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महंगाई ने छीने आंगन व लान!
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Fri, 19 Jun 2015 12:02 AM IST
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जमीनों के भाव आसमान पर पहुंच चुके हैं, तो निर्माण
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सामग्री के भाव आम लोगों को मुुंह चिढ़ाते हैं। शहर में लोगों के लिए एक
मकान बनाना मुश्किल भरा काम हो चुका है। यही वजह है कि नगरीय क्षेत्रों में
महंगाई का असर साफ तौर पर दिख रहा है।
महंगाई से नए मकानों से लान और आंगन गायब हो रहे हैं। जैसा कि पुराने घरों को देख कर लगता है कि दो दशक पहले कमोवेश लोग घर बनाने को कम से कम इतनी भूूमि की तो व्यवस्था करते ही थे कि घर में आंगन और लान बन जाए। आंगन के बिना मकान को घर ही नहीं माना जाता।
आंगन और लान की प्राथमिकता सिर्र्फ कागजों तक सिमट रही है। भवन का नक्शा पास कराने को भले ही लोग छोटे से लान और आंगन की व्यवस्था कागजों पर कर रहे हों, पर हकीकत कुछ और है। जमीनें इतनी महंगी हो चुक ी हैं कि लोगों के लिए लान के लिए जगह छोड़ना मुश्किल हो गया है।
बिना आंगन और लान के मकान काफी सूूने लगते हैं। नक्शा पास करने वाले विभाग के अफसर भी मानते हैं कि अब लान कागजों तक सिमट रहे हैं। वैसे भी जिस आंगन और लान को लेकर घर परिवार को ताजी हवा मिलने के साथ पर्यावरण को पोषण मिलता था, अब उस पर किसी का जोर नहीं है।
उधर, सावन का महीने में घरों के आंगन और लान का महत्व काफी बढ़ जाता है। सावन बरसे और लान में लगे पौधों पर पानी की फुहारें न पड़े, ऐसा हो नहीं सकता है। इसी तरह से आंगन में बैठकर बारिश का बूंदों को देखने की बात ही कुछ और है, पर अब न तो वो लान रहे और न वो आंगन।
महंगाई से नए मकानों से लान और आंगन गायब हो रहे हैं। जैसा कि पुराने घरों को देख कर लगता है कि दो दशक पहले कमोवेश लोग घर बनाने को कम से कम इतनी भूूमि की तो व्यवस्था करते ही थे कि घर में आंगन और लान बन जाए। आंगन के बिना मकान को घर ही नहीं माना जाता।
आंगन और लान की प्राथमिकता सिर्र्फ कागजों तक सिमट रही है। भवन का नक्शा पास कराने को भले ही लोग छोटे से लान और आंगन की व्यवस्था कागजों पर कर रहे हों, पर हकीकत कुछ और है। जमीनें इतनी महंगी हो चुक ी हैं कि लोगों के लिए लान के लिए जगह छोड़ना मुश्किल हो गया है।
बिना आंगन और लान के मकान काफी सूूने लगते हैं। नक्शा पास करने वाले विभाग के अफसर भी मानते हैं कि अब लान कागजों तक सिमट रहे हैं। वैसे भी जिस आंगन और लान को लेकर घर परिवार को ताजी हवा मिलने के साथ पर्यावरण को पोषण मिलता था, अब उस पर किसी का जोर नहीं है।
उधर, सावन का महीने में घरों के आंगन और लान का महत्व काफी बढ़ जाता है। सावन बरसे और लान में लगे पौधों पर पानी की फुहारें न पड़े, ऐसा हो नहीं सकता है। इसी तरह से आंगन में बैठकर बारिश का बूंदों को देखने की बात ही कुछ और है, पर अब न तो वो लान रहे और न वो आंगन।