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Jalaun News: ठिठुर रही है जनता, लोग थम से गए हैं, सर्दी बहुत है अल्फाज जम से गए हैं
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कोंच। गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। साहित्यिक संस्था बागीश्वरी साहित्य परिषद की मासिक गोष्ठी में कवियों और साहित्यिकारों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को देर तक बांधे रखा।
संस्था के अध्यक्ष अरुण कुमार वाजपेयी की अध्यक्षता में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुख्य आतिथि कृष्ण कुमार बिलैया और नंदराम भावुक ने कार्यक्रम का संचालन किया। कवि संतोष ने कविता पढ़ते हुए कार्यक्रम को शुरू किया। कवि ओंकारनाथ पाठक ने सुनाया-ठिठुर रही है जनता लोग थम से गए हैं, सर्दी बहुत है अल्फाज जम से गए हैं।
भास्कर सिंह माणिक्य ने सुनाया-किसका करें भरोसा डर इस बात का, उसने कहा है अपना डर इस बात का। अधिवक्ता संतोष सराफ ने सुनाया, लगा सको तो बाग लगाओ आग लगाना मत सीखो, जला सको तो दीप जलाओ हृदय जलाना मत सीखो। राजेंद्र सिंह रसिक ने रचना में कहा, ''सर उठाकर जीना सीखो बुजदिली छोड़ दो, सामने अवरोध आए मार ठोकर तोड़ दो।'' आशाराम मिश्रा, चित्तरसिंह निरंजन, जुगेंद्र सिंह व राजेश चंद्र गोस्वामी आदि ने भी रचनाएं कहीं। आभार मयंक मोहन गुप्ता ने जताया। इस दौरान चंद्रशेखर नगाइच, रामबिहारी सोहाने, कैलाश मिश्रा, मनोज गुप्ता, लक्ष्मीनारायण व हरीमोहन आदि मौजूद रहे।
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संस्था के अध्यक्ष अरुण कुमार वाजपेयी की अध्यक्षता में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुख्य आतिथि कृष्ण कुमार बिलैया और नंदराम भावुक ने कार्यक्रम का संचालन किया। कवि संतोष ने कविता पढ़ते हुए कार्यक्रम को शुरू किया। कवि ओंकारनाथ पाठक ने सुनाया-ठिठुर रही है जनता लोग थम से गए हैं, सर्दी बहुत है अल्फाज जम से गए हैं।
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भास्कर सिंह माणिक्य ने सुनाया-किसका करें भरोसा डर इस बात का, उसने कहा है अपना डर इस बात का। अधिवक्ता संतोष सराफ ने सुनाया, लगा सको तो बाग लगाओ आग लगाना मत सीखो, जला सको तो दीप जलाओ हृदय जलाना मत सीखो। राजेंद्र सिंह रसिक ने रचना में कहा, ''सर उठाकर जीना सीखो बुजदिली छोड़ दो, सामने अवरोध आए मार ठोकर तोड़ दो।'' आशाराम मिश्रा, चित्तरसिंह निरंजन, जुगेंद्र सिंह व राजेश चंद्र गोस्वामी आदि ने भी रचनाएं कहीं। आभार मयंक मोहन गुप्ता ने जताया। इस दौरान चंद्रशेखर नगाइच, रामबिहारी सोहाने, कैलाश मिश्रा, मनोज गुप्ता, लक्ष्मीनारायण व हरीमोहन आदि मौजूद रहे।
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