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बिना काम कराए भी होता था भुगतान
Updated Fri, 01 Sep 2017 02:08 AM IST
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गोरखपुर।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पूर्व प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्र के कार्यकाल में कमीशनखोरी का बोलबाला था। ऑक्सीजन की कमी के बीच बीआरडी मेें मौतों के बाद आयुष के विशेष सचिव और होम्योपैथी निदेशक की जांच में पूर्व प्राचार्य की पत्नी डॉ. पूर्णिमा शुक्ला पर कमीशन वसूली के आरोप सच मिले थे। इस पर वो निलंबित हुईं तो परिसर में उनके कारनामे एक के बाद एक सामने आने लगे हैं। ताजा मामला अनुरक्षण मद में हुई कमीशनखोरी का है। बताया जा रहा है कि ‘मैडम’ की मेहरबानी पर बिना काम कराए ही भुगतान होते थे। लेकिन यह मेहरबानी पाने की कीमत थोड़ी ज्यादा होती थी।
मेडिकल कॉलेज सूत्रों के मुताबिक पूर्व प्राचार्य के कार्यकाल में अनुरक्षण मद से बड़े पैमाने पर काम कराए गए। खड़ंजा निर्माण, घास कटाई, भवनों की मरम्मत, इंटरलॉकिंग, नाला सफाई आदि कामों के नाम पर भारी भरकम भुगतान किया गया। भुगतान के लिए ठेकेदार को ‘मैडम’ की ‘कृपा’ हासिल करनी जरूरी होती थी। इस ‘कृपा’ का रेट तय था। मेडिकल कॉलेज के एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ठीक से काम कराने पर 20 से 25 प्रतिशत कमीशन देना होता था। 10 से 15 प्रतिशत कमीशन प्राचार्य के नाम पर मैडम लेती थीं तो वहीं भुगतान से जुड़े क्लर्क और कर्मचारियों में 10 फीसदी रकम बंटती थी। वहीं तमाम काम सिर्फ कागजों में हुए। अनियमितता के स्तर के अनुसार कमीशन का प्रतिशत घटता-बढ़ता था। मेडिकल कॉलेज में फलफूल रहे इस भ्रष्टाचार को मुख्य सचिव की टीम ने भी अपनी जांच में सच पाया था। इसलिए नौ लोगों पर दर्ज कराए गए केस में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा शामिल करते हुए पूर्व के कार्यों को कैग ऑडिट कराने की संस्तुति की थी।
आवासों की मरम्मत पर डॉक्टरों की संस्तुति नहीं
मेडिकल कॉलेज में आवास मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च हुए। चहेते ठेकेदारों को यह काम आवंटित हुआ। नियमानुसार जिस डॉक्टर को आवास आवंटित थे मरम्मत का काम निपटाने के बाद ठेकेदार को उनसे कार्यपूर्ति की संस्तुति लेनी होती थी, लेकिन ऐसा किए बिना ही ठेकेदार को भुगतान कर दिया गया। सूत्रों की माने तो कार्य का भौतिक सत्यापन किया गया तो बड़ी धांधली सामने आएगी।
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बड़े साहब को जाता था हिस्सा
मेडिकल कॉलेज सूत्रों की माने तो मैडम की मनमानी बेरोकटोक जारी रहने की बड़ी वजह उनका मजबूत नेटवर्क था। लखनऊ में चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक अफसर का प्राचार्य कार्यालय से हर महीने कमीशन तय था। इसलिए मैडम की मनमानी पर कोई उंगली नहीं उठाता था। टुकड़ों में दवा की लोकल पर्चेज करके लाखों की खरीद हुई और जमकर कमीशन बटोरा गया। सूत्रों के मुताबिक पूर्व की सरकार के एक मंत्री मैडम पर खास मेहरबान थे।
साहब की पत्नी को गिफ्ट में ज्वेलरी
मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक अफसर की पत्नी को पिछले दिनों डॉ. पूर्णिमा शुक्ला की ओर से गिफ्ट की गई ज्वेलरी भी खूब चर्चा में है। सूत्रों की माने तो मैडम को लगता था कि जिस तरह वह प्राचार्य को कंट्रोल करती हैं उसी तरह अफसर की मैडम भी अफसर को कंट्रोल करेंगी। लाखों की ज्वेलरी लेने वाली अफसर की पत्नी और उन अफसर की बातें इन दिनों खूब चटखारे लेकर कैंपस में की जा रही हैं।
पैसा देकर आए तो रुपये भी खूब बनाए
मेडिकल कॉलेज में इस बात की चर्चा आम है कि प्राचार्य बनने के लिए मोटी रकम भेंट की जाती रही थी। इसीलिए नियमित प्राचार्य की तैनाती नहीं हो पाती थी। ज्यादातर समय मेडिकल कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्य के जिम्मे ही रहा। 1972 में स्थापित इस कॉलेज को इसी के चलते आयोग से सिर्फ सात प्राचार्य मिल पाए। सूत्रों की माने तो जो लोग नजराना देकर कार्यवाहक प्राचार्य के मलाईदार पद पर आए उन्होंने बदले में रकम भी खूब बनाई।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पूर्व प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्र के कार्यकाल में कमीशनखोरी का बोलबाला था। ऑक्सीजन की कमी के बीच बीआरडी मेें मौतों के बाद आयुष के विशेष सचिव और होम्योपैथी निदेशक की जांच में पूर्व प्राचार्य की पत्नी डॉ. पूर्णिमा शुक्ला पर कमीशन वसूली के आरोप सच मिले थे। इस पर वो निलंबित हुईं तो परिसर में उनके कारनामे एक के बाद एक सामने आने लगे हैं। ताजा मामला अनुरक्षण मद में हुई कमीशनखोरी का है। बताया जा रहा है कि ‘मैडम’ की मेहरबानी पर बिना काम कराए ही भुगतान होते थे। लेकिन यह मेहरबानी पाने की कीमत थोड़ी ज्यादा होती थी।
मेडिकल कॉलेज सूत्रों के मुताबिक पूर्व प्राचार्य के कार्यकाल में अनुरक्षण मद से बड़े पैमाने पर काम कराए गए। खड़ंजा निर्माण, घास कटाई, भवनों की मरम्मत, इंटरलॉकिंग, नाला सफाई आदि कामों के नाम पर भारी भरकम भुगतान किया गया। भुगतान के लिए ठेकेदार को ‘मैडम’ की ‘कृपा’ हासिल करनी जरूरी होती थी। इस ‘कृपा’ का रेट तय था। मेडिकल कॉलेज के एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ठीक से काम कराने पर 20 से 25 प्रतिशत कमीशन देना होता था। 10 से 15 प्रतिशत कमीशन प्राचार्य के नाम पर मैडम लेती थीं तो वहीं भुगतान से जुड़े क्लर्क और कर्मचारियों में 10 फीसदी रकम बंटती थी। वहीं तमाम काम सिर्फ कागजों में हुए। अनियमितता के स्तर के अनुसार कमीशन का प्रतिशत घटता-बढ़ता था। मेडिकल कॉलेज में फलफूल रहे इस भ्रष्टाचार को मुख्य सचिव की टीम ने भी अपनी जांच में सच पाया था। इसलिए नौ लोगों पर दर्ज कराए गए केस में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा शामिल करते हुए पूर्व के कार्यों को कैग ऑडिट कराने की संस्तुति की थी।
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आवासों की मरम्मत पर डॉक्टरों की संस्तुति नहीं
मेडिकल कॉलेज में आवास मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च हुए। चहेते ठेकेदारों को यह काम आवंटित हुआ। नियमानुसार जिस डॉक्टर को आवास आवंटित थे मरम्मत का काम निपटाने के बाद ठेकेदार को उनसे कार्यपूर्ति की संस्तुति लेनी होती थी, लेकिन ऐसा किए बिना ही ठेकेदार को भुगतान कर दिया गया। सूत्रों की माने तो कार्य का भौतिक सत्यापन किया गया तो बड़ी धांधली सामने आएगी।
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बड़े साहब को जाता था हिस्सा
मेडिकल कॉलेज सूत्रों की माने तो मैडम की मनमानी बेरोकटोक जारी रहने की बड़ी वजह उनका मजबूत नेटवर्क था। लखनऊ में चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक अफसर का प्राचार्य कार्यालय से हर महीने कमीशन तय था। इसलिए मैडम की मनमानी पर कोई उंगली नहीं उठाता था। टुकड़ों में दवा की लोकल पर्चेज करके लाखों की खरीद हुई और जमकर कमीशन बटोरा गया। सूत्रों के मुताबिक पूर्व की सरकार के एक मंत्री मैडम पर खास मेहरबान थे।
साहब की पत्नी को गिफ्ट में ज्वेलरी
मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक अफसर की पत्नी को पिछले दिनों डॉ. पूर्णिमा शुक्ला की ओर से गिफ्ट की गई ज्वेलरी भी खूब चर्चा में है। सूत्रों की माने तो मैडम को लगता था कि जिस तरह वह प्राचार्य को कंट्रोल करती हैं उसी तरह अफसर की मैडम भी अफसर को कंट्रोल करेंगी। लाखों की ज्वेलरी लेने वाली अफसर की पत्नी और उन अफसर की बातें इन दिनों खूब चटखारे लेकर कैंपस में की जा रही हैं।
पैसा देकर आए तो रुपये भी खूब बनाए
मेडिकल कॉलेज में इस बात की चर्चा आम है कि प्राचार्य बनने के लिए मोटी रकम भेंट की जाती रही थी। इसीलिए नियमित प्राचार्य की तैनाती नहीं हो पाती थी। ज्यादातर समय मेडिकल कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्य के जिम्मे ही रहा। 1972 में स्थापित इस कॉलेज को इसी के चलते आयोग से सिर्फ सात प्राचार्य मिल पाए। सूत्रों की माने तो जो लोग नजराना देकर कार्यवाहक प्राचार्य के मलाईदार पद पर आए उन्होंने बदले में रकम भी खूब बनाई।