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तिर्वा ने फिर दोहराया इतिहास
अमर उजाला ब्यूराो/कन्नौज
Updated Sat, 11 Mar 2017 11:56 PM IST
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प्रमाणपत्र लेते तिर्वा विधायक
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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चुनाव नतीजे आने शुरू हुए तो जिले में हर किसी की निगाह तिर्वा सीट पर टिकी थी। तिर्वा का भी अपना इतिहास रहा है यहां के वोटर ने जिस पार्टी के प्रत्याशी को विधानसभा भेजा, उसकी पार्टी ने सत्ता का स्वाद चखा। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। तिर्वा से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी कैलाश राजपूत ने भी भारी अंतर से सपा के मंत्री प्रत्याशी को मात दी।
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1996 में कैलाश सिंह राजपूत ने तिर्वा सीट से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ा और सपा से उस समय भी लड़ रहे विजय बहादुर पाल को 1760 वोटों से पराजित कर विधानसभा पहुंचे। तब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई। वहीं, 2002 के चुनाव में सपा के विजय बहादुर पाल ने बसपा के विजय सिंह विद्रोही को छह हजार 745 वोटाें से पराजित कर चुनाव जीता और सपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री चुने गए। इस बार भाजपा प्रत्याशी कैलाश राजपूत तीसरे नंबर पर गए।
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कैलाश ने भाजपा छोड़ बसपा की सदस्यता ले कर तिर्वा सीट से चुनाव लड़ा और सपा के विजय बहादुर पाल को 2936 वोटों से पराजित कर चुनाव जीत लिया। प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और मायावती मुख्यमंत्री। ऐसे ही 2012 में एक बार फिर सपा से विजय बहादुर पाल मैदान में उतरे और बसपा से कैलाश राजपूत। इस बार कैलाश राजपूत को सपा के विजय बहादुर पाल से 32 हजार 492 वोटों से हारना पड़ा। विजय बहादुर पाल यहां से विधायक चुने गए और सूबे ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया। इस बार फिर पासा पलटा।
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सपा से राज्यमंत्री विजय बहादुर पाल मैदान में थे और बसपा छोड़कर भाजपा से चुनाव लड़ रहे कैलाश राजपूत ने सपा प्रत्याशी को 24 हजार 209 वोटों से पटकनी दी। भाजपा ने तिर्वा सीट जीती तो भाजपा प्रदेश में प्रचंड बहुमत लेकर हाजिर हुई।
हमेशा सत्तापक्ष के विधायक रहे कैलाश राजपूत
कैलाश राजपूत राजनीतिक किस्मत के धनी हैं। यही कारण है कि वह हमेशा सत्ता पक्ष के विधायक रहे हैं। 1996 में भाजपा से, 2007 में बसपा से और 2017 में भाजपा से विधायक चुने गए। हर बार उनकी पार्टी सत्ता में आई।