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नवरात्र के साथ ही लोगों के कानों में रस घोलेगा पूछत पूछत आए हैं नारे सुआटा गीत

Fri, 08 Oct 2021 01:51 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 08 Oct 2021 01:51 AM IST
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Along with Navratri, people's ears will swell, asking questions, asking for slogans, Suata Geet
झांसी। बृहस्पतिवार से शारदीय नवरात्र शुरू होते ही सूरज की पहली किरण के साथ ही बालिकाओं की मधुर आवाज में सुआटा गीत की मधुर ध्वनि गूंजने लगेगी। बुंदेलखंड के इस लोकपर्व में घरों के दरवाजों पर बने सुआटा के पुतलों के सामने बालिकाओं का समूह पहले रंगोली बनाता है तथा इसके बाद, पूछत-पूछत आए हैं नारे सुआटा, कौन है भैया री तोर पौर, यह सुआटा गीत भोर की बेला में लोगों के कानों रस घोल देता है।
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बालिकाओं का यह पर्व पूरे दस दिन तक चलता है। इस दौरान बुंदेली लोक कला व संस्कृति के अनूठे रंग भी देखने को मिलेंगे। भले ही बुंदेली लोक परंपराओं को शहरी क्षेत्र में विस्मृत कर दिया हो पर ग्रामीण अंचलों में बालिकाएं इन्हें जीवित किए हुए हैं। नवरात्र पर जहां माता के भक्ति गीत गूंजने लगेगें, वहीं सुआटा और मामुलिया के स्वर भी सुनाई देंगे।
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मोह लेती है मन सुआटा की रंगोलियां
शारदीय नवरात्र पर जगह-जगह सुआटा खेला जाता है। इसमें दीवार पर पुतला बनाया जाता है। मान्यता है कि यह नरकासुर राक्षस है, जिसका श्रीकृष्ण भगवान ने वध किया था। यह राक्षस कुंवारी कन्याओं से अपनी पूजा कराता था। सुआटा के अंतर्गत कुंवारी लड़कियां राक्षस की मूर्ति बनाती हैं। उसके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बनाए जाते हैं। चबूतरे पर गोबर से चौक बनाकर लड़कियां सुबह आकर्षक रंगों से रंगोलियां बनाती हैं। प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी , पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी व नवमी तक इन चौकों की संख्या बढ़ती जाती है। बुंदेली संस्कृति के जानकारों के अनुसार नवमी-दशमी को सुआटा की पूजा की जाती है।
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बेला, चंपा, तुरईया के फूल
बुंदेलखंड में नवरात्र पर मामुलिया खेलने की परंपरा है। यह पंचमी पर खेला जाता है। इसमें लड़कियां बेर अथवा बबूल की कंटीली झाड़ियों को लेकर उसे आकर्षक सजाती हैं। इसमें मामुलिया के आए लिवऊआ छमक चली मोरी ममुलिया, बेला, चंपा, तुरइया के फूल ल्याओ, सजाओ मेरी मामुलिया गीत गाती हैं और घर-घर जाती हैं। अष्टमी पर झिंझिया खेला जाता है। इसमें मिट्टी के मटके में प्रज्ज्वलित दीपक रखा जाता है। इसे भी बालिकाएं घर-घर ले जाती है। वहीं लड़के टेसू खेलते हैं।
नवरात्र पर बोए जाते हैं जवारे, होती है पूजा
नवरात्र पर जवारे बोये जाने की परंपरा है। मिट्टी के कलश अथवा खप्पर में जवारे बोये जाते हैं। यह देवी माता की शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं। इनकी विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। जवारों से अच्छी फसल का अनुमान भी लगाया जाता है।

नवरात्र पर सुआटा, मामुलिया आदि लोक पर्व और परंपराएं कला-संस्कृति को बढ़ावा देती हैं। मान्यता है कि सुआटा और टेसू खेलने का प्रचलन महाभारत काल से है।
डॉ. मधु श्रीवास्तव, बुंदेली लोक कलाविद और वरिष्ठ चित्रकार
बुंदेलखंड की लोक कला की परंपराएं काफी प्राचीन हैं। यह एकजुटता और समरसता को बढ़ावा देती हैं। सभी स्कूल कॉलेजों में बुंदेली लोक पर्वों और परंपराओं के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
अर्चना अवस्थी, प्रधानाचार्या, सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, सदर बाजार
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