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दो सौ करोड़ से बहुरेंगे गुम हो रहे उद्योगों के दिन

Mon, 05 Feb 2018 11:44 PM IST
Updated Mon, 05 Feb 2018 11:44 PM IST
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दो सौ करोड़ से बहुरेंगे गुम हो रहे उद्योगों के दिन
अमर उजाला ब्यूरो
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बांदा। शासन की नई औद्योगिक नीति के तहत जिले में अंतिम सांसें गिन रहे उद्योगों को फिर पंख लगने की उम्मीदें जागी हैं। पांचों तहसीलों में 500 एकड़ जमीन में बड़े उद्योग स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है। उद्योग विभाग ने 200 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट तैयार किया है। इसमें राइस मिल, रिसॅार्ट, होटल, बोर्डिंग स्कूल, दोना-पत्तल, कस्तूरी फ्रूट्स, एग्रो प्रोडक्ट्स, मिल्क प्रोडक्ट, दरी उद्योग आदि शामिल हैं। एक हजार युवाओं को रोजगार देने का लक्ष्य है।

बड़े उद्योग स्थापित करने के लिए उद्योग विभाग ने सदर तहसील के दुरेड़ी में 100 एकड़, पैलानी तहसील के सिंधनकलां में 120 एकड़, अतर्रा तहसील के तुर्रा गांव में 100 एकड़, बबेरू तहसील के मरका गांव में 50 एकड़ और नरैनी तहसील में 130 एकड़ जमीन का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। पहले से विकसित औद्योगिक आस्थान व कताई मिल की 209 एकड़ जमीन भी उद्योग के लिए प्रस्तावित की गई है।
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यहां उद्योगों के लिए समुचित पहुंच मार्ग, जल की उपलब्धता, 220/132 केवी सब स्टेशन, सीवर निकासी को ड्रेनेज और श्रमिकों की उपलब्धता बताई गई है। जमीन चयनित होने के बाद उद्यमियों से पूंजी निवेश के लिए अनुबंध किया जा रहा है। अब तक 20 उद्यमियों के अनुबंध पत्र तैयार कर शासन को भेजे जा चुके हैं।
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21 व 22 फरवरी को लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश इन्वेस्ट सबमिट कार्यशाला में मुख्यमंत्री के समक्ष यह उद्यमी अपनी बात रखेंगे। उद्योग विभाग के डिप्टी कमिश्नर सर्वेश कुमार दीक्षित ने बताया कि उद्योगों में पूंजी निवेश करने वाले उद्यमियों को शासन व विभाग की ओर से सभी सुविधाएं व छूट मुहैया कराई जाएंगी।

आधा दर्जन उद्योग बंद या गिन रहे अंतिम सांसें
बांदा। जिले में करीब आधा दर्जन उद्योग ठप हो चुके हैं या फिर अंतिम सांसें गिन रहे हैं। इनमें प्रमुख ठठराही उद्योग है। दो दशक पहले तक यहां के बने पीतल के बर्तन देश भर में मशहूर रहे। इस काम में तमाम कारीगर व श्रमिक रोजगार से जुड़े थे। अब इस नाम का मोहाल ही रह गया है।


इससे जुड़े कारीगर व श्रमिक दूसरे काम में लग गए। जिले का दोना-पत्तल उद्योग भी दम तोड़ रहा है। इस उद्योग से अभी सैकड़ा भर लोग जुड़े हैं। दरी और शजर पत्थर का उद्योग भी लगभग खात्मे की कगार पर हैं। अतर्रा का चावल उद्योग टूटने की कगार पर है। इसके खात्मे से हजारों बेरोजगार पलायन को मजबूर हो गए हैं।
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