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Jhansi News: ड्रग पार्क बनने से बढ़ेगा जड़ी-बूटी का व्यापार
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। सहरिया आदिवासी जंगलों से जड़ी बूटी का दोहन करते हैं, लेकिन इसका उचित मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने कदम पीछे खींच लिया है। अब वन विभाग ने जड़ी बूटी कारोबार को बल्क ड्रग पार्क से जोड़ने का निर्णय लिया है। इससे आदिवासियों को जड़ी बूटी का उचित दाम मिलेगा, साथ ही वनों को विकसित किया जाएगा।
बुंदेलखंड का ललितपुर जिला अनादि काल से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। इसी कारण च्यवन ऋषि ने यहां आश्रम बनाकर इसे विश्वभर में प्रचलित किया। मड़ावरा, गौना व ललितपुर वन क्षेत्र में जड़ी-बूटियां बहुतायत में हैं। यहां अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सफेद मूसली समेत कई अन्य अमूल्य औषधियां मिलती हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक मूसली, अश्वगंधा, प्लाश, शंखपुष्पी, भूमि आंवला, खेर के बीज, गांद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी-बूटी विलुप्त हो गई है।
वन विभाग ने इस कारोबार को विकसित करने के लिए अब नई कार्ययोजना तैयार की है। यहां संचालित होने जा रहे बल्क ड्रग पार्क से इसे जोड़कर संभावनाएं तलाशने की योजना है। ड्रग पार्क को आयुर्वेदिक औषधि कारोबार से सीधे जोड़ने की तैयारी है।
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नहीं मिलती सही कीमत : जड़ी इकट्ठा करने के लिए अभी वन निगम का कोई केंद्र नहीं है। आदिवासी जंगलों से जड़ी बूटी का दोहन कर निजी व्यापारियों के यहां बेचते हैं। उन्हें बाजार में इसकी असल कीमत का दस प्रतिशत ही मिल पाता है, जिससे उनका गुजारा नहीं हो पाता। यही कारण है कि अब आदिवासी जड़ी बूटी का दोहन छोड़ मजदूरी के लिए अन्य जिलों में पलायन कर रहे हैं।
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जड़ी-बूटी कारोबार को बल्क ड्रग पार्क से जोड़ने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। आयुर्वेदिक कंपनियों को जिन औषधियों की आवश्यकता होती है, उसके लिए आयुष वनों की स्थापना की जाएगी। इससे जंगलों पर आश्रित लोगों को रोजगार मिलेगा।
गौतम सिंह, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी।
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ललितपुर। सहरिया आदिवासी जंगलों से जड़ी बूटी का दोहन करते हैं, लेकिन इसका उचित मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने कदम पीछे खींच लिया है। अब वन विभाग ने जड़ी बूटी कारोबार को बल्क ड्रग पार्क से जोड़ने का निर्णय लिया है। इससे आदिवासियों को जड़ी बूटी का उचित दाम मिलेगा, साथ ही वनों को विकसित किया जाएगा।
बुंदेलखंड का ललितपुर जिला अनादि काल से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। इसी कारण च्यवन ऋषि ने यहां आश्रम बनाकर इसे विश्वभर में प्रचलित किया। मड़ावरा, गौना व ललितपुर वन क्षेत्र में जड़ी-बूटियां बहुतायत में हैं। यहां अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सफेद मूसली समेत कई अन्य अमूल्य औषधियां मिलती हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक मूसली, अश्वगंधा, प्लाश, शंखपुष्पी, भूमि आंवला, खेर के बीज, गांद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी-बूटी विलुप्त हो गई है।
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वन विभाग ने इस कारोबार को विकसित करने के लिए अब नई कार्ययोजना तैयार की है। यहां संचालित होने जा रहे बल्क ड्रग पार्क से इसे जोड़कर संभावनाएं तलाशने की योजना है। ड्रग पार्क को आयुर्वेदिक औषधि कारोबार से सीधे जोड़ने की तैयारी है।
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नहीं मिलती सही कीमत : जड़ी इकट्ठा करने के लिए अभी वन निगम का कोई केंद्र नहीं है। आदिवासी जंगलों से जड़ी बूटी का दोहन कर निजी व्यापारियों के यहां बेचते हैं। उन्हें बाजार में इसकी असल कीमत का दस प्रतिशत ही मिल पाता है, जिससे उनका गुजारा नहीं हो पाता। यही कारण है कि अब आदिवासी जड़ी बूटी का दोहन छोड़ मजदूरी के लिए अन्य जिलों में पलायन कर रहे हैं।
जड़ी-बूटी कारोबार को बल्क ड्रग पार्क से जोड़ने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। आयुर्वेदिक कंपनियों को जिन औषधियों की आवश्यकता होती है, उसके लिए आयुष वनों की स्थापना की जाएगी। इससे जंगलों पर आश्रित लोगों को रोजगार मिलेगा।
गौतम सिंह, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी।