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मिशन जीरो, एडमिशन जीरो
शैली भल्ला, कानपुर
Updated Mon, 19 Jan 2015 02:06 AM IST
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राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 (आरटीई) के तहत गरीब बच्चों को शिक्षित करने की योजना में 2013 से लेकर आज तक एक भी बच्चे का एडमिशन किसी स्कूल में नहीं कराया गया।
केंद्र सरकार की इस योजना में शहर के 32 स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई के लिए निर्धारित की गई थीं लेकिन योजना का प्रचार-प्रसार न होने और अफसरों के रुचि न लेने से योजना दम तोड़ गई।
गरीब बच्चों के माता-पिता को योजना के बारे में पता ही नहीं और अफसरों ने उन्हें बताने के कोई प्रयास भी नहीं किए। इस योजना के प्रचार-प्रसार के लिए कोई बजट न होने से यह सारी मुश्किलें पेश आईं।
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अफसर कहते हैं कि अगर प्रचार के लिए पैसा मिल जाए तो कुछ बात बने। फिलहाल कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद ली जाएगी।
नि:शुल्क शिक्षा और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 12(1)(ग) के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग के बच्चों, नि:शक्त बच्चों, निराश्रित बेघर बच्चों, एचआईवी, कैंसर पीड़ित माता-पिता के बच्चों, गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के बच्चों, विकलांगता, वृद्घावस्था, विधवा पेंशन पाने वालों के बच्चों को उनके निवास स्थान के आस-पास के मान्यता प्राप्त स्कूलों में मुफ्त शिक्षा की योजना है।
एक लाख रुपये सालाना आय वाले अभिभावकों के बच्चों को भी इस योजना में फ्री पढ़ाई करवाई जानी है। यदि किसी बस्ती-मोहल्ले में एक किलोमीटर की परिधि में परिषदीय, सहायता प्राप्त स्कूल नहीं है तो वहां के पात्र बच्चों का दाखिला मान्यता प्राप्त या प्राइवेट स्कूलों में कराने का प्रावधान है।
बच्चों का एडमिशन, कॉपी-किताबें, ड्रेस, सब फ्री है। इन सब सुविधाओं के बाद भी पिछले दो सालों में एक भी छात्र का एडमिशन शहर के किसी स्कूल में नहीं हुआ है। गरीबों की आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों पर किनके और कैसे एडमिशन लिए गए हैं, इसका ब्योरा किसी के पास नहीं है।
बीएसए राजेंद्र प्रसाद यादव चयनित स्कूलों में एक भी एडमिशन न होने का एक भी कारण नहीं बता पाए। स्कूलों को शार्टलिस्ट करने के प्रभारी नगर निगम के रजनीकांत पांडे कहते हैं कि जिन स्कूलों में यह सुविधा दी जानी है, उसकी सूची नगर निगम की ओर से जारी की गई है। दो साल से कोई भी छात्र दाखिले के लिए नहीं आया।
इस बारे में बीएसए राजेंद्र प्रसाद यादव का कहना है कि इसके कारण कई हैं। पिछले दो साल में एडमिशन के लिए एक भी आवेदन ही नहीं आया। सरकार की ओर से प्रचार-प्रसार के मद में कोई बजट नहीं है। सर्व शिक्षा अभियान में जो विज्ञापन के लिए बजट आता है, उसी में ही राइट टू एजूकेशन के लिए भी विज्ञापन निकलवाए हैं। इसके अतिरिक्त प्रचार-प्रसार में कुछ नहीं हुआ। स्कूलों की सूची नगर निगम द्वारा तैयार की गई है, इसमें मैं कुछ नहीं कह सकता।
आगामी सत्र में हाउस होल्ड सर्वे में लगे शिक्षकों की मदद ली जाएगी। टीचर्स घर घर जाकर अब अभिभावकों को इस योजना के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे।
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केंद्र सरकार की इस योजना में शहर के 32 स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई के लिए निर्धारित की गई थीं लेकिन योजना का प्रचार-प्रसार न होने और अफसरों के रुचि न लेने से योजना दम तोड़ गई।
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गरीब बच्चों के माता-पिता को योजना के बारे में पता ही नहीं और अफसरों ने उन्हें बताने के कोई प्रयास भी नहीं किए। इस योजना के प्रचार-प्रसार के लिए कोई बजट न होने से यह सारी मुश्किलें पेश आईं।
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अफसर कहते हैं कि अगर प्रचार के लिए पैसा मिल जाए तो कुछ बात बने। फिलहाल कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद ली जाएगी।
नि:शुल्क शिक्षा और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 12(1)(ग) के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग के बच्चों, नि:शक्त बच्चों, निराश्रित बेघर बच्चों, एचआईवी, कैंसर पीड़ित माता-पिता के बच्चों, गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के बच्चों, विकलांगता, वृद्घावस्था, विधवा पेंशन पाने वालों के बच्चों को उनके निवास स्थान के आस-पास के मान्यता प्राप्त स्कूलों में मुफ्त शिक्षा की योजना है।
एक लाख रुपये सालाना आय वाले अभिभावकों के बच्चों को भी इस योजना में फ्री पढ़ाई करवाई जानी है। यदि किसी बस्ती-मोहल्ले में एक किलोमीटर की परिधि में परिषदीय, सहायता प्राप्त स्कूल नहीं है तो वहां के पात्र बच्चों का दाखिला मान्यता प्राप्त या प्राइवेट स्कूलों में कराने का प्रावधान है।
बच्चों का एडमिशन, कॉपी-किताबें, ड्रेस, सब फ्री है। इन सब सुविधाओं के बाद भी पिछले दो सालों में एक भी छात्र का एडमिशन शहर के किसी स्कूल में नहीं हुआ है। गरीबों की आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों पर किनके और कैसे एडमिशन लिए गए हैं, इसका ब्योरा किसी के पास नहीं है।
बीएसए राजेंद्र प्रसाद यादव चयनित स्कूलों में एक भी एडमिशन न होने का एक भी कारण नहीं बता पाए। स्कूलों को शार्टलिस्ट करने के प्रभारी नगर निगम के रजनीकांत पांडे कहते हैं कि जिन स्कूलों में यह सुविधा दी जानी है, उसकी सूची नगर निगम की ओर से जारी की गई है। दो साल से कोई भी छात्र दाखिले के लिए नहीं आया।
इस बारे में बीएसए राजेंद्र प्रसाद यादव का कहना है कि इसके कारण कई हैं। पिछले दो साल में एडमिशन के लिए एक भी आवेदन ही नहीं आया। सरकार की ओर से प्रचार-प्रसार के मद में कोई बजट नहीं है। सर्व शिक्षा अभियान में जो विज्ञापन के लिए बजट आता है, उसी में ही राइट टू एजूकेशन के लिए भी विज्ञापन निकलवाए हैं। इसके अतिरिक्त प्रचार-प्रसार में कुछ नहीं हुआ। स्कूलों की सूची नगर निगम द्वारा तैयार की गई है, इसमें मैं कुछ नहीं कह सकता।
आगामी सत्र में हाउस होल्ड सर्वे में लगे शिक्षकों की मदद ली जाएगी। टीचर्स घर घर जाकर अब अभिभावकों को इस योजना के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे।