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अफसरों की उदासीनता में फंसा बीस गांवों का विकास
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20 village development caught in files
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झांसी। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री ग्राम विकास योजना करीब डेढ़ साल बाद भी परवान नहीं चढ़ सकी। योजना सिर्फ गांवों के चयन तक ही सिमटी है। जिन बीस गांवों का चयन हुआ वहां आज तक कोई काम शुरू नहीं हो सका है।
ग्रामीण इलाकों को बेहतर बनाने के मकसद से केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष इस योजना को जोर-शोर के साथ लांच किया था। इसके जरिए जनपद में बीस गांव चयनित किए जाने थे। चयनित गांवों में केंद्र सरकार की मदद से सड़क, नाली, पेयजल, स्कूल, सामूहिक रोजगार, पंचायत भवन आदि की व्यवस्था के साथ ही ग्रामीणों की मैपिंग भी की जानी थी। योजना के संचालन का जिम्मा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को दिया गया। मंत्रालय की ओर से पिछले अक्तूबर महीने में केंद्रीय टीम यहां आई। टीम ने कई बिंदूओं के आधार पर बीस गांव-बसेरी, बुधावली, छकरा, गढ़मऊ, दुरकौरा, धरवाई, हरधुवा, जावौरा, लबेहरा, मोतीकटरा, निपन, पहाड़ीबुर्जुग, परवई, रोनी, सिरौरी, तिलहैरा आदि चिह्नित किए। पहली किस्त के तौर पर प्रत्येक गांव में बीस लाख रुपये से काम शुरू किया जाना था। काम की रूपरेखा तय करने को कमेटी बनाई गई। इसे बैठक करके प्रस्तावित कार्य मंजूूर करने थे।
दिसंबर से काम शुरू होना था लेकिन, हैरानी की बात यह कि काम की रूपरेखा तय करने वाली कमेटी की बैठक ही उस समय तक नहीं हुई। इसके बाद केंद्र सरकार ने फरवरी एवं मार्च में रिमाइंडर भेजकर काम शुरू कराने को कहा लेकिन, काम तय नहीं किए गए। उसके बाद कोरोना महामारी ने इसमें लापरवाही बरतने वाले अफसरों को अपनी खामी छिपाने का एक मौका ही थमा दिया। अफसरों की दिलचस्पी न लेने की वजह से इन गांवों में जीवन को सुविधाजनक बनाने का कोई भी काम नहीं कराया जा सका जबकि केंद्र सरकार ने बजट देने का भरोसा भी दिलाया था। वहीं, जिला समाज कल्याण अधिकारी, विकास सुनील कुमार का कहना है कि इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। प्रस्ताव तैयार हो चुके हैं। मंजूरी मिलने के बाद यहां कार्य शुरू कराए जाएंगे।
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ग्रामीण इलाकों को बेहतर बनाने के मकसद से केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष इस योजना को जोर-शोर के साथ लांच किया था। इसके जरिए जनपद में बीस गांव चयनित किए जाने थे। चयनित गांवों में केंद्र सरकार की मदद से सड़क, नाली, पेयजल, स्कूल, सामूहिक रोजगार, पंचायत भवन आदि की व्यवस्था के साथ ही ग्रामीणों की मैपिंग भी की जानी थी। योजना के संचालन का जिम्मा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को दिया गया। मंत्रालय की ओर से पिछले अक्तूबर महीने में केंद्रीय टीम यहां आई। टीम ने कई बिंदूओं के आधार पर बीस गांव-बसेरी, बुधावली, छकरा, गढ़मऊ, दुरकौरा, धरवाई, हरधुवा, जावौरा, लबेहरा, मोतीकटरा, निपन, पहाड़ीबुर्जुग, परवई, रोनी, सिरौरी, तिलहैरा आदि चिह्नित किए। पहली किस्त के तौर पर प्रत्येक गांव में बीस लाख रुपये से काम शुरू किया जाना था। काम की रूपरेखा तय करने को कमेटी बनाई गई। इसे बैठक करके प्रस्तावित कार्य मंजूूर करने थे।
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दिसंबर से काम शुरू होना था लेकिन, हैरानी की बात यह कि काम की रूपरेखा तय करने वाली कमेटी की बैठक ही उस समय तक नहीं हुई। इसके बाद केंद्र सरकार ने फरवरी एवं मार्च में रिमाइंडर भेजकर काम शुरू कराने को कहा लेकिन, काम तय नहीं किए गए। उसके बाद कोरोना महामारी ने इसमें लापरवाही बरतने वाले अफसरों को अपनी खामी छिपाने का एक मौका ही थमा दिया। अफसरों की दिलचस्पी न लेने की वजह से इन गांवों में जीवन को सुविधाजनक बनाने का कोई भी काम नहीं कराया जा सका जबकि केंद्र सरकार ने बजट देने का भरोसा भी दिलाया था। वहीं, जिला समाज कल्याण अधिकारी, विकास सुनील कुमार का कहना है कि इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। प्रस्ताव तैयार हो चुके हैं। मंजूरी मिलने के बाद यहां कार्य शुरू कराए जाएंगे।
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