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जुर्माने की रकम से होगी सफाई
Hapur
Updated Fri, 17 Oct 2014 05:33 AM IST
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हापुड़। गंगा प्रदूषण मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक निर्णय बृहस्पतिवार को सुना दिया। कोर्ट ने सिंभावली डिस्टलरी मिल पर पांच करोड़ और गोपालजी डेयरी पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। पर्यावरणविद् किसान नेता कृष्णकांत सिंह हूण और स्पेशल एक्शन फॉर फारेस्ट एंड एन्वायरमेंट (सेफ) की याचिका पर जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने 82 पेज का फैसला सुनाया। कंपनी और डेयरी को अर्थदंड की राशि एक माह के भीतर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपनी होगी। इस पैसे से स्याना एस्केप की सफाई होगी और फुल्डेहरा ड्रेन से स्लज को साफ किया जाएगा। साथ ही भूजल को प्रदूषण मुक्त बनाने तथा ईटीपी/एसटीपी जैसे संयंत्र पूठ के आसपास लगाने के निर्देश जारी किए गए हैं। आदेश जारी होने की तिथि से दो सप्ताह के अंदर कंक्रीट तथा भूमिगत पाइपलाइनों को हटाना होगा। इसके लिए सभी जिम्मेदार विभागों को आदेश जारी हुए हैं। याचिकाकर्ता कृष्णकांत सिंह हूण, सेफ के कुलदीप नागर (एडवोकेट) और विक्रांत ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए इस फैसले को गंगा प्रदूषण मुक्ति की दिशा में मील का पत्थर बताया।
गंगा सफाई की दिशा में निर्णय पहला पड़ाव : हूण
हापुड़। याचिकाकर्ता कृष्णकांत सिंह हूण ने एनजीटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में यह निर्णय पहला पड़ाव है। इस निर्णय से उनके हौसलों को मजबूती मिली है। गंगा को पूरी तरह प्रदूषण से मुक्त कराने पर ही जीत होगी। सामाजिक, राजनैतिक तथा न्यायिक प्रयास लगातार जारी रहेंगे। गन्ना उत्पादक किसानों से उन्हें पूरी सहानुभूति है। गंगा प्रदूषण के मामले की अदालत में लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता राहुल चौधरी का कहना है कि यह एनजीटी का एक अच्छा फैसला है। जिसका स्वागत किया जाता है। गंगा को जो अन्य फैक्ट्रियां प्रदूषित कर रही है उनके लिए भी यह एक सबक होगा।
प्रदूषण विभाग के अफसरों को कारण बताओ नोटिस
हापुड़। एनजीटी ने कंपनी द्वारा इतने लंबे समय तक पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान को गंगा तथा एनवायरमेंट के खिलाफ किया गया बड़ा दुस्साहस माना है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में पूछा है कि आखिर सिंभावली डिस्टलरी 1982 से बिना एनओसी के कैसे चलती रही। पर्यावरण तथा गंगा को इस कंपनी द्वारा इतनी हानि पहुंचाई गई और प्रदूषण अधिकारी इस पर लगाम लगाने की बजाए हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। इस मामले में कोर्ट में 29 अक्तूबर को सुनवाई कर जवाब-तलब किया है।
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इसके साथ ही कोर्ट ने एक स्पेशल कमेटी का गठन किया है। इसमें यूपीपीसीबी, सीपीसीबी तथा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार के अधिकारी होंगे।
यह कमेटी कोर्ट के आदेशों की निगरानी करेगी तथा तीन महीने बाद एनजीटी के समक्ष संबंधित विभागों तथा कंपनी द्वारा कोर्ट निर्णय के आलोक में की गई प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। दूसरी ओर, यदि कंपनी निर्धारित समय में जुर्माने की राशि जमा नहीं करेगी तो प्रदूषण विभाग द्वारा इनको जारी किए गए प्रदूषण अनापत्ति प्रमाणपत्र, जल एवं वायु के सहमति प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए जाएंगे। इनके निरस्त होने के उपरांत कंपनियों का संचालन नहीं हो सकेगा।
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गंगा सफाई की दिशा में निर्णय पहला पड़ाव : हूण
हापुड़। याचिकाकर्ता कृष्णकांत सिंह हूण ने एनजीटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में यह निर्णय पहला पड़ाव है। इस निर्णय से उनके हौसलों को मजबूती मिली है। गंगा को पूरी तरह प्रदूषण से मुक्त कराने पर ही जीत होगी। सामाजिक, राजनैतिक तथा न्यायिक प्रयास लगातार जारी रहेंगे। गन्ना उत्पादक किसानों से उन्हें पूरी सहानुभूति है। गंगा प्रदूषण के मामले की अदालत में लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता राहुल चौधरी का कहना है कि यह एनजीटी का एक अच्छा फैसला है। जिसका स्वागत किया जाता है। गंगा को जो अन्य फैक्ट्रियां प्रदूषित कर रही है उनके लिए भी यह एक सबक होगा।
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प्रदूषण विभाग के अफसरों को कारण बताओ नोटिस
हापुड़। एनजीटी ने कंपनी द्वारा इतने लंबे समय तक पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान को गंगा तथा एनवायरमेंट के खिलाफ किया गया बड़ा दुस्साहस माना है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में पूछा है कि आखिर सिंभावली डिस्टलरी 1982 से बिना एनओसी के कैसे चलती रही। पर्यावरण तथा गंगा को इस कंपनी द्वारा इतनी हानि पहुंचाई गई और प्रदूषण अधिकारी इस पर लगाम लगाने की बजाए हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। इस मामले में कोर्ट में 29 अक्तूबर को सुनवाई कर जवाब-तलब किया है।
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इसके साथ ही कोर्ट ने एक स्पेशल कमेटी का गठन किया है। इसमें यूपीपीसीबी, सीपीसीबी तथा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार के अधिकारी होंगे।
यह कमेटी कोर्ट के आदेशों की निगरानी करेगी तथा तीन महीने बाद एनजीटी के समक्ष संबंधित विभागों तथा कंपनी द्वारा कोर्ट निर्णय के आलोक में की गई प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। दूसरी ओर, यदि कंपनी निर्धारित समय में जुर्माने की राशि जमा नहीं करेगी तो प्रदूषण विभाग द्वारा इनको जारी किए गए प्रदूषण अनापत्ति प्रमाणपत्र, जल एवं वायु के सहमति प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए जाएंगे। इनके निरस्त होने के उपरांत कंपनियों का संचालन नहीं हो सकेगा।