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Jhansi News: कल्पवृक्ष के समान है श्रीमद्भागवत कथा
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संवाद न्यूज एजेंसी डोंगराखुर्द (ललितपुर)। कथा व्यास विद्या भारती ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा कल्पवृक्ष के समान है। भक्तों को निर्मल भाव से कथा सुनने और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए, तभी उसका फल मिलता है। वह बुधवार को पंडवन धाम पर श्रीमद्भागवत कथा का वर्णन कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि भागवत कथा ही साक्षात कृष्ण है और जो कृष्ण है, वही साक्षात भागवत है। भागवत कथा भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। भागवत की महिमा सुनाते हुए कहा कि एक बार नारदजी ने चारों धाम की यात्रा की, लेकिन उनके मन को शांति नहीं हुई। नारद जी वृंदावन धाम की ओर जा रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक सुंदर युवती की गोद में दो बुजुर्ग लेटे हुए थे, जो अचेत थे। युवती बोली महाराज मेरा नाम भक्ति है। ये दोनों मेरे पुत्र हैं, जिनके नाम ज्ञान और वैराग्य हैं। ये वृंदावन में दर्शन करने जा रहे थे, लेकिन ब्रज में प्रवेश करते ही ये दोनों अचेत हो गए। आप इन्हें जगा दीजिए।
देवर्षि नारद जी ने चारों वेद, छहों शास्त्र और 18 पुराण व गीता पाठ भी सुना दिया, लेकिन वह नहीं जागे। नारद ने यह समस्या मुनियों के समक्ष रखी। ज्ञान, वैराग्य को जगाने का उपाय पूछा। उन्होंने कहा कि गलती करने के बाद क्षमा मांगना मनुष्य का गुण है। दूसरे की गलती को बिना द्वेष के जो क्षमा कर दे, वह मनुष्य महात्मा होता है। भगवान को कहीं खोजने की जरूरत नहीं। वह सबके हृदय में मौजूद हैं।
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उन्होंने कहा कि भागवत कथा ही साक्षात कृष्ण है और जो कृष्ण है, वही साक्षात भागवत है। भागवत कथा भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। भागवत की महिमा सुनाते हुए कहा कि एक बार नारदजी ने चारों धाम की यात्रा की, लेकिन उनके मन को शांति नहीं हुई। नारद जी वृंदावन धाम की ओर जा रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक सुंदर युवती की गोद में दो बुजुर्ग लेटे हुए थे, जो अचेत थे। युवती बोली महाराज मेरा नाम भक्ति है। ये दोनों मेरे पुत्र हैं, जिनके नाम ज्ञान और वैराग्य हैं। ये वृंदावन में दर्शन करने जा रहे थे, लेकिन ब्रज में प्रवेश करते ही ये दोनों अचेत हो गए। आप इन्हें जगा दीजिए।
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देवर्षि नारद जी ने चारों वेद, छहों शास्त्र और 18 पुराण व गीता पाठ भी सुना दिया, लेकिन वह नहीं जागे। नारद ने यह समस्या मुनियों के समक्ष रखी। ज्ञान, वैराग्य को जगाने का उपाय पूछा। उन्होंने कहा कि गलती करने के बाद क्षमा मांगना मनुष्य का गुण है। दूसरे की गलती को बिना द्वेष के जो क्षमा कर दे, वह मनुष्य महात्मा होता है। भगवान को कहीं खोजने की जरूरत नहीं। वह सबके हृदय में मौजूद हैं।
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