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Jalaun News: “न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए...” पर बशीर से भिड़ गए थे बाबू

Fri, 29 May 2026 12:28 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 29 May 2026 12:28 AM IST
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Babu clashed with Basheer over "Who knows in which street the evening of life will come..."
उरई। “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए...”। मशहूर शायर बशीर बद्र की यह गजल वर्षों से मुशायरों और साहित्यिक महफिलों की पहचान रही है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस चर्चित शेर को लेकर जालौन की धरती पर एक दिलचस्प नोकझोंक भी हुई थी। बशीर बद्र के निधन के बाद अब जिले के साहित्यकार उस पुराने दौर और उनसे जुड़ी यादों को फिर से याद कर रहे हैं।
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कानपुर में जन्मे बशीर बद्र 80 के दशक में दो बार जालौन आए थे। एक बार उन्होंने जीआईसी टाउन हॉल में आयोजित मुशायरे में शिरकत की थी, जबकि दूसरी बार बजरिया क्षेत्र में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उस दौर में जालौन जिला साहित्यिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र माना जाता था, जहां देशभर के नामचीन शायर और कवि आया करते थे।
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जिले के वरिष्ठ कवि शफी उर रहमान कश्फी बताते हैं कि उनके गुरु उरई निवासी बाबू खां ‘पागल’ अपने समय के बेहतरीन व्यंगकार थे। उन्हें लाल किले पर आयोजित कवि सम्मेलनों और मुशायरों तक में बुलाया जाता था। बाबू खां अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में एक शेर पढ़ते थे- “अजल (मौत), हिचकी के दो झटके लगने से काम हो जाए, मरीज-ए-इश्क सो जाए तो कुछ आराम हो जाए, सफर लंबा है ‘पागल’, साथ माचिस और दिया रखा कर, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”
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कश्फी बताते हैं कि बाद में उरई में आयोजित एक मुशायरे में बशीर बद्र ने अपना मशहूर शेर पढ़ा कि “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।” बताया जाता है कि इसे सुनकर बाबू खां ‘पागल’ नाराज हो गए थे। बाबू खां ने आखिरी पंक्तियों को अपनी बताते हुए नाराजगी जता दी। दोनों के बीच इसको लेकर बातचीत हुई और हल्की नोकझोंक भी हुई। हालांकि बाद में बाबू खां ने बड़े दिल का परिचय देते हुए फैसला किया कि वह इन पंक्तियों को दोबारा किसी मंच से नहीं पढ़ेंगे। उन्होंने यह पंक्तियां बशीर बद्र को ही समर्पित कर दीं और फिर कभी अपने उस शेर का मंचों पर इस्तेमाल नहीं किया।
साल 1999 में बाबू खां ‘पागल’ का निधन हो गया, लेकिन उरई के साहित्यिक गलियारों में यह किस्सा आज भी याद किया जाता है। बशीर बद्र के निधन की खबर के बाद जिले के साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों में शोक की लहर है। वरिष्ठ साहित्यकारों का कहना है कि बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं, बल्कि मोहब्बत, तन्हाई और जिंदगी की सादगी को अल्फाज देने वाली एक पूरी तहजीब थे।


कश्फी बताते हैं कि 80 का दशक जालौन के साहित्यिक स्वर्णिम दौर के रूप में जाना जाता है। उस समय मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी जैसी बड़े नाम भी जिले में आयोजित मुशायरों में शामिल हो चुके हैं।
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