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Kannauj News: दवा न स्टॉक, फर्जी बिलों से कमाने वाले 14 थोक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द
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संवाद न्यूज एजेंसी
कन्नौज। इत्रनगरी में फर्जी बिलों से कमाई करने वाले दवा विक्रेताओं पर औषधि विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। खाली गोदाम में बगैर दवा और स्टॉक के सहारे काला कारोबार करने वाले 14 थोक दवा विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। ये सभी विक्रेता छिबरामऊ, तिर्वा, गुरसहायगंज और शहर के हैं। जल्द ही निजी अस्पतालों में चलने वाली फॉर्मेसियों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। इन्हें दवाओं की वास्तविक कीमतों की सूची जारी करनी होगी।
स्वास्थ्य तंत्र को खोखला करने वाला यह खेल सिर्फ लाइसेंस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे टैक्स चोरी, कमीशनखोरी और काली कमाई का पूरा सिंडिकेट काम करता है। औषधि निरीक्षक ने डॉ. परमेश द्विवेदी ने बताया कि फर्रुखाबाद जिले में यह खेल पकड़ा गया था, जब आयुक्त के निर्देश पर इसकी जांच की गई तो पता चला कि इत्रनगरी में भी कई फर्में डमी कारोबार कर रहीं हैं। मतलब फर्रुखाबाद की एक फर्म के नाम पर बिल काटकर दवा बेची जा रही थी और उसका कमीशन संबंधित फर्म को दिया जा रहा था। सत्यापन में मामला सही पाए जाने पर लाइसेंस निरस्त कर रिपोर्ट आयुक्त को भेज दी गई है।
इस तरह होता काला कारोबार
फर्जी बिलिंग और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का खेल
डमी फर्में सिर्फ कागजों पर दवाइयों की खरीद-बिक्री (जीएसटी बिलिंग) दिखाती हैं। असल में दवा एक जगह से दूसरी जगह जाती ही नहीं, सिर्फ बिल घूमते हैं। इससे लाखों-करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी और फर्जी आईटीसी क्लेम किया जाता है।
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बिना बिल की अवैध बिक्री को संरक्षण
कई बार निर्माता कंपनियों या बड़े सप्लायरों से बिना बिल (कैश में) दवाइयां मंगवाई जाती हैं। इन अवैध और बिना रिकॉर्ड वाली दवा को खपाने के लिए इन डमी फर्मों के फर्जी बिलों का सहारा लिया जाता है, ताकि सरकारी एजेंसियों की नजरों में कागजी हिसाब ठीक दिखे।
एक्सपायरी और नकली दवाओं की री-साइक्लिंग
जब असली दवाओं का कोई भौतिक रिकॉर्ड नहीं होता तो डमी फर्मों के फर्जी लाइसेंस का इस्तेमाल करके एक्सपायर्ड या सब-स्टैंडर्ड (घटिया क्वालिटी) दवाओं को नए रैपर और नए फर्जी बैच नंबर के साथ मार्केट में उतार दिया जाता है।
लाइसेंस रेंटिंग और कमीशनखोरी
तकनीकी रूप से फार्मासिस्ट के नाम पर लाइसेंस ले लिया जाता है और उसे किसी गैर-अनुभवी या बिचौलिए को किराये पर चलाए जाने के लिए दे दिया जाता है। सिर्फ कागजी कोरम पूरा करके हर महीने कमीशन का खेल चलता है।
ब्लैक मनी को व्हाइट करने का जरिया
दवा क्षेत्र में मार्जिन अधिक होने के कारण डमी फर्मों के जरिए फर्जी टर्नओवर दिखाकर काले धन को वैध आय में तब्दील करने का बड़ा रैकेट चलाया जाता है। यह काम मार्केट में एक सिंडीकेट के जरिए होता है।
वर्जन
खाद्य एवं औषधि प्रशासन का उद्देश्य है कि जरूरतमंदों तक सस्ती और सुलभ दवा पहुंचें। दवा के थोक व्यापार में प्रतिमाह सरकार को करोड़ों रुपये का चूना डमी फर्मों के माध्यम से लगाया जा रहा है। ऐसी सभी फर्मों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। थोक विक्रेताओं को वेबसाइट पर पूरा ब्योरा अपलोड करना होगा।
-डॉ. रोशन जैकब, आयुक्त, खाद्य एवं औषधि प्रशासन
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कन्नौज। इत्रनगरी में फर्जी बिलों से कमाई करने वाले दवा विक्रेताओं पर औषधि विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। खाली गोदाम में बगैर दवा और स्टॉक के सहारे काला कारोबार करने वाले 14 थोक दवा विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। ये सभी विक्रेता छिबरामऊ, तिर्वा, गुरसहायगंज और शहर के हैं। जल्द ही निजी अस्पतालों में चलने वाली फॉर्मेसियों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। इन्हें दवाओं की वास्तविक कीमतों की सूची जारी करनी होगी।
स्वास्थ्य तंत्र को खोखला करने वाला यह खेल सिर्फ लाइसेंस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे टैक्स चोरी, कमीशनखोरी और काली कमाई का पूरा सिंडिकेट काम करता है। औषधि निरीक्षक ने डॉ. परमेश द्विवेदी ने बताया कि फर्रुखाबाद जिले में यह खेल पकड़ा गया था, जब आयुक्त के निर्देश पर इसकी जांच की गई तो पता चला कि इत्रनगरी में भी कई फर्में डमी कारोबार कर रहीं हैं। मतलब फर्रुखाबाद की एक फर्म के नाम पर बिल काटकर दवा बेची जा रही थी और उसका कमीशन संबंधित फर्म को दिया जा रहा था। सत्यापन में मामला सही पाए जाने पर लाइसेंस निरस्त कर रिपोर्ट आयुक्त को भेज दी गई है।
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इस तरह होता काला कारोबार
फर्जी बिलिंग और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का खेल
डमी फर्में सिर्फ कागजों पर दवाइयों की खरीद-बिक्री (जीएसटी बिलिंग) दिखाती हैं। असल में दवा एक जगह से दूसरी जगह जाती ही नहीं, सिर्फ बिल घूमते हैं। इससे लाखों-करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी और फर्जी आईटीसी क्लेम किया जाता है।
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बिना बिल की अवैध बिक्री को संरक्षण
कई बार निर्माता कंपनियों या बड़े सप्लायरों से बिना बिल (कैश में) दवाइयां मंगवाई जाती हैं। इन अवैध और बिना रिकॉर्ड वाली दवा को खपाने के लिए इन डमी फर्मों के फर्जी बिलों का सहारा लिया जाता है, ताकि सरकारी एजेंसियों की नजरों में कागजी हिसाब ठीक दिखे।
एक्सपायरी और नकली दवाओं की री-साइक्लिंग
जब असली दवाओं का कोई भौतिक रिकॉर्ड नहीं होता तो डमी फर्मों के फर्जी लाइसेंस का इस्तेमाल करके एक्सपायर्ड या सब-स्टैंडर्ड (घटिया क्वालिटी) दवाओं को नए रैपर और नए फर्जी बैच नंबर के साथ मार्केट में उतार दिया जाता है।
लाइसेंस रेंटिंग और कमीशनखोरी
तकनीकी रूप से फार्मासिस्ट के नाम पर लाइसेंस ले लिया जाता है और उसे किसी गैर-अनुभवी या बिचौलिए को किराये पर चलाए जाने के लिए दे दिया जाता है। सिर्फ कागजी कोरम पूरा करके हर महीने कमीशन का खेल चलता है।
ब्लैक मनी को व्हाइट करने का जरिया
दवा क्षेत्र में मार्जिन अधिक होने के कारण डमी फर्मों के जरिए फर्जी टर्नओवर दिखाकर काले धन को वैध आय में तब्दील करने का बड़ा रैकेट चलाया जाता है। यह काम मार्केट में एक सिंडीकेट के जरिए होता है।
वर्जन
खाद्य एवं औषधि प्रशासन का उद्देश्य है कि जरूरतमंदों तक सस्ती और सुलभ दवा पहुंचें। दवा के थोक व्यापार में प्रतिमाह सरकार को करोड़ों रुपये का चूना डमी फर्मों के माध्यम से लगाया जा रहा है। ऐसी सभी फर्मों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। थोक विक्रेताओं को वेबसाइट पर पूरा ब्योरा अपलोड करना होगा।
-डॉ. रोशन जैकब, आयुक्त, खाद्य एवं औषधि प्रशासन