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राम के बाण चढ़ाते ही प्रकट हो गए समुद्र देवता
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फोटो-12-गोंडा के करनैलगंज रामलीला मैदान में राम-लक्ष्मण के साथ सेना। -संवाद
- फोटो : GONDA
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करनैलगंज (गोंडा)। रामलीला महोत्सव में शुक्रवार को विभीषण शरणागति, रामेश्वरम पूजन एवं सेतु निर्माण की लीला का सजीव मंचन किया गया। जिसमें दूरदराज क्षेत्र से आए भारी संख्या में दर्शकों की भीड़ जुटी। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए।
लीला के मंचन में जल चुकी लंका में रावण की सभा होती है। जिसमें विभीषण अपने बड़े भाई रावण को समझाते हैं कि माता सीता को श्रीराम को समर्पित कर दो। व्यर्थ की शत्रुता न बढ़ाओ, इसी में सबकी भलाई है। ऐसा सुनकर रावण क्रोधित हो जाता है, और विभीषण को बुरा भला कहकर पद प्रहार करके लंका से बाहर निकाल देता है। विभीषण लंका से चलकर श्रीराम के शरण में आ जाते हैं। श्रीराम जी समुद्र के जल से विभीषण का अभिषेक करते हैं। इसके बाद समुद्र के तट पर आकर समुद्र से मार्ग देने का आग्रह करते हैं।
समुद्र द्वारा आग्रह न स्वीकार करने पर भगवान राम धनुष पर बाण चढ़ा लेते हैं। तब समुद्र देवता प्रकट होते हैं और भयभीत होकर राम से विनय करते हैं कि सेतु बनाकर लंका को प्रस्थान करें। भगवान राम का आदेश पाकर वानर सेना बड़े-बड़े शिलाखंडों को लेकर समुद्र में डालने लगे। नल और नील को प्राप्त वरदान के प्रभाव एवं हनुमान जी द्वारा पत्थरों पर राम का नाम लिखने से पुल बनकर तैयार हो गया। श्रीराम चंद्र एवं लक्ष्मण ने भगवान शिव की पूजा की। पूजन के पश्चात रामादल सेतु से लंका की ओर प्रस्थान किया। सेतु के पार सुमेर पर्वत पर विश्राम किया। लीला का सजीव मंचन देख हजारों दर्शक भाव विभोर हो गए। समस्त लीला का निर्देशन व संवाद लेखन श्रीभगवान शाह एवं संचालक पंडित राम चरित्र मिश्र, पंडित गिरजा शंकर महंत ने किया।
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लीला के मंचन में जल चुकी लंका में रावण की सभा होती है। जिसमें विभीषण अपने बड़े भाई रावण को समझाते हैं कि माता सीता को श्रीराम को समर्पित कर दो। व्यर्थ की शत्रुता न बढ़ाओ, इसी में सबकी भलाई है। ऐसा सुनकर रावण क्रोधित हो जाता है, और विभीषण को बुरा भला कहकर पद प्रहार करके लंका से बाहर निकाल देता है। विभीषण लंका से चलकर श्रीराम के शरण में आ जाते हैं। श्रीराम जी समुद्र के जल से विभीषण का अभिषेक करते हैं। इसके बाद समुद्र के तट पर आकर समुद्र से मार्ग देने का आग्रह करते हैं।
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समुद्र द्वारा आग्रह न स्वीकार करने पर भगवान राम धनुष पर बाण चढ़ा लेते हैं। तब समुद्र देवता प्रकट होते हैं और भयभीत होकर राम से विनय करते हैं कि सेतु बनाकर लंका को प्रस्थान करें। भगवान राम का आदेश पाकर वानर सेना बड़े-बड़े शिलाखंडों को लेकर समुद्र में डालने लगे। नल और नील को प्राप्त वरदान के प्रभाव एवं हनुमान जी द्वारा पत्थरों पर राम का नाम लिखने से पुल बनकर तैयार हो गया। श्रीराम चंद्र एवं लक्ष्मण ने भगवान शिव की पूजा की। पूजन के पश्चात रामादल सेतु से लंका की ओर प्रस्थान किया। सेतु के पार सुमेर पर्वत पर विश्राम किया। लीला का सजीव मंचन देख हजारों दर्शक भाव विभोर हो गए। समस्त लीला का निर्देशन व संवाद लेखन श्रीभगवान शाह एवं संचालक पंडित राम चरित्र मिश्र, पंडित गिरजा शंकर महंत ने किया।
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