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किसी के वास्ते हो दिल में प्यार, जीना इसी का...
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मुहम्मदाबाद (जालौन)। कहते हैं कि आकर्षण का दूसरा नाम प्यार भी होता है, वह प्यार जो ज्यादातर लोग किसी दूसरे को तलाशते में लगाते हैं और जब वह मिल जाता है तो उसे ही अपना वैलेंटाइन मानने लगते हैं। ऐसे प्यार को अंग्रेजी का वैलेंटाइन तो कह सकते हैं लेकिन सच्चा प्यार तो वह होता है जो बिना किसी आकर्षण के हो और इस हद तक हो कि चाहने वाला अपनी जान की भी परवाह न करे और ऐसे चाहने वाले हमें कोई गैर नहीं अपनों के बीच ही मिल सकते हैं।
जो कि वैलेंटाइन के सही मायने दुनिया नहीं तो कम से कम अपने देश को तो सिखा ही सकते हैं। कुछ इसी तरह की चाहत का उदाहरण सामने रखती हैं, कालपी की रेशमा, जिन्होंने साबित किया कि वाकई बेटियां दो घरों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाती है. तभी तो रेशमा ने अपने भाई की जिंदगी बचाने के लिए खुद की जान की परवाह नहीं की और हंसते हंसते अपनी एक किडनी छोटे भाई शमशाद को देकर उसके और पूरे परिवार होठों पर मुस्कराहट बिखेरने का काम किया है।
डकोर ब्लाक के मुहम्मदाबाद निवासी दो भाइयों इरशाद (39) और शमशाद (32) में सबसे बड़ी रेशमा (45) की ससुराल कालपी के राजीपुरा में हैं। करीब बीस साल पहले पति का देहांत होने के बाद भी रेशमा ने ससुराल की चौखट नहीं छोड़ी और वहीं रहकर अपने बच्चों की परवरिश की। साल 2014 में छोटे भाई को तेज बुखार आना शुरू हुआ, शुरुआत में उरई में हुए इलाज से जब कोई फायदा नहीं मिला तो परिजनों ने उन्हें कानपुर के प्राइवेट अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टरों ने किडनी की जरूरत बताई।
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जो शमशाद अभी चार साल पहले ही दूल्हा बना था, उसकी जिंदगी का खतरा देख पूरे परिवार में मायूसी छा गई थी। किडनी की बात थी सो एक ही दो लोग परिवार से आगे बढ़े लेकिन उनकी भी किडनी शमशाद की किडनी से मैच नहीं की। फिर भाई की जिंदगी पर खतरा देख रेशमा आगे आईं और उनकी किडनी भी मैच कर गई, फिर रेशमा को फैसला करते देर नहीं लगी और उन्होंने अपनी एक किडनी देकर भाई ही नहीं मायके के पूरे परिवार के जीवन में खुशियां बिखेर दीं। रेशमा का कहना है कि बचपन से साथ खेले और बड़े हुए हैं, माता पिता के बाद भाई ही सबसे प्यारा होता है। शमशाद का कहना है कि वो बहन रेशमा का एहसान जीवन भर नहीं भूल सकता है।
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जो कि वैलेंटाइन के सही मायने दुनिया नहीं तो कम से कम अपने देश को तो सिखा ही सकते हैं। कुछ इसी तरह की चाहत का उदाहरण सामने रखती हैं, कालपी की रेशमा, जिन्होंने साबित किया कि वाकई बेटियां दो घरों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाती है. तभी तो रेशमा ने अपने भाई की जिंदगी बचाने के लिए खुद की जान की परवाह नहीं की और हंसते हंसते अपनी एक किडनी छोटे भाई शमशाद को देकर उसके और पूरे परिवार होठों पर मुस्कराहट बिखेरने का काम किया है।
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डकोर ब्लाक के मुहम्मदाबाद निवासी दो भाइयों इरशाद (39) और शमशाद (32) में सबसे बड़ी रेशमा (45) की ससुराल कालपी के राजीपुरा में हैं। करीब बीस साल पहले पति का देहांत होने के बाद भी रेशमा ने ससुराल की चौखट नहीं छोड़ी और वहीं रहकर अपने बच्चों की परवरिश की। साल 2014 में छोटे भाई को तेज बुखार आना शुरू हुआ, शुरुआत में उरई में हुए इलाज से जब कोई फायदा नहीं मिला तो परिजनों ने उन्हें कानपुर के प्राइवेट अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टरों ने किडनी की जरूरत बताई।
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जो शमशाद अभी चार साल पहले ही दूल्हा बना था, उसकी जिंदगी का खतरा देख पूरे परिवार में मायूसी छा गई थी। किडनी की बात थी सो एक ही दो लोग परिवार से आगे बढ़े लेकिन उनकी भी किडनी शमशाद की किडनी से मैच नहीं की। फिर भाई की जिंदगी पर खतरा देख रेशमा आगे आईं और उनकी किडनी भी मैच कर गई, फिर रेशमा को फैसला करते देर नहीं लगी और उन्होंने अपनी एक किडनी देकर भाई ही नहीं मायके के पूरे परिवार के जीवन में खुशियां बिखेर दीं। रेशमा का कहना है कि बचपन से साथ खेले और बड़े हुए हैं, माता पिता के बाद भाई ही सबसे प्यारा होता है। शमशाद का कहना है कि वो बहन रेशमा का एहसान जीवन भर नहीं भूल सकता है।