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‘इंसान की शक्ल देखी पर इंसान नहीं देखा’
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Sun, 19 Apr 2015 02:46 AM IST
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‘हिंदू देखा, मुस्लिम देखा, सिख देखा, ईसाई देखा, इंसान की शक्ल देखी पर इंसान नहीं देखा’ पदमभूषण गोपालदास नीरज की इन पंक्तियों के साथ शुरू हुई ‘अटल जी के नाम नीरज की शाम’ का सुरूर देर रात तक श्रोताओं पर चढ़ता गया। नीरज के गीत-गजलों को सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।
हर नई कविता के साथ श्रोता बहुत खूब-बहुत खूब कहकर काव्य और गीतों की झिलमिल लहरों में खोए रहे। लाजपत भवन में ‘स्मृति’ संस्था की ओर से आयोजित इस शाम में नीरज ने वक्त के बदलते परिवेश को ‘अब तो मजहब ऐसा लाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान समझा जाए’ गीत सुनाकर चरितार्थ किया।
कानपुर के प्रति प्रेम और स्नेह को ‘कानपुर तूने मुझे जिंदगी दे दी, लेकिन रहने के लिए तीन गज जमीन नहीं दी से व्यक्त किया। मानवीय संवेदनाओं को ‘तन से भारी सांस है यह समझो तो खूब, मुर्दा जल में तैरता जाए, जिंदा जाए डूब’ से व्यक्त किया।
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जिंदगी के मायने को हर पल को जियो अंतिम पल मान के, अंतिम पल है कौन सा यह जान सका है कौन गीत सुनाकर पेश किया। अगली कड़ी में काल नहीं बीतता, बीत रहे हम लोग...गजल सुनाई। वहीं श्रोताओं की मांग पर भी कई गीत और गजलें सुनाईं।
इस दौरान नीरज ने अटल जी से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए बताया कि उनकी पहली मुलाकात अटल जी से कानपुर में 1946-1947 में हुई थी। इसके बाद ग्वालियर में एक काव्य सम्मेलन के दौरान दोनों लोग साथ जा रहे थे। बारिश के कारण ट्रेन छूट गई तो बस से गए थे।
संस्मरण सुनाया कि जवाहरलाल नेहरू जी कहते थे कि अटल बिहारी बाजपेई प्रधानमंत्री बनेंगे। वहीं संस्था की ओर से नीरज को मुन्नू गुरु साहित्य एवार्ड दिया गया। इससे पहले मुख्य अतिथि हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने दीप प्रज्जवलन करके कार्यक्रम की शुरूआत की।
उन्होंने कहा कि अटल जी इस देश की अमूल्य धरोहर हैं। उनके विचारों, दिखाए गए मार्गों को संरक्षित करने की जरूरत है। वह जन नेता नहीं मन नेता हैं। अटल जी के सपनों का भारत बनाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।
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हर नई कविता के साथ श्रोता बहुत खूब-बहुत खूब कहकर काव्य और गीतों की झिलमिल लहरों में खोए रहे। लाजपत भवन में ‘स्मृति’ संस्था की ओर से आयोजित इस शाम में नीरज ने वक्त के बदलते परिवेश को ‘अब तो मजहब ऐसा लाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान समझा जाए’ गीत सुनाकर चरितार्थ किया।
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कानपुर के प्रति प्रेम और स्नेह को ‘कानपुर तूने मुझे जिंदगी दे दी, लेकिन रहने के लिए तीन गज जमीन नहीं दी से व्यक्त किया। मानवीय संवेदनाओं को ‘तन से भारी सांस है यह समझो तो खूब, मुर्दा जल में तैरता जाए, जिंदा जाए डूब’ से व्यक्त किया।
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जिंदगी के मायने को हर पल को जियो अंतिम पल मान के, अंतिम पल है कौन सा यह जान सका है कौन गीत सुनाकर पेश किया। अगली कड़ी में काल नहीं बीतता, बीत रहे हम लोग...गजल सुनाई। वहीं श्रोताओं की मांग पर भी कई गीत और गजलें सुनाईं।
इस दौरान नीरज ने अटल जी से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए बताया कि उनकी पहली मुलाकात अटल जी से कानपुर में 1946-1947 में हुई थी। इसके बाद ग्वालियर में एक काव्य सम्मेलन के दौरान दोनों लोग साथ जा रहे थे। बारिश के कारण ट्रेन छूट गई तो बस से गए थे।
संस्मरण सुनाया कि जवाहरलाल नेहरू जी कहते थे कि अटल बिहारी बाजपेई प्रधानमंत्री बनेंगे। वहीं संस्था की ओर से नीरज को मुन्नू गुरु साहित्य एवार्ड दिया गया। इससे पहले मुख्य अतिथि हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने दीप प्रज्जवलन करके कार्यक्रम की शुरूआत की।
उन्होंने कहा कि अटल जी इस देश की अमूल्य धरोहर हैं। उनके विचारों, दिखाए गए मार्गों को संरक्षित करने की जरूरत है। वह जन नेता नहीं मन नेता हैं। अटल जी के सपनों का भारत बनाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।