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अज्ञानता के अंधकार मिटा रहीं सुमन
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Sun, 18 Oct 2015 11:35 PM IST
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स्कूली बच्चों को शिक्षित करने की ड्यूटी जिम्मेदारी
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से निभाने वाली प्राथमिक स्कूल कुंवरपुर बनवारी की प्रधानाध्यापिका सुमनलता
यादव उनके अभिभावकों को भी साक्षर करने में जुटी हैं। साक्षरता की अलख जगा
रही सुमनलता ने अब गांव की उन लड़कियों, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी है,
उन्हें सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाकर आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया
है।
अज्ञानता के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेकर शिक्षण कार्य करने वाली सुमनलता यादव की शादी उस समय कर दी गई थी, जब वह इंटर में थी। शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। स्नातक, परास्नातक और बीएड करने के बाद कुछ दिनों तक नगर के एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षण कार्य किया।
इस दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियां, सामाजिक झंझावतों के साथ लोगों के तानों की परवाह किए बगैर वह आगे बढ़ती गईं, फिर वर्ष 2006 में बेसिक शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई। वर्तमान में वह प्राथमिक स्कूल कुंवरपुर बनवारी में प्रधानाध्यापिका के पद पर तैनात हैं।
उन्होंने अपने प्रयासों से विद्यालय को जिले का आदर्श विद्यालय बनाने का गौरव दिलाया। अब तक कई पुरस्कार प्राप्त कर चुकी सुमनलता बताती हैं कि उन्होंने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के साथ ही उनके अभिभावकों को भी साक्षर करने का संकल्प लिया।
उन्होंने अभियान की शुरुआत स्कूल में तैनात चारों रसोइयों राजवती, मुन्नी देवी, रेशमा देवी और राजवती से की, जो पहले अंगूठा लगाती थीं। अब दस्तखत बनाने लगी हैं। उनका रहन-सहन भी बदल दिया। स्कूल के बच्चे ही ड्रेस पहनकर नहीं आते, बल्कि जब भी कोई आयोजन होता तो चारों रसोइया भी गुलाबी रंग की साड़ी में स्कूल में मौजूद होती हैं।
बताया कि रसोइयों के बच्चों की शिक्षा पर भी वह पूरा ध्यान देती हैं, उनके एडमीशन से लेकर फीस और शिक्षा तक के खर्च में वह सहयोग करती हैं। बताया कि रसोइया रेशमा के कैंसर पीड़ित पति अनंतराम की मौत पर उन्होंने लोगों से सहयोग लेकर उसे 12,500 रुपये की तत्काल मदद मुहैया कराई थी।
बताया कि गांव की 14 वर्ष से अधिक की जिन लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ दी है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और घर पर ही स्वरोजगार उपलब्ध कराने का भी उनके द्वारा प्रयास किया जा रहा है। गांव की ऐसी ही 13 लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाकर आत्मनिर्भर बनाने का भी काम कर रही हैं।
स्कूल प्रबंध समिति की छह महिला पदाधिकारियों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें साक्षर कर रही हैं। उनका कहना है कि अब तक मिले पुरस्कारों से मिली प्रोत्साहन धनराशि को वह स्कूल और बच्चों पर ही खर्च करती हैं। यहां तक कि उन्हें अपने वेतन से स्कूल पर पैसा खर्च करना पड़ जाता है।
इस वर्ष ड्रेस वितरण समारोह में उन्होंने माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री विजय बहादुर पाल के हाथों स्कूल में पढ़ने वाले मेधावी बच्चों की माताओं को भी सम्मानित कराया था। बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों में प्राथमिक विद्यालय कुंवरपुर बनवारी ही एक ऐसा मात्र विद्यालय है, जहां बच्चों के लिए पुस्तकालय का विधिवत संचालन होता है।
अज्ञानता के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेकर शिक्षण कार्य करने वाली सुमनलता यादव की शादी उस समय कर दी गई थी, जब वह इंटर में थी। शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। स्नातक, परास्नातक और बीएड करने के बाद कुछ दिनों तक नगर के एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षण कार्य किया।
इस दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियां, सामाजिक झंझावतों के साथ लोगों के तानों की परवाह किए बगैर वह आगे बढ़ती गईं, फिर वर्ष 2006 में बेसिक शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई। वर्तमान में वह प्राथमिक स्कूल कुंवरपुर बनवारी में प्रधानाध्यापिका के पद पर तैनात हैं।
उन्होंने अपने प्रयासों से विद्यालय को जिले का आदर्श विद्यालय बनाने का गौरव दिलाया। अब तक कई पुरस्कार प्राप्त कर चुकी सुमनलता बताती हैं कि उन्होंने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के साथ ही उनके अभिभावकों को भी साक्षर करने का संकल्प लिया।
उन्होंने अभियान की शुरुआत स्कूल में तैनात चारों रसोइयों राजवती, मुन्नी देवी, रेशमा देवी और राजवती से की, जो पहले अंगूठा लगाती थीं। अब दस्तखत बनाने लगी हैं। उनका रहन-सहन भी बदल दिया। स्कूल के बच्चे ही ड्रेस पहनकर नहीं आते, बल्कि जब भी कोई आयोजन होता तो चारों रसोइया भी गुलाबी रंग की साड़ी में स्कूल में मौजूद होती हैं।
बताया कि रसोइयों के बच्चों की शिक्षा पर भी वह पूरा ध्यान देती हैं, उनके एडमीशन से लेकर फीस और शिक्षा तक के खर्च में वह सहयोग करती हैं। बताया कि रसोइया रेशमा के कैंसर पीड़ित पति अनंतराम की मौत पर उन्होंने लोगों से सहयोग लेकर उसे 12,500 रुपये की तत्काल मदद मुहैया कराई थी।
बताया कि गांव की 14 वर्ष से अधिक की जिन लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ दी है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और घर पर ही स्वरोजगार उपलब्ध कराने का भी उनके द्वारा प्रयास किया जा रहा है। गांव की ऐसी ही 13 लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाकर आत्मनिर्भर बनाने का भी काम कर रही हैं।
स्कूल प्रबंध समिति की छह महिला पदाधिकारियों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें साक्षर कर रही हैं। उनका कहना है कि अब तक मिले पुरस्कारों से मिली प्रोत्साहन धनराशि को वह स्कूल और बच्चों पर ही खर्च करती हैं। यहां तक कि उन्हें अपने वेतन से स्कूल पर पैसा खर्च करना पड़ जाता है।
इस वर्ष ड्रेस वितरण समारोह में उन्होंने माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री विजय बहादुर पाल के हाथों स्कूल में पढ़ने वाले मेधावी बच्चों की माताओं को भी सम्मानित कराया था। बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों में प्राथमिक विद्यालय कुंवरपुर बनवारी ही एक ऐसा मात्र विद्यालय है, जहां बच्चों के लिए पुस्तकालय का विधिवत संचालन होता है।