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रेमडेसिविर नहीं था तो स्टेरॉयड से भी दुरुस्त कर दिए कई मरीज
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झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में पिछले चार दिनों से एक भी रेमडेसिविर इंजेक्शन नहीं था। ऐसे में डॉक्टरों ने हल्के और मध्यम लक्षण वाले 50 से अधिक कोरोना मरीजों को स्टेरॉयड देकर बिल्कुल दुरुस्त कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना के हर मरीजों के लिए रेमडेसिविर इंजेक्शन जरूरी नहीं है। बेवजह इंजेक्शन लगाने से इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर इन दिनों हो हल्ला मचा हुआ है। बाजार में इसकी जबरदस्त कालाबाजारी चल रही है। मेडिकल कॉलेज में कोरोना के गंभीर मरीज भर्ती होने के बावजूद पिछले चार दिनों से एक भी इंजेक्शन नहीं मिल सका। ऐसे में डॉक्टरों ने स्टेरॉयड इंजेक्शन और टैबलेट से मरीजों का इलाज किया। डॉक्टरों के मुताबिक इसके काफी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। कोरोना होने पर मरीज की खुद की प्रतिरोधक क्षमता शरीर के विपरीत काम करने लगती है। बाद में मरीज की सांस फूलने लगती है और निमोनिया हो जाता है। वायरस शरीर में जाकर प्रतिरोधक क्षमता वाले सेल के प्रवेश कर जाता है। फिर इम्यून सेल बहुत अधिक इकट्ठे हो जाते हैं और जिस सेल में वायरस है, उसको मारने लगते हैं। इन ओवर एक्टिव इम्यून सेल को स्टेरॉयड से नियंत्रित किया जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक काफी सेल एकत्र होने से खून गाढ़ा होने से थक्के जमने लगते हैं। फिर खून के थक्के से बचाव का इंजेक्शन दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज में हल्के और मध्यम लक्षण वाले कोरोना के 50 मरीजों को स्टेरॉयड देकर बीमारी को बढ़ने नहीं दिया गया और मरीजों को पूरी तरह स्वस्थ हो गए।
कोरोना के हर मरीज को रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है। बेवजह इंजेक्शन लगा देने से मरीज को दुष्परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। रेमडेसिविर लगाने से पहले मरीज के लिवर और किडनी फंक्शन टेस्ट कराना भी जरूरी है। - डॉ. अंशुल जैन, नोडल अधिकारी कोविड, मेडिकल कॉलेज।
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रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर इन दिनों हो हल्ला मचा हुआ है। बाजार में इसकी जबरदस्त कालाबाजारी चल रही है। मेडिकल कॉलेज में कोरोना के गंभीर मरीज भर्ती होने के बावजूद पिछले चार दिनों से एक भी इंजेक्शन नहीं मिल सका। ऐसे में डॉक्टरों ने स्टेरॉयड इंजेक्शन और टैबलेट से मरीजों का इलाज किया। डॉक्टरों के मुताबिक इसके काफी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। कोरोना होने पर मरीज की खुद की प्रतिरोधक क्षमता शरीर के विपरीत काम करने लगती है। बाद में मरीज की सांस फूलने लगती है और निमोनिया हो जाता है। वायरस शरीर में जाकर प्रतिरोधक क्षमता वाले सेल के प्रवेश कर जाता है। फिर इम्यून सेल बहुत अधिक इकट्ठे हो जाते हैं और जिस सेल में वायरस है, उसको मारने लगते हैं। इन ओवर एक्टिव इम्यून सेल को स्टेरॉयड से नियंत्रित किया जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक काफी सेल एकत्र होने से खून गाढ़ा होने से थक्के जमने लगते हैं। फिर खून के थक्के से बचाव का इंजेक्शन दिया जाता है। मेडिकल कॉलेज में हल्के और मध्यम लक्षण वाले कोरोना के 50 मरीजों को स्टेरॉयड देकर बीमारी को बढ़ने नहीं दिया गया और मरीजों को पूरी तरह स्वस्थ हो गए।
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कोरोना के हर मरीज को रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है। बेवजह इंजेक्शन लगा देने से मरीज को दुष्परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। रेमडेसिविर लगाने से पहले मरीज के लिवर और किडनी फंक्शन टेस्ट कराना भी जरूरी है। - डॉ. अंशुल जैन, नोडल अधिकारी कोविड, मेडिकल कॉलेज।
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