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हमारे शिवालय : यहां गांठ बांधने से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव, पूरी होती है मनोकामना
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हरदोई। जय जय जय अनंत अविनाशी, करत कृपा सब के घटवासी...। श्रीशिव संकटहरण सकाहा मंदिर में स्थापित शिवलिंग के प्राकृट्य की किसी को भी सटीक जानकारी नहीं है।
मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयं-भू प्रकृट है और भक्तों के संकटों को हरने वाला है। एक लोटा जल से प्रसन्न होने वाले भगवान श्रीभोलेनाथ यहां पर मंदिर में कलावा, धागा, कपड़ा और तो और पॉलीथिन से भी श्रद्धाभाव से बांधी गई गांठ से प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर शाहजहांपुर मार्ग पर विकास खंड बावन के सकाहा गांव में भगवान श्रीभोलेनाथ का पौराणिक मंदिर है। प्राचीन और स्वयं-भू शिवलिंग की महिमा सुनकर दूर-दूर से लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। भगवान श्रीभोलेनाथ अपने नाम के अनुसार ही यहां आने वाले श्रद्धालुओं के संकटों को हर लेते हैं।
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वैसे भगवान श्रीशिव के पूजन-अर्चन के लिए दक्षिण दिशा में बैठने का विधान बताया गया है। यहां पर स्वयं-भू प्राकृट्य श्रीशव के सामने सच्चे मन से मनोकामना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। श्रद्धालु मनोकामना के लिए यहां पर मंदिर में उत्तर दिशा में लगे जाल में गांठ बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर गांठ खोलने के साथ ही भगवान श्रीभोलेनाथ का पूजन-अर्चन, अभिषेक कर नमन करते हैं।
ऐसी मान्यता और किवदंती भी है कि सेठ लाला लाहौरी मल का पुत्र जेल में बंद था और फांसी की सजा सुनाई गई थी। तब परेशान घूमते टहलते सेठ लाहोरी मल ने यहां भगवान श्रीभोलेनाथ से अपने पुत्र की फांसी की सजा माफ करने की मन्नत मांगी। इसके बाद फांसी की सजा माफ हो गई, तब सेठ ने यहां मंदिर में निर्माण कराया। मंदिर से जुड़ी एक और भी किवदंती है कि साल 1951 में बेहटागोकुल थाने में तैनात रहे थानाध्यक्ष शिवशंकर लाल वर्मा ने इस शिवलिंग को बेहटागोकुल थाना परिसर में स्थापित कराने की इच्छा जाहिर की।
इसलिए यहां मंदिर में खोदाई करवाई, कई दिन तक खोदाई के बाद भी शिवलिंग का कोई छोर नहीं मिला और जमीन से पानी आना शुरु हो गया। बताया जाता है कि भगवान श्रीभोलेनाथ ने थानाध्यक्ष को स्वप्न दिया और शिवलिंग को यथावत रहने देने का आदेश दिया। इसके बाद थानाध्यक्ष ने सकाहा में भव्य और विशाल मंदिर बनवाया।
मंदिर के पुजारी सूर्य कमल गोस्वामी ने बताया कि संकटों को हर लेने के कारण ही यहां पर भगवान श्रीभोलेनाथ का नाम श्रीशिव संकटहरण पड़ा है। सावन माह में तो प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते ही हैं, अन्य महीनों में भी श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। भगवान का अभिषेक, शृंगार और पूजन-अर्चन और आरती नियमित होती है।
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मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयं-भू प्रकृट है और भक्तों के संकटों को हरने वाला है। एक लोटा जल से प्रसन्न होने वाले भगवान श्रीभोलेनाथ यहां पर मंदिर में कलावा, धागा, कपड़ा और तो और पॉलीथिन से भी श्रद्धाभाव से बांधी गई गांठ से प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
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जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर शाहजहांपुर मार्ग पर विकास खंड बावन के सकाहा गांव में भगवान श्रीभोलेनाथ का पौराणिक मंदिर है। प्राचीन और स्वयं-भू शिवलिंग की महिमा सुनकर दूर-दूर से लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। भगवान श्रीभोलेनाथ अपने नाम के अनुसार ही यहां आने वाले श्रद्धालुओं के संकटों को हर लेते हैं।
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वैसे भगवान श्रीशिव के पूजन-अर्चन के लिए दक्षिण दिशा में बैठने का विधान बताया गया है। यहां पर स्वयं-भू प्राकृट्य श्रीशव के सामने सच्चे मन से मनोकामना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। श्रद्धालु मनोकामना के लिए यहां पर मंदिर में उत्तर दिशा में लगे जाल में गांठ बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर गांठ खोलने के साथ ही भगवान श्रीभोलेनाथ का पूजन-अर्चन, अभिषेक कर नमन करते हैं।
ऐसी मान्यता और किवदंती भी है कि सेठ लाला लाहौरी मल का पुत्र जेल में बंद था और फांसी की सजा सुनाई गई थी। तब परेशान घूमते टहलते सेठ लाहोरी मल ने यहां भगवान श्रीभोलेनाथ से अपने पुत्र की फांसी की सजा माफ करने की मन्नत मांगी। इसके बाद फांसी की सजा माफ हो गई, तब सेठ ने यहां मंदिर में निर्माण कराया। मंदिर से जुड़ी एक और भी किवदंती है कि साल 1951 में बेहटागोकुल थाने में तैनात रहे थानाध्यक्ष शिवशंकर लाल वर्मा ने इस शिवलिंग को बेहटागोकुल थाना परिसर में स्थापित कराने की इच्छा जाहिर की।
इसलिए यहां मंदिर में खोदाई करवाई, कई दिन तक खोदाई के बाद भी शिवलिंग का कोई छोर नहीं मिला और जमीन से पानी आना शुरु हो गया। बताया जाता है कि भगवान श्रीभोलेनाथ ने थानाध्यक्ष को स्वप्न दिया और शिवलिंग को यथावत रहने देने का आदेश दिया। इसके बाद थानाध्यक्ष ने सकाहा में भव्य और विशाल मंदिर बनवाया।
मंदिर के पुजारी सूर्य कमल गोस्वामी ने बताया कि संकटों को हर लेने के कारण ही यहां पर भगवान श्रीभोलेनाथ का नाम श्रीशिव संकटहरण पड़ा है। सावन माह में तो प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते ही हैं, अन्य महीनों में भी श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। भगवान का अभिषेक, शृंगार और पूजन-अर्चन और आरती नियमित होती है।