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‘इन गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है...’

Thu, 02 Feb 2017 01:51 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Thu, 02 Feb 2017 01:51 AM IST
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story of kanpur injured people
घायल मजदूर - फोटो : अमर उजाला
‘इन गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है, 
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इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है ....
चेहरे कई बेनकाब हो जायेंगे,
ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है !!
खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से,
उनके निजी जज्बात ना पूछो तो अच्छा है !’’

 

गरीबी के दर्द की ये दास्तां हिन्दुस्तान के लगभग सभी शहरों में देखने को मिल रही है। दो वख्त की रोटी के लिए कोई अपना घर-द्वार छोड़कर कुछ भी करने को मजबूर है तो कोई अपने परिवार का पेट
पालने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार है। 


बुधवार को कानपुर के जाजमऊ इलाके में समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष महताब अालम कि जिस बिल्डिंग ने सात लाेगाें की जान ले ली वह अवैध थी। अपार्टमेन्ट बनाने में मजदूरी का काम कर रहे किसी भी मजदूर के पास सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे और न ही कभी उन्हें कभी मुहैया कराये गए थे। दिहाड़ी मजदूरी की रकम से दो वख्त की रोटी जुटाने वाले सैकड़ों मजदूरों के दुखों पर मरहम लगाने वाले तो कई आये लेकिन उनकी सुरक्षा की बात किसी ने नहीं की। 

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बल्डिंग गिरने के बाद 50 से ज्यादा मजदूर मलबे में दब गये। उन्हें निकालकर बाहर तो कर दिया गया लेकिन अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तक नहीं मुहैया करायी गई। किसी ने सही कहा है कि तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं। देर रात तक एनडीआरएफ की टीमें मलबे से लाशों और घायलों को बाहर निकालती रहीं इस दौरान ऐसे-ऐसे दृश्य सामने आये कि हर किसी के रोंगटे खड़े हो गये। 
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ये गरीबी का दर्द है जाे छह मंजिला इमारत ढहने के बाद दर्जनाें मजदूर अाैर उनका परिवार झेल रहा है। तमाम दावे करने वाली सरकार की इस हादसे ने पाेल खाेलकर रख दी। दर्द से कहरा रहे मजदूर कीड़े-मकाैड़े की तरह घटनास्थल अाैर अस्पताल में पड़े रहे अाैर उन्हें देखने वाला काेई नहीं था। शायद ये जिंदगी अाैर माैत से जंग लड़ रहे घायलाें काे नहीं मालूम रहा हाेगा की गरीबी उनका यहां भी पीछा नहीं छाेड़ेगी।
 

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