कोरोना वारियर्स की कहानी उन्हीं की जुबानी: दर्द और डर से बड़ी कोरोना को हराने की जिम्मेदारी
दर्द से बड़ी ड्यूटी है, ऑपरेशन के बाद ड्यूटी ज्वाइन की
लॉकडाउन के दौरान पुलिस की सख्त ड्यूटी, लगातार जीप में बैठकर गश्त करना। धूप और पसीने से रामपुरा थाने में तैनात इंस्पेक्टर आरके सिंह की पीठ पर फोड़ा हो गया था। कुछ दिन वह दर्द में ड्यूटी करते रहे। लेकिन जब दर्द असहनीय हो गया तो डॉक्टरों ने उनको ऑपरेशन की सलाह दी। दस अप्रैल को ऑपरेशन किया गया। डॉक्टर ने दो दिन बेड रेस्ट की सलाह दी।
आरके सिंह कहते हैं आम दिन होते तो मैं डॉक्टर की सलाह मान लेता लेकिन ऐसी संकट की घड़ी में दर्द से कहीं बड़ी ड्यूटी है। ऑपरेशन के दूसरे दिन मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली। दर्द अब भी है लेकिन मेरी वजह क्षेत्र की स्थिति नियंत्रण में रहे इससे मेरा दर्द कम हो जाता है। परिवार सीतापुर में है, मेरी स्थिति जान वे विचलित होते हैं लेकिन ड्यूटी का महत्व समझते हैं।
जालौन सीएचसी में बने कोरोना आइसोलेशन वार्ड में 240 महिला संदिग्धों की जांच करने वालीं डॉ. अनुपमा की दस साल बेटी और सात साल का बेटा उनसे वर्क फ्रोम होम करने की बात कहते हैं। बच्चे कोरोना से डरे हुए हैं, डॉक्टरों के आए दिन चपेट में आने वाली खबरों से व्याकुल हो उठते हैं।
मैं उनसे कहती हूं कि मैं डॉक्टर हूं, घर से काम नहीं कर सकती। अस्पताल को मेरी जरूरत है। डॉ. अनुपमा मानती हैं कि इस काल में ड्यूटी के साथ थोड़ा डर भी है। लेकिन सतर्कता से ही आपकी जीत होगी। पति बच्चों का हौसला बढ़ाते हैं।
दीवारों पर संदेश लिखता हूं ताकि लोग समझें
ऐसे करने के लिए न तो उन्हें कोई वित्तीय सहायता मिलती है न ही सरकारी धन। वह मन से इस लड़ाई में कूदे हैं। कड़ी धूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। शहर में 50 से ज्यादा स्थानों पर जागरूकता भरे संदेश लिख चुके हैं, ताकि जिसकी भी नजरें पडे़ जागरूक हो।