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डीएम ही नहीं, नेताओं को भी घेर रहा गेहूं में मिलावट की कालिख का धुआं
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झांसी। गेहूं में बालू की मिलावट का मामला काजल की कोठरी होता जा रहा है। मिलावट की दोषी फर्म को दंड की जगह पूरी दरियादिली से जिलाधिकारी की क्लीनचिट तो प्रश्नों में है ही, सूत्रों के अनुसार इस गोरखधंधे में सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं का भी हाथ है। दरअसल जिस सोसायटी ने गेहूं खरीद की उसके तार सीधे कुछ रसूखदार नेताओं से जुड़े हैं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मिलावट और भ्रष्टचार का भांडाफोड़ होते ही ये लोग राजनीतिक आकाओं की शरण में पहुंच गए। उनके हस्तक्षेप के बाद से मामला रफा-दफा किया जाने लगा। दूसरी ओर जिलाधिकारी द्वारा मामले में यू टर्न लेने पर तरह-तरह की चर्चा होती रहीं। उधर, मंडलायुक्त सुभाष चंद्र शर्मा ने कहा कि वे पूरे मामले की जांच कराएंगे।
एक हजार गेहूं के बोरों में बालू भर कर पीसीएफ गोदाम तक पहुंचना और मामले में दोषी फर्म के संचालक को क्लीन चिट अब प्रशासन के गले की हड्डी बन गया है। ललितपुर के जिलाधिकारी समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से चुप्पी साध ली है। बृहस्पतिवार को दिन भर कलक्ट्रेट, बाजारों, चौराहों से लेकर घर-घर मामले पर चर्चा होती रही। कांग्रेस ने जिलाधिकारी की भूमिका के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मिलावट की कालिख में सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं के हाथ भी काले हैं। जिस सोसायटी द्वारा गेहूं खरीदा गया वहां इन नेताओं का सीधा हस्तक्षेप था। मामले के सार्वजनिक होते ही इन नेताओं ने शासन स्तर पर अपने आकाओं की शरण ली।
इसके बाद से प्रशासनिक तेवर ढीले पड़ गए। कार्रवाई का दंभ भर रहे जिलाधिकारी ने खुद मिलावट की दोषी फर्म को क्लीनचिट दे दी। प्रशासनिक अफसरों और राजनेताओं की सांठगांठ और रसूख का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मिलावट के इस गोरखधंधे में शासन को आर्थिक नुकसान के साथ ही साख का भी नुकसान हुआ है। एफसीआई द्वारा रिजेक्ट गेहूं की खरीद, लोडिंग, अनलोडिंग डिस्पैच तक हर बिंदु पर सरकारी नुमाइंदों की निगरानी होती है। वहीं, एक हजार गेहूं के बोरों का भुगतान भी सरकार के खजाने से हुआ है। मंडलायुक्त ने मामले को गंभीर मानते हुए जांच, पड़ताल कराने की बात कही है।
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एक हजार गेहूं के बोरों में बालू भर कर पीसीएफ गोदाम तक पहुंचना और मामले में दोषी फर्म के संचालक को क्लीन चिट अब प्रशासन के गले की हड्डी बन गया है। ललितपुर के जिलाधिकारी समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से चुप्पी साध ली है। बृहस्पतिवार को दिन भर कलक्ट्रेट, बाजारों, चौराहों से लेकर घर-घर मामले पर चर्चा होती रही। कांग्रेस ने जिलाधिकारी की भूमिका के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मिलावट की कालिख में सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं के हाथ भी काले हैं। जिस सोसायटी द्वारा गेहूं खरीदा गया वहां इन नेताओं का सीधा हस्तक्षेप था। मामले के सार्वजनिक होते ही इन नेताओं ने शासन स्तर पर अपने आकाओं की शरण ली।
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इसके बाद से प्रशासनिक तेवर ढीले पड़ गए। कार्रवाई का दंभ भर रहे जिलाधिकारी ने खुद मिलावट की दोषी फर्म को क्लीनचिट दे दी। प्रशासनिक अफसरों और राजनेताओं की सांठगांठ और रसूख का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मिलावट के इस गोरखधंधे में शासन को आर्थिक नुकसान के साथ ही साख का भी नुकसान हुआ है। एफसीआई द्वारा रिजेक्ट गेहूं की खरीद, लोडिंग, अनलोडिंग डिस्पैच तक हर बिंदु पर सरकारी नुमाइंदों की निगरानी होती है। वहीं, एक हजार गेहूं के बोरों का भुगतान भी सरकार के खजाने से हुआ है। मंडलायुक्त ने मामले को गंभीर मानते हुए जांच, पड़ताल कराने की बात कही है।
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