{"_id":"68dd4a69150056d6ce070411","slug":"kanpur-the-doors-of-north-india-s-only-dashanan-temple-in-shivala-will-open-on-dussehra-2025-10-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kanpur: शिवाला में उत्तर भारत के एकमात्र दशानन मंदिर के दशहरे पर खुलेंगे पट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kanpur: शिवाला में उत्तर भारत के एकमात्र दशानन मंदिर के दशहरे पर खुलेंगे पट
Wed, 01 Oct 2025 09:07 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 01 Oct 2025 09:07 PM IST
सार
Kanpur News: रावण का जन्म और मृत्यु एक ही दिन हुआ था। इसलिए साल में एक बार ही मंदिर के पट खुलते हैं।
विज्ञापन
शिवाला स्थित दशानन मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर भारत के एकमात्र शिवाला स्थित दशानन मंदिर के पट दशहरा के दिन गुरुवार सुबह छह बजे खुलेंगे। मंदिर के साल में एक ही बार पट खोले जाते हैं। दशहरा के दिन दूरदराज से लोग दशानन के दर्शन करने आते हैं। मंदिर की देखभाल करने वाले चंदन मौर्य ने बताया कि कैलाश मंदिर में ही दशानन मंदिर बना है। करीब 157 साल पहले 1868 में मंदिर का निर्माण उस समय राजा रहे गुरु प्रसाद शुक्ला ने कराया था।
मान्यताओं के अनुसार शिवाला में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। यहां भगवान शिव, छिंदमस्तिका, प्रभु श्रीराम आदि भगवान विराजमान हैं। पुराने समय में इन देवी-देवताओं की पहरेदारी के लिए किसे स्थापित किया जाए, इस पर चर्चा हुई तो तय हुआ कि सबसे बुद्धिमान दशानन का मंदिर भी यहां बनाया जाए। दशानन का जन्म और मृत्यु एक ही दिन हुई थी इसलिए साल में सिर्फ एक बार दशहरा के दिन सुबह यह मंदिर खोला जाता है। सबसे पहले साफ-सफाई कर दशानन का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद सरसों के तेल का दीपक जलाकर दशानन का जन्मदिवस मनाया जाता है। दिनभर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। रात 8:30 बजे रावण का वध होते ही मंदिर के पट फिर बंद कर दिए जाते हैं और इसके बाद अगले साल ही दशहरा के दिन खोले जाते हैं।
विज्ञापन
मान्यताओं के अनुसार शिवाला में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। यहां भगवान शिव, छिंदमस्तिका, प्रभु श्रीराम आदि भगवान विराजमान हैं। पुराने समय में इन देवी-देवताओं की पहरेदारी के लिए किसे स्थापित किया जाए, इस पर चर्चा हुई तो तय हुआ कि सबसे बुद्धिमान दशानन का मंदिर भी यहां बनाया जाए। दशानन का जन्म और मृत्यु एक ही दिन हुई थी इसलिए साल में सिर्फ एक बार दशहरा के दिन सुबह यह मंदिर खोला जाता है। सबसे पहले साफ-सफाई कर दशानन का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद सरसों के तेल का दीपक जलाकर दशानन का जन्मदिवस मनाया जाता है। दिनभर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। रात 8:30 बजे रावण का वध होते ही मंदिर के पट फिर बंद कर दिए जाते हैं और इसके बाद अगले साल ही दशहरा के दिन खोले जाते हैं।
विज्ञापन