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जाणता राजा महानाट्यः जब 'मां की ललकार' पर लहरा उठी शिवा जी की तलवार

Sun, 21 Oct 2018 02:48 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Sun, 21 Oct 2018 02:48 PM IST
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Janta Raja play based on shiva ji in kanpur
जाणता राजा नाटक का मंचन शुरु
शिवाजी के छत्रपति बनने की भव्य गाथा को जाणता राजा महानाट्य के जरिए दर्शाया गया। मराठी भाषा में जाणता राजा का अर्थ एक बुद्घिमान शासक होता है। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर में हजारों की भीड़ के बीच जैसे ही जाणता राजा नाटक का मंचन शुरु हुआ, पूरा पंडाल तालियों से गूंजने लगा। माता तुलजा भवानी की आरती के बाद दुदुंभी की गूंज, ढोल-नगाड़ों की तेज धुनों के साथ नाटक की शुरुआत हुई।
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रिकॉर्डेड  संवाद के साथ कलाकारों ने मंच पर प्रवेश किया। नाटक की कहानी 300 वर्ष पूर्व शुरु होती है। महाराष्ट्र ऐश्वर्य संपन्न था। यहां घरों में ताले नहीं लगते थे। यहां के वासी दान स्वीकार करने में शर्माते थे। महाराष्ट्र पुरुषार्थ के चारों गुणों से सिद्घ था। तभी भारत की भूमि पर पठानों का आक्रमण होता है। पठानों का सरदार अलाऊद्दीन खिलजी सेना के साथ मराठाओं पर हमला कर देता है। हमले में पठानों की विजय होती है और देवगिरी हार जाता है। मुगलों द्वारा जनता पर जुल्म ढाये जाते हैं। लड़कियों और लड़कों को गुलाम बना लिया जाता है। उन्हें कोड़ों से पीटा जाता है। महिलाओं पर अत्याचार की इंतेहा हो जाती है। ढाई सौ वर्ष बीत जाते हैं। मराठा गोकुल का अंत हो जाता है। हर ओर घोर अंधकार छा जाता है।
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शाहजी भोसले बीजापुर आदिलशाही सल्तनत के मनसबदार

Janta Raja play based on shiva ji in kanpur
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में जाणता राजा नाटक का मंचन शुरु
अंधकार की इस घड़ी में जगत जननी माता तुलजा भवानी के रूप में जीजा बाई शाहजी भोसले के घर पत्नी रूप में आती हैं। जीजा के मन में तो स्वराज बसा होता है। शाहजी भोसले बीजापुर आदिलशाही सल्तनत के मनसबदार होते हैं। शाहजी दो बादशाहों को जीत कर रानी जीजाबाई से मिलने पहुंचते हैं। अपनी जीत के किस्से सुनाते हैं। जीजा कहती है राजे आपको मुगलों की गुलामी ने जकड़ रखा है। मराठाओं पर सैकड़ों वर्षों से ये मुगल जुल्म ढाते आए हैं। उनकी बहू बेटियों की इज्जत को तार तार कर के रख दिया है। कभी आपको क्रोध नहीं आता। शाहजी कहते हैं रानी साहिबा हमारी तलवार 12 पुश्तों से गुलामी कर रही है। हमें एक ऐसे योद्घा की जरूरत है जो स्वराज की पताका को पूरे देश में लहरा दे। 

पहाड़ियों के बीच बसे शिवनेरी किले में जीजाबाई को शिवाजी के रूप में पुत्र की प्राप्ति होती है। शिवाजी के जन्म से पूरे किले में एक नई ऊर्जा दौड़ने लगती है। हर ओर मंगल ही मंगल होता है। शिवाजी की आंखों में जीजा अपना सपना पिरोने लगती है, स्वराज का सपना, अखंड भारत का सपना, मुगलों से छुटकारा पाने का सपना। जीजा बाई की देखरेख में शिवाजी का युद्घ प्रशिक्षण शुरु हो जाता है। उन्हें हर हथियार चलाने का तरीका बताया जाता है। शिवाजी को तलवार सौंपते हुए जीजा कहती हैं कि राजे आपकी तलवार में तुलजा भवानी का वास है। सहयाद्री पर्वत आपके चरणों में झुकेगा। सिंधु से लेकर कावेरी तक नदियां आपके चरण चूमेंगी। शिवाजी गनीमीकावा (छापामार युद्घ शैली) में कुशल हो जाते हैं।

मावला तराई घाटियों में माता तुलजा भवानी का आह्वान किया जाता है। गनीमीकावा से शिवाजी तोरणगढ़ किले पर कब्जा कर लेते हैं। अफजल खान, शाहिस्ता खान जैसे क्रूर मुगल सेनानायक शिवाजी का खात्मा करने के लिए आते हैं पर मावला की घाटियों में सभी को शिवाजी के सामने मुंह की खानी पड़ती है। मुगल बादशाह औरंगजेब से युद्घ करने पर शिवाजी को समझौते के तौर पर 23 किले वापस करने पड़ते हैं। शिवाजी को औरंगजेब से मिलने के लिए आगरा के किले में जाना होता है जहां शिवाजी को कैद कर लिया जाता है। कुछ महीनों की कैद के बाद एक मुगल सैनिक की मदद से शिवाजी औरंगजेब की सवा लाख की सेना को पराजित कर आंखों से ओझल हो जाते हैं। फिर शिवाजी स्वराज की पताका 84 बंदरगाहों और 42 दुर्गों पर फहराते हैं।
 

17वीं शताब्दी को दिखाया गया

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चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में जाणता राजा नाटक का मंचन शुरु
नाटक में 17वीं शताब्दी को दर्शाया गया है। 1627 से 1680 के बीच छत्रपति शिवाजी राजे भोसले ने शासन किया। नाटक में उन्हें एक कुशल प्रशासक एवं रणनीतिकार दर्शाया गया है। वह उदार पंथनिरपेक्ष शासक थे। गुप्तचर प्रणाली के जरिए दुश्मन छावनी की टोह लेना उनकी खोज थी। अपने समय में उन्होंने पेड़ काटने पर रोक लगा दी थी। उन्हें भारतीय नौसेना का जनक एवं तकनीकविद् भी कहा जाता है। नाटक में शिवाजी के शासन काल को तीन घंटों में समेटने की कोशिश की गई है। महाराष्ट्र के लोक नृत्यों के जरिए नाटक को भव्यता प्रदान की गई।

दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया
शिवाजी के जन्म से लेकर छत्रपति बनने तक की ऐतिहासिक गौरवगाथा को तीन घंटे के नाटक में समेटने का प्रयास भव्य एवं अद्भुत रहा। नाटक के आरंभ में जैसा कि नेपथ्य से बताया गया, नाटक का यह 1082 वां मंचन था। चार मंजिला सेट, 250 से अधिक कलाकार, चकाचौंध करने वाली प्रकाश व्यवस्था, लकदक करती कास्ट्यूम, तोप, हाथी, घोड़े पर सवार सैनिकों और गीतों से सजे नाटक को पूरे तीन घंटे तक हजारों दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। नाटक में कथ्य दर्शाने के लिए संवाद से अधिक गीतों का प्रयोग किया गया। सूत्रधार के माध्यम से भी घटनाओं को स्पष्ट किया। रिकार्डेड संवाद, गीत और बैकग्राउंड म्यूजिक के बीच कलाकारों के लिप्स मूवमेंट (होठों का संचालन) की टाइमिंग कमाल की थी। मराठी नृत्य और मराठी गानों ने जाणता राजा के मंचन को शानदार बना दिया। पोवडा एक महाराष्ट्री लोकगीत है, जिसमें श्री गणेश जी की उपासना की गई है। इसमें गोंधल, अभंगा, लवानी लोक गीतों का प्रयोग किया गया है।

 
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एक दर्जन से अधिक जिलों से दर्शक आए 

Janta Raja play based on shiva ji in kanpur
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में जाणता राजा नाटक का मंचन शुरु
महानाट्य देखने के लिए फर्रुखाबाद, हरदोई, कन्नौज, बांदा, हमीरपुर सहित एक दर्जन से अधिक जिलों से दर्शक आए। नाटक के बीच एक घोड़ा दर्शक दीर्घा में जा घुसा लेकिन लोग नाटक में इतना लीन हो गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि घोड़ा भटक कर यहां आ गया है या नाटक का कोई हिस्सा है। कई दर्शकों को टिकट न होने की वजह से मुख्य द्वार पर रोक दिया गया। फर्रुखाबाद से आए विजय सक्सेना ने बताया कि उन्हें पता नहीं था कि टिकट के जरिए प्रवेश मिलेगा। मुनेश शर्मा भी गुरसहायगंज से आए पर टिकट न होने की वजह से उन्हें मायूस लौटना पड़ा। 

1985 में शुरु हुआ था मंचन
पुणे में 29 जुलाई 1922 को जन्मे इतिहासकार बाबा साहब पुरेंद्र ने मराठी भाषा में राजा शिवा जी छत्रपति किताब लिखी। इस किताब में शिवाजी के पूरे जीवन का सार है। उन्होंने भारत के हर उस किले का दौरा किया जहां शिवाजी कभी गए थे। शिवाजी के जीवन पर उन्होंने 1985 में जाणता राजा नाटक शुरु किया। भारत और विदेश में अभी तक 1200 बार इस नाटक का मंचन हो चुका है। उन्हें कालिदास सम्मान और महाराष्ट्र भूषण से नवाजा जा चुका है। 96 साल की उम्र में भी वे इस नाटक पर काम करते रहते हैं।

ये रहे मौजूद
पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र, कैबिनेट मंत्री सत्यदेव पचौरी, कमिश्नर सुभाष चंद्र शर्मा, आईजी आलोक सिंह, डीएम विजय विश्वास पंत, एसएसपी अनंत देव आदि लोग मौजूद रहे। शिवाजी का किरदार प्रवीण सिरबोले, शाहजी भोसले का महेश बुलाक , औरंगजेब का अजीत आप्टे, जीजाबाई का तेजस्वनी नांगरे ने निभाया। डॉयरेक्टर प्रशांत चौहान हैं। 
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