{"_id":"5f259f048ebc3e604473b4c8","slug":"cultural-hamirpur-news-knp574548660","type":"story","status":"publish","title_hn":"अबकी आल्हा गाथा की होगी सिर्फ रस्म अदायगी, बुंदेलखंड की आन-बान व शान है आल्हा और ऊदल, कोरोना के कारण नहीं होंगे आयोजन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अबकी आल्हा गाथा की होगी सिर्फ रस्म अदायगी, बुंदेलखंड की आन-बान व शान है आल्हा और ऊदल, कोरोना के कारण नहीं होंगे आयोजन
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हमीरपुर। बुंदेलखंड में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का गांवों में निर्वहन होने से पता चलता है कि आल्हा-ऊदल की वीरता आज भी लोगों के दिलों में समाई है। जोश भरने वाली वीरता की गाथा सुनकर युवा, वृद्ध समेत सभी की भुजाएं फड़क उठती हैं। रक्षाबंधन के अगले दिन इन्हीं दोनों की वीरता से संबंध रखने वाला कजली मेला मनाए जाने की परंपरा कोरोना महामारी के कारण टूट सी गई है। अब सामाजिक दूरी के बीच ग्रामीण इलाकों में यह कार्यक्रम सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित होगा।
आल्हा गायक दिनेश कुमार ने बताया सैकड़ों साल पहले रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में हमला कर दिया था। उनकी सेना ने रानी मल्हना के डोले लूट लिए थे। तब वीर भूमि के लोगों ने इस त्योहार को रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से मोर्चा लेकर लूटे गए डोले वापस लिए थे। इसलिए उस दिन रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया गया था।
लूटे गए कजली से भरे डोले वापस मिलने के बाद महोबा के कीरत सागर में रानी मल्हना ने रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का विसर्जन कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया था। इस दिन घर-घर जलेबी खाने की परंपरा भी है। बहनें भाइयों के हाथों में रक्षा सूत्र बांधती हैं। कजली लेकर महिलाएं सावन गीत गाती हैं और तालाबों में विसर्जन करती हैं।
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जगह-जगह आल्हा-ऊदल की वीरगाथा आल्हा के माध्यम से गाए जाते हैं। बताया बुंदेलखंड में रक्षाबंधन व कजली महोत्सव के दौरान यदि आल्हा न सुनाई पड़े तो सावन मनभावन नहीं लगता है। मगर इस समय कोरोना के कारण आने वाले मंगलवार को यह परंपरागत सिर्फ रस्म अदायगी होगी।
वर्षों पुरानी परंपरा का कजली दंगल मेला रद्द
शहर के रमेड़ी रहुनियां मोहल्ला में 160 साल पुराना कजली दंगल मेला कोरोना संक्रमण के कारण रद्द कर दिया गया है। आयोजक भाजपा नेता राजीव शुक्ला ने बताया उनके पूर्वजों के जमाने से कजली मेला और दंगल का आयोजन होता आ रहा है, लेकिन इस बार कोरोना के कारण यह आयोजन नहीं होगा।
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आल्हा गायक दिनेश कुमार ने बताया सैकड़ों साल पहले रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में हमला कर दिया था। उनकी सेना ने रानी मल्हना के डोले लूट लिए थे। तब वीर भूमि के लोगों ने इस त्योहार को रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से मोर्चा लेकर लूटे गए डोले वापस लिए थे। इसलिए उस दिन रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया गया था।
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लूटे गए कजली से भरे डोले वापस मिलने के बाद महोबा के कीरत सागर में रानी मल्हना ने रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का विसर्जन कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया था। इस दिन घर-घर जलेबी खाने की परंपरा भी है। बहनें भाइयों के हाथों में रक्षा सूत्र बांधती हैं। कजली लेकर महिलाएं सावन गीत गाती हैं और तालाबों में विसर्जन करती हैं।
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जगह-जगह आल्हा-ऊदल की वीरगाथा आल्हा के माध्यम से गाए जाते हैं। बताया बुंदेलखंड में रक्षाबंधन व कजली महोत्सव के दौरान यदि आल्हा न सुनाई पड़े तो सावन मनभावन नहीं लगता है। मगर इस समय कोरोना के कारण आने वाले मंगलवार को यह परंपरागत सिर्फ रस्म अदायगी होगी।
वर्षों पुरानी परंपरा का कजली दंगल मेला रद्द
शहर के रमेड़ी रहुनियां मोहल्ला में 160 साल पुराना कजली दंगल मेला कोरोना संक्रमण के कारण रद्द कर दिया गया है। आयोजक भाजपा नेता राजीव शुक्ला ने बताया उनके पूर्वजों के जमाने से कजली मेला और दंगल का आयोजन होता आ रहा है, लेकिन इस बार कोरोना के कारण यह आयोजन नहीं होगा।