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‘गृहस्थ में रहकर भी मिलते हैं भगवान’

Sun, 28 Dec 2014 11:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हमीरपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, हमीरपुर Updated Sun, 28 Dec 2014 11:42 PM IST
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There are also living in a house of God

भरुआ सुमेरपुर में कृष्ण भक्ति पर चल रहे प्रवचनों की श्रृंखला में कर्मयोग

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विषय पर डा.कुंजेश्वरी ने कहा कि भक्ति भावना के साथ मन को ईश्वर में लगाकर कर्म करना ही कर्मयोग है। जिस कर्म से ईश्वर प्रसन्न हों वहीं कर्म है।

उन्होंने कहा कि कर्म के साथ भक्ति अति आवश्यक है, तभी हमारे कर्म श्रेष्ठ होगें। मन को ईश्वर में लगाए रखने से हमारे द्वारा गलत कर्म नहीं हो सकते है। यदि मन कहीं है, तन कहीं है तो बात नहीं बनती।

संसार के संयोग वियोग रहित अव्यक्त ब्रहृम के मिलन का नाम योग है।  ईष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्म योग है। कर्म एक ही है नियत कर्म आराधना, किंतु उसे करने में दृष्टिकोण दो है, ज्ञान योग व कर्म योग।
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उनका कहना था कि वर्तमान समय में गृहस्थी के जंजाल में उलझे लोग यहीं कहते है कि उनके पास समय नही है। जबकि बृज की गोपियां गृहस्थी का सारा काम करती थी। किंतु उनका मन श्रीकृष्ण में लगा रहता था। यहीं कर्म योग है।
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उनका कहना था कि 99 प्रतिशत महापुरूष गृहस्थ थे। किंतु परमात्मा का सानिध्य प्राप्त कर महापुरूष हो गए। कहा कि गृहस्थ में रहकर ईश्वर पाने का प्रयास करना चाहिए।
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