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झांसी की आबोहवा में भी ‘जहर’, बन सकते कैंसर का कारण
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झांसी। झांसी की आबोहवा में भी जहर घुला हुआ है। यहां अल्ट्रा वॉयलेट (परा बैगनी) किरणें बहुत तेज होने से लेकर वातावरण में कई ऐसे तत्व अधिक मात्रा में मौजूद हैं, जो शरीर में आंख, त्वचा से लेकर कैंसर रोग तक का कारण बन सकते हैं। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ताजा स्टडी में ये बात सामने आई है।
बीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की छात्रा दीप्ति भिलवरे ने समन्वयक डॉ. स्मृति त्रिपाठी के निर्देशन में दिसंबर 2021 से जून 2022 तक झांसी-ओरछा मार्ग पर स्टडी की। सड़क किनारे हर एक किलोमीटर पर छह फीट की ऊंचाई पर लगी नीम, पीपल, बरगद के पेड़ों की पत्तियों को तोड़ा और उसमें लगी धूल में से भारी धातु (हेवी मेटल) को अलग किया। फिर पत्तियों का जैव रासायनिक विश्लेषण कर क्लोरोफिल की जांच की। समन्वयक डॉ. स्मृति त्रिपाठी ने बताया कि क्लोरोफिल सामान्य मात्रा से डेढ़ गुना से ज्यादा मिला है। क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को पकड़ने के लिए पौधों द्वारा उपयोग किया जाने वाला प्रमुख तत्व है। ये पत्तों के हरे रंग का कारण है। इसके बढ़ने का मतलब अल्ट्रा वायलट किरणें बहुत तेज हैं। ऐसे में मोतियाबिंद से लेकर त्वचा की बीमारियां हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि तापमान बढ़ाने का प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाली नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड होती है। इससे ओजोन गैस बनने लगती है। फिर ये शरीर में जाकर कैंसर का कारण बन जाती है।
इसके अलावा शोध में आयरन, जिंक की मात्रा करीब डेढ़ गुनी मिली है। ये तत्व सांस के जरिए शरीर में जाते हैं तो फेफड़ों का कैंसर कर सकते हैं। वहीं, मुंह से प्रवेश करने पर अल्सर के अलावा आंत का कैंसर होने की आशंका रहती है।
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शोध में ये परिणाम आए सामने
तत्व इतना मात्रा होनी चाहिए इतनी मिला
क्लोरोफिल 12 एमजी प्रति मीटर क्यूब 21 एमजी प्रति मीटर क्यूब
आयरन 5-6 एमजी प्रति मीटर क्यूब 7-8 एमजी प्रति मीटर क्यूब
जिंक 10 एमजी प्रति मीटर क्यूब 13 एमजी प्रति मीटर क्यूब
इन बातों का रखें ध्यान
- बेतहाशा बढ़ रही वाहनों की संख्या को नियंत्रित करना होगा।
- पेट्रोल-डीजल के बजाए इलेक्ट्रिक वाहन का उपयोग ज्यादा करें।
- संभव हो तो अलग-अलग की बजाए वाहन साझा करके साथ जाएं।
- अधिक से अधिक पौधे लगाएं।
- सड़क किनारे वाले घरों में वर्टिकल ग्रीनरी (छत से जमीन तक आने वाले पौधे) लगाएं।
- एक्स्ट्रा प्रीमियम वाले पेट्रोल से वाहनों के धुएं से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड कम निकलती है।
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बीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की छात्रा दीप्ति भिलवरे ने समन्वयक डॉ. स्मृति त्रिपाठी के निर्देशन में दिसंबर 2021 से जून 2022 तक झांसी-ओरछा मार्ग पर स्टडी की। सड़क किनारे हर एक किलोमीटर पर छह फीट की ऊंचाई पर लगी नीम, पीपल, बरगद के पेड़ों की पत्तियों को तोड़ा और उसमें लगी धूल में से भारी धातु (हेवी मेटल) को अलग किया। फिर पत्तियों का जैव रासायनिक विश्लेषण कर क्लोरोफिल की जांच की। समन्वयक डॉ. स्मृति त्रिपाठी ने बताया कि क्लोरोफिल सामान्य मात्रा से डेढ़ गुना से ज्यादा मिला है। क्लोरोफिल प्रकाश ऊर्जा को पकड़ने के लिए पौधों द्वारा उपयोग किया जाने वाला प्रमुख तत्व है। ये पत्तों के हरे रंग का कारण है। इसके बढ़ने का मतलब अल्ट्रा वायलट किरणें बहुत तेज हैं। ऐसे में मोतियाबिंद से लेकर त्वचा की बीमारियां हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि तापमान बढ़ाने का प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाली नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड होती है। इससे ओजोन गैस बनने लगती है। फिर ये शरीर में जाकर कैंसर का कारण बन जाती है।
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इसके अलावा शोध में आयरन, जिंक की मात्रा करीब डेढ़ गुनी मिली है। ये तत्व सांस के जरिए शरीर में जाते हैं तो फेफड़ों का कैंसर कर सकते हैं। वहीं, मुंह से प्रवेश करने पर अल्सर के अलावा आंत का कैंसर होने की आशंका रहती है।
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शोध में ये परिणाम आए सामने
तत्व इतना मात्रा होनी चाहिए इतनी मिला
क्लोरोफिल 12 एमजी प्रति मीटर क्यूब 21 एमजी प्रति मीटर क्यूब
आयरन 5-6 एमजी प्रति मीटर क्यूब 7-8 एमजी प्रति मीटर क्यूब
जिंक 10 एमजी प्रति मीटर क्यूब 13 एमजी प्रति मीटर क्यूब
इन बातों का रखें ध्यान
- बेतहाशा बढ़ रही वाहनों की संख्या को नियंत्रित करना होगा।
- पेट्रोल-डीजल के बजाए इलेक्ट्रिक वाहन का उपयोग ज्यादा करें।
- संभव हो तो अलग-अलग की बजाए वाहन साझा करके साथ जाएं।
- अधिक से अधिक पौधे लगाएं।
- सड़क किनारे वाले घरों में वर्टिकल ग्रीनरी (छत से जमीन तक आने वाले पौधे) लगाएं।
- एक्स्ट्रा प्रीमियम वाले पेट्रोल से वाहनों के धुएं से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड कम निकलती है।