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काका के हाथरस में कुपोषण छीन रहा मासूमों की मुस्कान

Sat, 16 Jan 2021 05:27 PM IST
कुमार संभव कौशल कुमार ओझा, अलीगढ़
कौशल कुमार ओझा, अलीगढ़ Published by: कुमार संभव Updated Sat, 16 Jan 2021 05:27 PM IST
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सार
  • कुपोषण का कारण सरकारी योजनाओं का सटीक क्रियान्वयन न होना, जागरूकता की कमी, अशिक्षा और गरीबी
  • सासनी तहसील के दरकौली गांव में गरीब ही नहीं, सामान्य परिवारों के बच्चे भी अति कुपोषित
  • भैंस बेचकर रोटी व दवाई का घरवाले कर रहे इंतजाम, सरकारी इंतजाम हो रहे नाकाफी 
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Ground Report of Hathras malnutrition status of kaka hathrasi city
कुपोषण से बेहाल हाथरस के बच्चे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केस-1: सासनी तहसील के दरकौली गांव का 2 साल का तुषार पुत्र गणेश अति कुपोषित है। हाथ-पैर काम नहीं करते। चल-फिर और बोल नहीं सकता है। बेहद कमजोर तुषार का शरीर जैसे बेजान हो रहा है। बिछावन पर पड़े रहने के कारण बेड सोर से पीड़ित है। विवशता भरी नजरों से जब देखता है तो ऐसा लगता है कि जैसे पूछ रहा हो कि मैं कब ठीक होऊंगा। तुषार का संबंध गरीबी से भी नहीं है। उसके परिवार के पास करीब 50 बीघा जमीन, ट्रैक्टर और भैंस है। दादी मुक्तेश देवी कहती हैं कि तुषार के इलाज में दो लाख रुपये से अधिक खर्च हो चुका है।


केस-2: दरकौली का 5 साल का मयंक पुत्र भूरी सिंह भी शरीर से पूरी तरह लाचार है। वह अपने पैरों पर खड़े होने में असमर्थ है। भोजन के नाम पर सिर्फ  चम्मच से दूध पीता है। मयंक की मां चंद्रमुखी कहती हैं कि उसके तीन बच्चे हैं। दो ठीक हैं। मयंक को देखकर दिल दुखी रहता है। हाथरस जाकर एक डॉक्टर को दिखाया था। कोई फायदा नहीं हुआ। भूरी सिंह मजदूरी करते हैं। कोरोना महामारी एवं लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिलने से बड़ी परेशानी हुई। राशन पानी तो मिला लेकिन पर्याप्त नहीं था।


केस-3: दरकौली का 3 साल का दुर्गेश पुत्र हेमंत अति कुपोषित श्रेणी का बच्चा है। शरीर बेहद कमजोर है। सुस्त दिखता है। ध्यान देने की बात यह भी है कि दुर्गेश के पिता किसान हैं और उनके पास 14.15 बीघा जमीन है। घर में तीन भैंस है। दुर्गेश की दादी गायत्री देवी कहती हैं कि घर में बच्चे रोटी, सब्जी खाते हैं। दूध, दलिया और कभी-कभी फल भी खाते हैं। घर में दाल 10-15 दिन बनती है।

केस-4: सासनी के उतरा गांव का 6 माह का ध्रुव पुत्र सत्यवीर हाथरस स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती है। ध्रुव की मां प्रेमवती बताती हैं कि कोरोना के पहले सबकुछ ठीक था। पति सत्यवीर गुजरात की एक फैक्टरी में काम करते हैं। होली में घर आए थे, उसी समय लॉकडाउन हो गया। बच्चा हुआ। खाने-पीने की दिक्कत हुई। बच्चे के इलाज के लिए दो भैंस बेच दीं। अब एक भैंस रह गई है। किसी तरह का सरकारी लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

केस-5: एक साल 10 महीने की निधि एनआरसी हाथरस में भर्ती है। बहुत कमजोर एवं सुस्त है। चंदपा के अल्लहेपुर निवासी निधि की मां गंगा देवी कहती हैं कि परिवार में 6 लोग हैं। पति विजेंद्र गांव में मजदूरी करते हैं। दिक्कत तो पहले भी थी लेकिन कोरोना में स्थिति और खराब हुई। साग-रोटी खिलाकर परिवार का पेट भरती हैं। लॉकडाउन में गेहूं, चावल, पंजीरी के पैकेट एवं तीन महीने तक 500-500 रुपये मिले। अब बड़ी मुश्किल से खाने-पीने का इंतजाम हो रहा है।

ऐसे हैं हाथरस के हालात

ये पांच मामले कुपोषण के खिलाफ चल रही जंग की तस्वीर बयां करने के लिए काफी हैं। हास्य व व्यंग्य के महारथी काका हाथरसी के जिले हाथरस में कुपोषण मासूम बच्चों के चेहरे की मुस्कान छीन रहा है। सासनी तहसील के दरकौली गांव पहुंचने पर यह दर्दनाक तस्वीर उभर कर सामने आई। इस गांव में तीन बच्चे अति कुपोषित हैं, जिनमें से दो अपंगता की स्थिति में पहुंच गए हैं। उनके हाथ-पैर एवं शरीर के अन्य अंगों में कोई विशेष हलचल नहीं है। भरपेट भोजन, जानकारी एवं जागरूकता के अभाव में बच्चे अपंगता का शिकार हो रहे हैं। कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके यहां खाने-पीने की समस्या नहीं हैं, इसके बावजूद वह अति कुपोषित हैं। इस सब के पीछे सरकारी योजनाओं का सटीक क्रियान्वयन न होना, जागरूकता की कमी, अशिक्षा और गरीबी है। हालांकि, कागजों में गर्भवती महिलाओं व बच्चों के लिए तमाम योजनाएं चल रही हैं लेकिन उनका फायदा अंतिम पायदान तक नहीं पहुंच रहा है, जिसका असर यह हो रहा है कि लाखों करोड़ों खर्च करने के बाद भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। 

पांच महीने तक खाली रहा एनआरसी 

अप्रैल 2020 से अगस्त 2020 तक हाथरस स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में एक भी बच्चा भर्ती नहीं हुआ। 10 बेड के केंद्र में जनवरी, फरवरी और मार्च में क्रमश:  9, 5 और 2 बच्चे भर्ती हुए थे। सितंबर में 8, अक्तूबर में 12, नवंबर में 7 और 25 दिसंबर 2020 तक 12 बच्चे भर्ती हुए। 25 दिसंबर को केंद्र में 8 अतिकुपोषित बच्चे भर्ती थे। 

लॉकडाउन के बाद से आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों का आना बंद है। तैयार भोजन के बदले बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं को सूखा राशन घर पर दे दिया जाता है। नवंबर के बाद से फ्री अनाज नहीं आया है। - कल्पना शर्मा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता

 

लॉकडाउन में रोजगार ठप होने से मजदूर वर्ग को काफी परेशानी उठानी पड़ी। मनरेगा के तहत गांव में रोजगार देने की कोशिश की। गांव की आबादी 1057 और मतदाताओं की संख्या 940 है। इस आंकड़े से आप सर्वे की विश्वसनीयता का अंदाजा लगा सकते हैं। कर्मचारी घर बैठे सर्वे कर लेते हैं। सही तस्वीर सामने नहीं आती। - मदन मोहन शर्मा उर्फ  मदन फौजी, प्रधान

 

लॉकडाउन के दौरान अप्रैल से अगस्त 2020 तक पोषण पुनर्वास केंद्र में कोई भी बच्चा भर्ती नहीं हुआ। यहां के कर्मचारियों की ड्यूटी अन्य जगहों पर लगी थी। कुछ समय के लिए केंद्र को क्वारंटीन सेंटर में तब्दील कर दिया गया था। अभी आठ बच्चे केंद्र में भर्ती हैं। - पारुल, डाइटिशियन, पोषण पुनर्वास केंद्र हाथरस 

 

विडंबना है कि हाथरस जनपद में 2732 बच्चे लाल श्रेणी में हैं और पोषण पुनर्वास केंद्र खाली रहता है। यह हमेशा भरा रहना चाहिए। किसी तरह के बहाने से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अभिभावकों के पास जाएं और उन्हें जागरूक करें। अभिभावकों को बताएं कि समय पर उपचार नहीं मिलने से बच्चों के जीवन पर किस तरह का असर पड़ेगा। समझाकर एनआरसी में बच्चों को लाया जा सकता है। कुपोषण से लड़ने के लिए अलग विभाग है। जन जागरूकता एवं जन सहयोग बेहद जरूरी है। - डॉ. वीके सिंह, संयुक्त निदेशक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, अलीगढ़ मंडल


हाथरस जनपद पर एक नजर
लाल श्रेणी के बच्चे 2732
पीली श्रेणी के बच्चे 16800
हरी श्रेणी के बच्चे 131373

स्रोत:  डॉ. डीके सिंह, डीपीओ

आंगनबाड़ी केंद्र दरकौली में पंजीकृत बच्चे एवं गर्भवती महिलाएं
3 से 6 वर्ष के बच्चे 34
7 माह से 3 वर्ष के बच्चे 64
0 से 6 माह के बच्चे 12
अति कुपोषित 03
कुपोषित 09
गर्भवती महिलाएं 08
गांव की आबादी 1057  (2011 की जनगणना)

स्रोत: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता
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