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वक्त के सांचे में अपनी जिंदगी को ढालकर, मुस्कुराओ मौत की आंखों में आंखें डालकर...
सार
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी का जन्म ही शायद इस दुनिया में लोगों को हंसाने के लिए हुआ था।एक तरफ काका की चिता जल रही थी तो दूसरी तरफ श्मशान स्थल पर हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था।इस तरह काका ने अपने निधन पर भी सबको जी भरकर हंसाया।
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काका हाथरसी का फाइल फोटो। संवाद
- फोटो : HATHRAS
विस्तार
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी का जन्म ही शायद इस दुनिया में लोगों को हंसाने के लिए हुआ था। काका बेहद गंभीर विषयों में भी हंसी को तलाश लेते थे। यहां तक कि उन्होंने अपने निधन पर भी सबको जमकर हंसाया। श्मशान स्थल पर रात्रि 12 बजे एक तरफ जहां उनकी चिता जल रही थी तो श्मशान में हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था और हजारों की भीड़ हंसी से लोट-पोट हो रही थी।
काका की रचनाएं अभी तक लोगों को हंसाने का काम कर रही हैं। काका कहते थे कि ए गम-ए-जिंदगी नाराज न हो, मुझे आदत है मुस्कुराने की। काका कहते थे कि वक्त के सांचे में अपनी जिंदगी को ढालकर, मुस्कुराओ मौत की आंखों में आंखें डालकर। काका केवल हास्य व्यंग्य में ही आका नहीं थे, बल्कि वह बेहद उम्दा चित्रकार और संगीतकार भी थे। उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया था।
बेहद गरीबी में बीता काका का बचपन
काका हाथरसी उर्फ प्रभुलाल गर्ग का जन्म हाथरस शहर की जैन गली में 18 सितंबर 1906 को शिवलाल गर्ग के यहां हुआ था। जन्म के कुछ माह बाद ही उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी मां उन्हें अपने मायके इगलास ले गईं। काका का बचपन अपने मामा के यहां बेहद गरीबी में बीता और बचपन में काका ने चाट-पकौड़ी तक बेची।
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बचपन में ही हास्य व्यंग्य की कविताएं लिखने लगे। काका ने सबसे पहले अपने मामा के पड़ोस में रहने वाले वकील साहब पर कविता लिख दी। किसी तरह से यह कविता वकील साहब ने पढ़ ली तो इसके लिए काका की पिटाई तक हुई। इसके बाद काका 16 वर्ष की आयु में हाथरस आ गए और यहां आकर एक आढ़त पर मुंशी के रूप में काम करने लगे।
नाटक में निभाया किरदार को प्रभुलाल से बन गए काका
काका को बचपन में नाटकों में अभिनय का शौक था। प्रभुलाल ने एक नाटक में काका का किरदार निभाया और तभी से प्रभुलाल काका हाथरसी हो गए। इस दौरान काका की शादी रतनदेवी से हो गई और काका की रचनाओं में रतनदेवी काकी कहलाईं। काका का रुझान चित्रकला में भी था। उन्होंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर चित्रशाला चलाई, लेकिन यह जल्द ही बंद हो गई। इतना ही नहीं काका बांसुरी और हारमोनियम के भी अच्छे वादक थे। काका ने वर्ष 1935 में संगीत नाम से मासिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। इस पत्रिका का अनवरत रूप से प्रकाशन जारी है।
पूर्व पीएम अटल जी के साथ किया था मंच साझा
काका बचपन से हास्य व्यंग्य में रचनाएं लिखने लगे थे। उनकी पहली कविता वर्ष 1933 में इलाहाबाद (प्रयागराज) से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका गुलदस्ता में छपी और उसके बाद काका की रचनाएं लगातार छपने लगी। अंग्रेजों से विरुद्ध भी काका ने अपनी कलम चलाई और इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।
काका का नाम हिंदी के कवि सम्मेलनों में भी छाने लगा। वर्ष 1957 में काका ने दिल्ली में लाल किले पर आयोजित समारोह में काव्यपाठ किया तो उनका नाम और विख्यात हो गया। देश के साथ-साथ विदेशों में भी काका ने काव्यपाठ किया। काका ने वर्ष 1989 में काका को वाल्टीमोर में ऑनरेरी सिटीजन का सम्मान मिला।
इससे पहले वर्ष 1985 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पद्मश्री से सम्मानित किया। अन्य कई सम्मानों से भी काका को नवाजा गया। काका ने फिल्म जमुना किनारे में अभिनय भी किया। काका ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी मंच साझा किया।
एक तरफ जल रही थी चिता तो दूसरी तरफ हास्य कवि सम्मेलन
काका हाथरसी का निधन 18 सितंबर 1995 को हुआ। काका ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनके निधन पर कोई रोए नहीं, बल्कि सब हंसें। उनकी वसीयत के हिसाब से ही उनके शव को रात्रि 12 बजे ऊंटगाड़ी पर रखकर श्मशान स्थल ले जाया गया। वहां हास्य कवि सम्मेलन हुआ। एक तरफ काका की चिता जल रही थी तो दूसरी तरफ श्मशान स्थल पर हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था। इस तरह काका ने अपने निधन पर भी सबको जी भरकर हंसाया।
काका हंसी को टॉनिक बताते थे
वह कहते थे--डॉक्टर-वैद्य बतला रहे कुदरत का कानून, जितना हंसता आदमी उतना बढ़ता खून। उतना बढ़ता खूूून, की जो हास्य में कंजूसी, सुंदर से चेहरे पर आई मनहूसी।
संसद में भी गूंजीं काका की कविताएं
काका हाथरसी की रचनाएं संसद से लेकर फिल्मों तक में पढ़ी जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कई बार संसद में काका की रचनाओं को पढ़कर विपक्ष पर तीखे वार कर चुके हैं।
सबने लिखी गजल, काका ने लिखी-हजल-
काका ने तमाम समस्याएं, कुप्रथाओं पर अपनी रचनाओं से तीखे वार किए। काका ने गजलों में हास्य का प्रयोग किया। काका इन्हें हजल कहते थे। काका ने ऐसी करीब 10 हजल लिखीं। हास्य से भरपूर इन रचनाओं में काकी भी हैं-- बुलाके चिमटा या खास इशारा करते, हमको बुलाए तो गजल होती है। इसी तरह उन्होंने एक और हजल लिखी--जो उड़ गई जवानी, उसको बुलाएं कैसे, जो जुड़ गया बुढ़ापा, उसको छुडाएं कैसे।
यह हैं काका के प्रमुख कविता संग्रह
काका के प्रमुख कविता संग्रहों में काका की फुलझड़ियां, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि, काका तरंग, जय बोलो बेईमान की, यार सप्तक, खिलखिलाहट, यार सप्तक, काका के व्यंग्य बाण, काका तरंग, मेरा जीवन ए-वन आदि हैं।
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हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी का जन्म ही शायद इस दुनिया में लोगों को हंसाने के लिए हुआ था। काका बेहद गंभीर विषयों में भी हंसी को तलाश लेते थे। यहां तक कि उन्होंने अपने निधन पर भी सबको जमकर हंसाया। श्मशान स्थल पर रात्रि 12 बजे एक तरफ जहां उनकी चिता जल रही थी तो श्मशान में हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था और हजारों की भीड़ हंसी से लोट-पोट हो रही थी।
काका की रचनाएं अभी तक लोगों को हंसाने का काम कर रही हैं। काका कहते थे कि ए गम-ए-जिंदगी नाराज न हो, मुझे आदत है मुस्कुराने की। काका कहते थे कि वक्त के सांचे में अपनी जिंदगी को ढालकर, मुस्कुराओ मौत की आंखों में आंखें डालकर। काका केवल हास्य व्यंग्य में ही आका नहीं थे, बल्कि वह बेहद उम्दा चित्रकार और संगीतकार भी थे। उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया था।
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बेहद गरीबी में बीता काका का बचपन
काका हाथरसी उर्फ प्रभुलाल गर्ग का जन्म हाथरस शहर की जैन गली में 18 सितंबर 1906 को शिवलाल गर्ग के यहां हुआ था। जन्म के कुछ माह बाद ही उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी मां उन्हें अपने मायके इगलास ले गईं। काका का बचपन अपने मामा के यहां बेहद गरीबी में बीता और बचपन में काका ने चाट-पकौड़ी तक बेची।
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बचपन में ही हास्य व्यंग्य की कविताएं लिखने लगे। काका ने सबसे पहले अपने मामा के पड़ोस में रहने वाले वकील साहब पर कविता लिख दी। किसी तरह से यह कविता वकील साहब ने पढ़ ली तो इसके लिए काका की पिटाई तक हुई। इसके बाद काका 16 वर्ष की आयु में हाथरस आ गए और यहां आकर एक आढ़त पर मुंशी के रूप में काम करने लगे।
नाटक में निभाया किरदार को प्रभुलाल से बन गए काका
काका को बचपन में नाटकों में अभिनय का शौक था। प्रभुलाल ने एक नाटक में काका का किरदार निभाया और तभी से प्रभुलाल काका हाथरसी हो गए। इस दौरान काका की शादी रतनदेवी से हो गई और काका की रचनाओं में रतनदेवी काकी कहलाईं। काका का रुझान चित्रकला में भी था। उन्होंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर चित्रशाला चलाई, लेकिन यह जल्द ही बंद हो गई। इतना ही नहीं काका बांसुरी और हारमोनियम के भी अच्छे वादक थे। काका ने वर्ष 1935 में संगीत नाम से मासिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। इस पत्रिका का अनवरत रूप से प्रकाशन जारी है।
पूर्व पीएम अटल जी के साथ किया था मंच साझा
काका बचपन से हास्य व्यंग्य में रचनाएं लिखने लगे थे। उनकी पहली कविता वर्ष 1933 में इलाहाबाद (प्रयागराज) से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका गुलदस्ता में छपी और उसके बाद काका की रचनाएं लगातार छपने लगी। अंग्रेजों से विरुद्ध भी काका ने अपनी कलम चलाई और इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।
काका का नाम हिंदी के कवि सम्मेलनों में भी छाने लगा। वर्ष 1957 में काका ने दिल्ली में लाल किले पर आयोजित समारोह में काव्यपाठ किया तो उनका नाम और विख्यात हो गया। देश के साथ-साथ विदेशों में भी काका ने काव्यपाठ किया। काका ने वर्ष 1989 में काका को वाल्टीमोर में ऑनरेरी सिटीजन का सम्मान मिला।
इससे पहले वर्ष 1985 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पद्मश्री से सम्मानित किया। अन्य कई सम्मानों से भी काका को नवाजा गया। काका ने फिल्म जमुना किनारे में अभिनय भी किया। काका ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी मंच साझा किया।
एक तरफ जल रही थी चिता तो दूसरी तरफ हास्य कवि सम्मेलन
काका हाथरसी का निधन 18 सितंबर 1995 को हुआ। काका ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनके निधन पर कोई रोए नहीं, बल्कि सब हंसें। उनकी वसीयत के हिसाब से ही उनके शव को रात्रि 12 बजे ऊंटगाड़ी पर रखकर श्मशान स्थल ले जाया गया। वहां हास्य कवि सम्मेलन हुआ। एक तरफ काका की चिता जल रही थी तो दूसरी तरफ श्मशान स्थल पर हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था। इस तरह काका ने अपने निधन पर भी सबको जी भरकर हंसाया।
काका हंसी को टॉनिक बताते थे
वह कहते थे--डॉक्टर-वैद्य बतला रहे कुदरत का कानून, जितना हंसता आदमी उतना बढ़ता खून। उतना बढ़ता खूूून, की जो हास्य में कंजूसी, सुंदर से चेहरे पर आई मनहूसी।
संसद में भी गूंजीं काका की कविताएं
काका हाथरसी की रचनाएं संसद से लेकर फिल्मों तक में पढ़ी जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कई बार संसद में काका की रचनाओं को पढ़कर विपक्ष पर तीखे वार कर चुके हैं।
सबने लिखी गजल, काका ने लिखी-हजल-
काका ने तमाम समस्याएं, कुप्रथाओं पर अपनी रचनाओं से तीखे वार किए। काका ने गजलों में हास्य का प्रयोग किया। काका इन्हें हजल कहते थे। काका ने ऐसी करीब 10 हजल लिखीं। हास्य से भरपूर इन रचनाओं में काकी भी हैं-- बुलाके चिमटा या खास इशारा करते, हमको बुलाए तो गजल होती है। इसी तरह उन्होंने एक और हजल लिखी--जो उड़ गई जवानी, उसको बुलाएं कैसे, जो जुड़ गया बुढ़ापा, उसको छुडाएं कैसे।
यह हैं काका के प्रमुख कविता संग्रह
काका के प्रमुख कविता संग्रहों में काका की फुलझड़ियां, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि, काका तरंग, जय बोलो बेईमान की, यार सप्तक, खिलखिलाहट, यार सप्तक, काका के व्यंग्य बाण, काका तरंग, मेरा जीवन ए-वन आदि हैं।