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चार दिन के सफर में तीन बार नसीब हुआ खाना
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कन्नौज के ओबर ब्रिज के नीचे रुकी बस से उतर कर तरबूज खा कर भूख मिटाते गपरपग्राम से लौटे प्रवासी लोग
- फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। आंध्र प्रदेश के गंटूर से भूखे-प्यासे लौट रहे मुजफ्फरनगर के कामगार शहर में रोडवेज बस के रुकते ही तरबूज पर टूट पड़े। उन्होंने भरपेट तरबूज खाया तो उनके मुरझाए चेहरे खिल उठे। बताया कि सफर के दौरान चार दिन में तीन बार खाना नसीब हो सका। घर पहुंचने की ललसा में भूख को काबू रखा लेकिन कन्नौज पहुंचने पर हिम्मत जवाब दे गई। बताया मुश्किल भरे ये दिन कभी नहीं भूलेंगे।
आंध्र प्रदेश के गंटूर शहर में काम करने वाले प्रवासी कामगारों को कई प्रयासों के बाद घर जाने का मौका मिला। गंटूर शहर से 21 मई को प्रवासी लोगों को लेकर ट्रेन गोरखपुर के लिए रवाना हुई। इसमें मुजफ्फरनगर के 35 लोग सवार थे। इन सभी को गोरखपुर से रोडवेज बस पर बैठाकर मुजफ्फरनगर के लिए रवाना किया गया।
यात्री रईस अहमद ने बताया कि जिस फैक्ट्री में काम करते थे, वह बंद हो गई। कुछ दिन तो कमरे में काम चला लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो दिक्कतें बढ़ने लगी। कोई उधार भी नहीं दे रहा था। कई रोज तो एक वक्त का खाना नसीब होता। असरफ ने बताया वह अपना निजी कारोबार करते थे। लॉकडाउन में बंद हो गया। जो पैसा था वह भी खत्म हो गया। कभी-कभी भूखे पेट भी सोना पड़ा। 14 मई को गंटूर से उत्तर प्रदेश के लिए ट्रेन चलाए जाने की सूचना मिली। तब सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचकर टिकट खरीदा।
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ट्रेन में एक स्थान पर खाना दिया गया। चार दिन के सफर में मात्र तीन बार खाना नसीब हुआ। बस यही यही सोच रहा था, कि किसी तरह घर पहुंच जाऊं। अब जल्दी घर छोड़कर नहीं निकलेंगे। गोरखपुर से बस पर बैठने के दौरान खाना दिया गया। यहां कन्नौज में बस खड़ी हुई तो तरबूज दिखाई दिए तो भूख को रोक नहीं सके।
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आंध्र प्रदेश के गंटूर शहर में काम करने वाले प्रवासी कामगारों को कई प्रयासों के बाद घर जाने का मौका मिला। गंटूर शहर से 21 मई को प्रवासी लोगों को लेकर ट्रेन गोरखपुर के लिए रवाना हुई। इसमें मुजफ्फरनगर के 35 लोग सवार थे। इन सभी को गोरखपुर से रोडवेज बस पर बैठाकर मुजफ्फरनगर के लिए रवाना किया गया।
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यात्री रईस अहमद ने बताया कि जिस फैक्ट्री में काम करते थे, वह बंद हो गई। कुछ दिन तो कमरे में काम चला लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो दिक्कतें बढ़ने लगी। कोई उधार भी नहीं दे रहा था। कई रोज तो एक वक्त का खाना नसीब होता। असरफ ने बताया वह अपना निजी कारोबार करते थे। लॉकडाउन में बंद हो गया। जो पैसा था वह भी खत्म हो गया। कभी-कभी भूखे पेट भी सोना पड़ा। 14 मई को गंटूर से उत्तर प्रदेश के लिए ट्रेन चलाए जाने की सूचना मिली। तब सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचकर टिकट खरीदा।
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ट्रेन में एक स्थान पर खाना दिया गया। चार दिन के सफर में मात्र तीन बार खाना नसीब हुआ। बस यही यही सोच रहा था, कि किसी तरह घर पहुंच जाऊं। अब जल्दी घर छोड़कर नहीं निकलेंगे। गोरखपुर से बस पर बैठने के दौरान खाना दिया गया। यहां कन्नौज में बस खड़ी हुई तो तरबूज दिखाई दिए तो भूख को रोक नहीं सके।