार से सात बजे तक क्लास लगती है, जिसमें कंप्यूटर, गणित, इंग्लिश, मैथ और हिंदी पढ़ाते हैं। अनिल, सैलरी के एक हिस्से और घरवालों के सहयोग से शिक्षा में आने वाला खर्च वहन करते हैं।
सरकारी स्कूलों में बढ़े संसाधन
अनिल विश्नोई का कहना है कि यहां के सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी है। शहर के और लोगों को बेटियों पढ़ाने के लिए ऐसे प्रयास करने चाहिए। जो पढ़ा सकते हैं वह किसी न किसी गरीब बेटी को पढ़ाएं।