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मां जैसा दुनिया में कोई और नहीं: कभी मजदूरी की तो कभी चूड़ियां बेची, बेटी को शिक्षिका और बेटे को बनाया अधिकारी
Mon, 10 May 2021 01:32 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालौन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालौन
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 10 May 2021 01:32 PM IST
सार
जालौन जिले में डकोर ब्लाक के मुहम्मदाबाद गांव निवासी नफीसा बेगम ने भी गरीबी में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों की कुछ ऐसी परवरिश की आज एक बेटी शिक्षिका तो बेटा झांसी में सेवायोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत है।
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मां नफीसा के साथ वसीम
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यूं तो हर मां के लिए उसका बेटा लाडला होता है। पर यदि एक मां का यही प्यार और दुलार जब त्याग और तपस्या में तब्दील होता है तो किसी भी बेटे की शोहरत की चमक सोने से कम नहीं होती है। जालौन जिले में डकोर ब्लाक के मुहम्मदाबाद गांव निवासी नफीसा बेगम ने भी गरीबी में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों की कुछ ऐसी परवरिश की आज एक बेटी शिक्षिका तो बेटा झांसी में सेवायोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत है।
दोनों ही भाई बहन जब अपनी मां के त्याग और तपस्या का जिक्र करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। झांसी के सेवायोजन कार्यालय में सहायक जिला रोजगार के पद पर कार्यरत मोहम्मद वसीम ने बताया कि वह तो मां को दुनिया भर की मां से सबसे अलग मानते हैं।
उनका दस लोगों का परिवार था। जिसमें पांच बहन और 2 भाई। पिता मोहम्मद शाह घर पर ही लोगों के कपड़े सिला करते थे। ऐसे में हम भाई बहन का पढ़ना लिखना नामुमकिन था। ऐसे में एक मां ही थी जो आगे आई, कभी मकानों के बनने में सिर पर ईंट ढोने तो कभी खेतों में मजदूरी की लेकिन हम लोगों की पढ़ाई नहीं बंद होने दी।
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दोनों ही भाई बहन जब अपनी मां के त्याग और तपस्या का जिक्र करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। झांसी के सेवायोजन कार्यालय में सहायक जिला रोजगार के पद पर कार्यरत मोहम्मद वसीम ने बताया कि वह तो मां को दुनिया भर की मां से सबसे अलग मानते हैं।
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उनका दस लोगों का परिवार था। जिसमें पांच बहन और 2 भाई। पिता मोहम्मद शाह घर पर ही लोगों के कपड़े सिला करते थे। ऐसे में हम भाई बहन का पढ़ना लिखना नामुमकिन था। ऐसे में एक मां ही थी जो आगे आई, कभी मकानों के बनने में सिर पर ईंट ढोने तो कभी खेतों में मजदूरी की लेकिन हम लोगों की पढ़ाई नहीं बंद होने दी।
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मां के हाथों के फफोले देख हम भाई बहन भी रात दिन सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई ही करते रहे ताकि मां की कुर्बानी व्यर्थ न जाए। इसके लिए हम लोगों ने बच्चों को घर पर ट्यूशन भी पढ़ाया। बकौल वसीम फिर एक वक्त आया जब उन्हें लगा कि प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से वे किसी भी सरकारी नौकरी को पा सकते हैं।
पर शिक्षा काफी महंगी हो चुकी थी। मतलब मंजिल सामने थी लेकिन रास्ता कठिन था। ऐसे एक बार फिर से मां ने ही हिम्मत और जज्बा दिखाया और गांव में ही छोटी सी चूड़ी की दुकान खोलकर अपनी आमदनी बढ़ाते हुए हम भाई बहन के रास्तों के पत्थर हटाने शुरू किए।
फिर वह दिन भी आया जब बहन शाहीन शिक्षिका बनी और उसके दो तीन साल बाद यानी बीते साल उन्होंने भी पीसीएस की परीक्षा में सफलता हासिल की। जिसके बाद उन्हें पहली पोस्टिंग झांसी में मिली। वसीम के मुताबिक वे तो मदर्स डे के मौके पर सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि मां जैसा दुनिया में कोई नहीं होता है। उसके प्यार और बलिदान की कोई कीमत नहीं होती है।
पर शिक्षा काफी महंगी हो चुकी थी। मतलब मंजिल सामने थी लेकिन रास्ता कठिन था। ऐसे एक बार फिर से मां ने ही हिम्मत और जज्बा दिखाया और गांव में ही छोटी सी चूड़ी की दुकान खोलकर अपनी आमदनी बढ़ाते हुए हम भाई बहन के रास्तों के पत्थर हटाने शुरू किए।
फिर वह दिन भी आया जब बहन शाहीन शिक्षिका बनी और उसके दो तीन साल बाद यानी बीते साल उन्होंने भी पीसीएस की परीक्षा में सफलता हासिल की। जिसके बाद उन्हें पहली पोस्टिंग झांसी में मिली। वसीम के मुताबिक वे तो मदर्स डे के मौके पर सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि मां जैसा दुनिया में कोई नहीं होता है। उसके प्यार और बलिदान की कोई कीमत नहीं होती है।