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UP: लंबी नहीं…जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, रिद्धिमा की आईआईटी तक की प्रेरणादायक कहानी, मां बोली- मेधावी है बेटी

Thu, 14 Aug 2025 06:53 AM IST
हिमांशु अवस्थी शैली भल्ला, अमर उजाला, कानपुर
शैली भल्ला, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Thu, 14 Aug 2025 06:53 AM IST
सार

Kanpur News: पूरी तरह से दिव्यांग होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल की रिद्धिमा पॉल ने आईआईटी कानपुर में दाखिला लेकर एक मिसाल कायम की है। स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित रिद्धिमा ने अपनी मां के सहयोग से यह उपलब्धि हासिल की है।

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Kanpur Riddhima completed her journey to IIT by walking on her fingers mother said daughter is brilliant
रिद्धिमा पॉल - फोटो : amar ujala

विस्तार

जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं....आनंद फिल्म के इस डायलॉग को अपने जीवन में उतारते हुए आईआईटी कानपुर में इस साल दाखिला लेने वाली रिद्धिमा पॉल के हौसले के आगे सभी नतमस्तक हैं। पूर्ण रूप से दिव्यांग रिद्धिमा व्हीलचेयर पर हैं। अपने दैनिक कार्यों के लिए मां पर निर्भर है। लिखने के लिए उंगलियां चलती हैं लेकिन पेन अगर कोई खोलकर दे दे तो।

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पूरे शरीर में केवल उंगलियां ही काम करती हैं। विषम परिस्थितियों से जूझते हुए रिद्धिमा ने देश के प्रतिष्ठित तकनीक संस्थान आईआईटी में दाखिला पाया है। जन्म से ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित रिद्धिमा को 2025-26 के सत्र में दिव्यांग कोटे से मैथेमेटिकल एंड स्टैटिक्स में प्रवेश मिला है।

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मेन स्ट्रीम के स्कूलों में दाखिला नहीं दिया
पश्चिम बंगाल के मालदा गांव की रहने वाली रिद्धिमा को बचपन में मेन स्ट्रीम के स्कूलों में दाखिला नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आईआईटियन बनने सपने को पूरा करने के लिए जी जान लगा दी। मेहनत और परिश्रम के बल पर आईआईटी कानपुर में दाखिला लिया। स्पेशल परमिशन लेकर रिद्धिमा अपनी मां अरुणिता के साथ रह रही हैं।

मां मेरे साथ कानपुर आ गईं
रिद्धिमा कहतीं हैं कि लाइफ बिल्कुल भी आसान नहीं है। ब्रश करने के लिए भी मुझे मां की जरूरत है। ऐसे में सैकड़ों किलोमीटर घर से दूर आने के मेरे फैसले ने सभी को अचंभित कर दिया था। आईआईटियन बनने में मेरे घरवालों ने भी खूब सहयोग किया। रिद्धिमा कहती हैं कि मेरे पिता राजीव पॉल पश्चिम बंगाल पुलिस में हैं भाई सातवीं कक्षा में है। सबको वहीं छोड़कर मां मेरे साथ कानपुर आ गईं।

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हर दिन है नई चुनौतियां
रिद्धिमा कहती हैं कि मेरे लिए हर दिन नई चुनौती है। हर दिन ऐसा जरूर होता है जब मन काफी उदास होता है लेकिन अपने लक्ष्य को ध्यान में रखती हूं। ओरिएंटेशन के दौरान योगा का सेशन में मैं चुपचाप एक कोने में बैठी रही। कई बार ऐसा होता है कि मन में आता है मैं सामान्य क्यों नहीं हूं, बाकी बच्चे जैसा कर रहे मैं वैसा क्यों नहीं कर पा रही हूं।

बीमारी के इलाज के लिए जाना है विदेश
अरुणिमा कहती हैं कि आईआईटी से बीटेक करने के बाद मुझे विदेश जाना है वहां मेरी बीमारी का इलाज सस्ता है। यहां इलाज की सुविधा कम और महंगी है। यही वजह है कि साधारण इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक नहीं किया। अच्छी जॉब और पैकेज के साथ विदेश जाकर अपना इलाज करना चाहती हूं।

बेटी मेधावी, करेंगे पूरा सहयोग
रिद्धिमा की मां अरुणिता कहती हैं कि बेटी शुरू से टॉप रैंकर रही है। इतनी गंभीर बीमार होने के बाद भी उसने पढ़ाई से मुंह नहीं चुराया। इस वजह से उसका सहयोग करने के लिए अपने बेटे को छोड़कर यहां आ गए हैं।

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