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नवजात कहां से लाएं पैरोकार, पुलिस नहीं बनना चाहती वादी

Sun, 22 Sep 2019 02:18 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Sun, 22 Sep 2019 02:18 AM IST
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नवजात शिशु - फोटो : pixabay

जिन कानूनी प्रावधानों को 1860 में भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया है, इसके तहत मामला दर्ज करने में पुलिस को जोर आ रहा है। दंड प्रक्रिया संहिता की धाराएं भी पुलिस को याद नहीं है कि संज्ञेय अपराध की दशा में पुलिस को किसी वादी की जरूरत नहीं। ऐसे मामलों में पुलिस, संबंधित धाराओं में स्वयं मुकदमा दर्ज कर सकती है। यह सीधे तौर पर कानूनी प्रावधानों से मजाक का मामला है। मजाक उस नवजात के साथ भी है, जिसकी सुरक्षा के लिए कानून में प्रावधान है, मगर जिम्मेदारों की अकर्मण्यता के चलते वह उसे नसीब नहीं है।

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यह भी गौरतलब है कि लावारिस मिलने वाले नवजातों में अधिकतर बालिका शिशु होतीं हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 317-318 की अनदेखी सरकार के बेटी बचाओं संकल्प के विरुद्ध भी है। यदि लिंग के आधार पर नवजात का परित्याग करने वाले अभिभावकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होती तो संभवत: किसी नवजात को यूं ही मरने के लिए छोड़ने वाले माता-पिता सौ बार सोचते तो...।
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नवजात को लावारिस फेंकने वालों को पकड़ने और उनको सजा दिलाने में पुलिस की कोई दिलचस्पी नहीं है। आरपीएफ ने बच्चे को लावारिस पाया और चाइल्ड लाइन के हवाले कर दिया तो जीआरपी ने पूरे मामले से अपना मुंह फेर लिया है। बृहस्पतिवार को मिले नवजात के मामले में जीआरपी ने कोई केस दर्ज नहीं किया है।
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पुलिस का तर्क है कि किसी ने कोई शिकायत नहीं की है तो केस कैसे दर्ज किया जाएगा ? अब सात दिन के जिस नवजात को अपनों ने ही छोड़ दिए वह पैरोकार कहां से लाए? यह बड़ा सवाल है जिसका जवाब देने में जीआरपी अफसर भी बच रहे हैं।

ऐसे में पुलिस का इशारा साफ है कि जब तक कोई भारी भरकम पैरोकार नहीं मिलेगा, तब तक पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करेगी। यही नहीं पुलिस इन मामलों में खुद वादी बनने से बचती है। जबकि, कानूनी प्रावधानों के तहत संज्ञेय अपराध के मामलों में पुलिस को खुद संज्ञान लेकर मुकदमा दर्ज कराना चाहिए। अब सवाल उठता है कि चंद दिन पहले जन्मा बच्चा, वादी कहां से लाए जिससे उसे छोड़ने वाले आरोपियों को सजा मिल सके। बृहस्पतिवार को रेलवे स्टेशन परिसर से एक नवजात को बरामद किया था। पुलिस ने बच्चे को बरामद कर चाइल्ड लाइन भेजा था। जिले में इस तरह के तमाम मामले जब-तब सामने आते रहते हैं।


धारा-317 आईपीसी : माता-पिता या नवजात की देखरेख करने वाले व्यक्ति द्वारा 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे का परित्याग करना अपराध है।
सजा: सात साल की सजा या फिर जुर्माना अथवा कैद और जुर्माना दोनों।
धारा-318 आईपीसी: पैदाइश छुपाने के लिए नवजात को गोपनीय तरीके से जीवित अथवा मृत फेंकना अपराध है।
सजा: दो साल की कैद या जुर्माना या फिर कैद, जुर्माना दोनों।

जिम्मेदार अधिकारी का गैरजिम्मेदाराना बयान...
नवजात के स्टेशन पर मिलने पर उसे चाइल्ड लाइन को सौंप दिया जाता है। उसके पहचान की पुलिस कोशिश भी करती है। लेकिन, केस दर्ज नहीं किया जाता है। जब तक कोई वादी नहीं होगा, केस कैसे दर्ज होगा ? वादी कौन बनेगा ? पुलिस की कोशिश होती है कि बच्चा सुरक्षित घर पहुंचे इसके लिए जांच की जाती है।
उमाशंकर सिंह, सीओ जीआरपी

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