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लापरवाही : बिना मानक के 62 निजी अस्पतालों का कर दिया रजिस्ट्रेशन
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गोंडा। जिले में बिना मानक वाले निजी अस्पताल व नर्सिंग होम का संचालन लोगों की सेहत के लिए बड़ी समस्या बन गई है। स्वास्थ्य विभाग के सत्यापन में अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कराने कराने की संस्तुति कर दी। विभाग ने बिना मानक वाले 62 नर्सिंग होम व निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कर दिया है। अधिक लाभ कमाने के चक्कर में ऐसे नर्सिंग होम व निजी अस्पताल संचालकों की ओर से अपने बेहद कम संसाधन के बावजूद अधिक मरीजों को भर्ती कर न सिर्फ उनका शोषण किया जा रहा है बल्कि उनके सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है। ऐसे अस्पतालों में मरीजों के सही इलाज न होने से उनके अंगों के खराब होने के साथ कभी कभी उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है।
शासन की ओर से लोगों के इलाज के लिए जिला अस्पताल के अलावा ब्लॉकवार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित किये जाने के साथ इंडियन मेडिकल कौंसिल की ओर से निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले निजी मेडिकल संस्थानों को नर्सिंग होम व निजी अस्पताल के रूप में मान्यता दिये जाने का प्रावधान है। जिले में दो जिला अस्पताल के साथ सभी 16 विकास खंडों में एक-एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा 366 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं। इसके अलावा जिले में करीब 80 निजी अस्पताल व नर्सिंग होम संचालित हैं। स्वास्थ्य विभाग ने जिले के 62 ऐसे निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कर लिया है जो मानकों को पूरा नही कर रहे हैं।
रजिस्ट्रेशन के लिए निजी अस्पताल संचालकों की ओर से आये आवेदनों पर विभाग के अधिकारियों ने अस्पताल संचालकों से सेटिंग-गेटिंग कर अस्पतालों के सत्यापन में मानकों की अनदेखी का बड़ा खेल किया है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 62 निजी अस्पतालों को अस्पताल संचालन की आंख मूंदकर मान्यता दे दी गई है। विभाग की ओर से रजिस्टर्ड किये गये इन अस्पतालों में न तो पर्याप्त चिकित्सक हैं न ही पर्याप्त प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी हैं।
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अस्पताल संचालक मामूली मेडिकल की वस्तुएं व जांच की सुविधाएं रखकर धड़ल्ले से अस्पताल चला रहे हैं। इलाज के नाम पर मरीजों की सेहत से न सिर्फ खिलवाड़ किया जा रहा है बल्कि उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है। ऐसे अस्पतालों के मान्यता पर अब सवाल भी उठाए जाने लगे हैं। अस्पतालों के मान्यता व मानकों की जन सूचना के तहत जानकारी मांगे जाने के साथ इसकी स्वास्थ्य निदेशालय से शिकायत किये जाने के बाद से स्वास्थ्य महकमे में खलबली मच गई है। इस बारे में स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी की माने तो मानकों को पूरा न करने वाले अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की भी कार्रवाई की जा सकती है।
निजी अस्पताल संचालन के ये हैं मानक
* डिप्लोमा होल्डर फुल टाइम फार्मासिस्ट * 10 बेड पर एक नर्सिंग सहायक ,एक क्लास फोर्थ कर्मी व एस स्टाफ 30 प्रतिशत एक्सट्रा रात व अवकाश के दिन * दो लैब टेक्निीशिन व लैब असिस्टेंट * एक प्रशासनिक अधिकारी * आवासीय मेडिकल आफिसर डे नाइट * कन्सलटेण्ट डॉक्टर अलग अलग बीमारी के मुताविक * स्पेशल परीक्षण कक्ष * ट्रीटमेंट डे्रसिंग रूम * नर्स स्टाफ /5 बेड * ओटी स्टॉफ फुल टाइम टेक्निकल * एनेस्थिीसिया,असिस्टेंट व टेक्नीशियन * पूछताछ कक्ष, पंजीयन कक्ष, रैम्प, कॉरीडोर, मरीजो के इंतजार करने का एरिया * डायग्नोटिक्स सेक्शन का भवन * ब्लड बैंक * बिजली जनरेटर की सुविधा * इलाज का विभागवार एरिया * खाने की सुविधा * हर स्पेशल विभाग का अलग अलग रूम * ड्रग स्टोर * लैब सुविधा * कैन्टीन आदि।
घरों में संचालित कर दिये नर्सिंग होम
जिले के लगभग 90 फीसदी निजी अस्पताल व नर्सिंगहोम छोटे-छोटे घरों में संचालित हैं। जबकि अस्पताल के संचालन वाले भवन के लिए इंडियन मेडिकल कौंसिल की ओर से एक मानक निर्धारित किया गया है। अस्पताल में बने वार्ड, डॉक्टर रूम, ट्रीटमेंट रूम, ऑपरेशन रूम, डिलेवरी रूम, मरीजों व उनके तीमारदारों के लिए बैठने के लिए पर्याप्त स्थान, कैंटीन व पार्किंग, पेयजल और शौचालय की पर्याप्त स्थान निर्धारित किया गया है। जिले में कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो अधिक तर अस्पताल पहले से बने छोटे बड़े घरों में ही संचालित हैं। हालांकि जिले में जो अस्पताल भी बने हैं वह भी गाइड लाइन के मुताबिक नही बने हैं। उसमें भी कई तरह की खामियां हैं। किसी के यहां पर्याप्त चिकित्सक नही हैं।
अस्पतालों में ऐसे होता है मरीजों का शोषण
निगजी अस्पतालों में मरीजों को इलाज के लिए भर्ती कर लिया जाता है। भर्ती करने के बाद उन्हें जिस लायक इलाज की जरूरत है या फिर ऑपरेशन आदि किये जाना है तो ऐसे मरीजों को कुछ दिना मरीजों अस्पताल में रखा जाता है। इस दौरान दवाओं के साथ महंगा बेड चार्ज वसूल किया जाता है। कभी-कभी तो अस्पताल या फिर निजी अस्पतालों के बाहर वाले कान्ट्रैक्ट वाले डॉक्टरों के आने तक बिना किसी जरूरत के अस्पताल में लिटा कर रखा जाता है। फिर धीरे धीरे कर मरीज के तीमारदारों से मोटी रकमजमा करायी जाती है। बार बार तय रकम से अधिक की वसूली की जाती है इसी को लेकर एक साल पहले एक निजी अस्पताल में मारपीट भी हो चुकी है।
किसी अस्पताल में नहीं लगा कास्ट एंड रेट का बोर्ड
जिले के सभी पंजीकृत अस्पतालों में मरीजों को फीस, दवा अलग अलग कई तरह के चार्ज के नाम पर लूटा जा रहा है। जबकि इसके लिए भी मानक निर्धारित किया गया है। सभी अस्पतालों को अपने यहां दी जाने वाली सुविधाओं इलाज व उस पर आने वाले खर्च आदि का रेट निर्धारित वाला बोर्ड लगाना चाहिए। इतना ही नही उसे समय समय पर मेन टेन भी करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। जैसा केस व मरीज उसे वैसे ही लूटा जा रहा है।
करायी जाएगी जांच
जिले में जो भी निजी अस्पताल व नर्सिंग होम संचालित हैं वह पहले से पंजीकृत हैं। लेकिन यदि किसी अस्पताल की ओर से मरीजों के इलाज में गड़बड़ी की जाती है या फिर वहां मानकों को पूरा नही किया जा रहा है तो उसकी जांच करायी जाएगी। - डॉ. मधु गैरोला, सीएमओ गोंडा।
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शासन की ओर से लोगों के इलाज के लिए जिला अस्पताल के अलावा ब्लॉकवार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित किये जाने के साथ इंडियन मेडिकल कौंसिल की ओर से निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले निजी मेडिकल संस्थानों को नर्सिंग होम व निजी अस्पताल के रूप में मान्यता दिये जाने का प्रावधान है। जिले में दो जिला अस्पताल के साथ सभी 16 विकास खंडों में एक-एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा 366 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं। इसके अलावा जिले में करीब 80 निजी अस्पताल व नर्सिंग होम संचालित हैं। स्वास्थ्य विभाग ने जिले के 62 ऐसे निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कर लिया है जो मानकों को पूरा नही कर रहे हैं।
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रजिस्ट्रेशन के लिए निजी अस्पताल संचालकों की ओर से आये आवेदनों पर विभाग के अधिकारियों ने अस्पताल संचालकों से सेटिंग-गेटिंग कर अस्पतालों के सत्यापन में मानकों की अनदेखी का बड़ा खेल किया है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 62 निजी अस्पतालों को अस्पताल संचालन की आंख मूंदकर मान्यता दे दी गई है। विभाग की ओर से रजिस्टर्ड किये गये इन अस्पतालों में न तो पर्याप्त चिकित्सक हैं न ही पर्याप्त प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी हैं।
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अस्पताल संचालक मामूली मेडिकल की वस्तुएं व जांच की सुविधाएं रखकर धड़ल्ले से अस्पताल चला रहे हैं। इलाज के नाम पर मरीजों की सेहत से न सिर्फ खिलवाड़ किया जा रहा है बल्कि उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है। ऐसे अस्पतालों के मान्यता पर अब सवाल भी उठाए जाने लगे हैं। अस्पतालों के मान्यता व मानकों की जन सूचना के तहत जानकारी मांगे जाने के साथ इसकी स्वास्थ्य निदेशालय से शिकायत किये जाने के बाद से स्वास्थ्य महकमे में खलबली मच गई है। इस बारे में स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी की माने तो मानकों को पूरा न करने वाले अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की भी कार्रवाई की जा सकती है।
निजी अस्पताल संचालन के ये हैं मानक
* डिप्लोमा होल्डर फुल टाइम फार्मासिस्ट * 10 बेड पर एक नर्सिंग सहायक ,एक क्लास फोर्थ कर्मी व एस स्टाफ 30 प्रतिशत एक्सट्रा रात व अवकाश के दिन * दो लैब टेक्निीशिन व लैब असिस्टेंट * एक प्रशासनिक अधिकारी * आवासीय मेडिकल आफिसर डे नाइट * कन्सलटेण्ट डॉक्टर अलग अलग बीमारी के मुताविक * स्पेशल परीक्षण कक्ष * ट्रीटमेंट डे्रसिंग रूम * नर्स स्टाफ /5 बेड * ओटी स्टॉफ फुल टाइम टेक्निकल * एनेस्थिीसिया,असिस्टेंट व टेक्नीशियन * पूछताछ कक्ष, पंजीयन कक्ष, रैम्प, कॉरीडोर, मरीजो के इंतजार करने का एरिया * डायग्नोटिक्स सेक्शन का भवन * ब्लड बैंक * बिजली जनरेटर की सुविधा * इलाज का विभागवार एरिया * खाने की सुविधा * हर स्पेशल विभाग का अलग अलग रूम * ड्रग स्टोर * लैब सुविधा * कैन्टीन आदि।
घरों में संचालित कर दिये नर्सिंग होम
जिले के लगभग 90 फीसदी निजी अस्पताल व नर्सिंगहोम छोटे-छोटे घरों में संचालित हैं। जबकि अस्पताल के संचालन वाले भवन के लिए इंडियन मेडिकल कौंसिल की ओर से एक मानक निर्धारित किया गया है। अस्पताल में बने वार्ड, डॉक्टर रूम, ट्रीटमेंट रूम, ऑपरेशन रूम, डिलेवरी रूम, मरीजों व उनके तीमारदारों के लिए बैठने के लिए पर्याप्त स्थान, कैंटीन व पार्किंग, पेयजल और शौचालय की पर्याप्त स्थान निर्धारित किया गया है। जिले में कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो अधिक तर अस्पताल पहले से बने छोटे बड़े घरों में ही संचालित हैं। हालांकि जिले में जो अस्पताल भी बने हैं वह भी गाइड लाइन के मुताबिक नही बने हैं। उसमें भी कई तरह की खामियां हैं। किसी के यहां पर्याप्त चिकित्सक नही हैं।
अस्पतालों में ऐसे होता है मरीजों का शोषण
निगजी अस्पतालों में मरीजों को इलाज के लिए भर्ती कर लिया जाता है। भर्ती करने के बाद उन्हें जिस लायक इलाज की जरूरत है या फिर ऑपरेशन आदि किये जाना है तो ऐसे मरीजों को कुछ दिना मरीजों अस्पताल में रखा जाता है। इस दौरान दवाओं के साथ महंगा बेड चार्ज वसूल किया जाता है। कभी-कभी तो अस्पताल या फिर निजी अस्पतालों के बाहर वाले कान्ट्रैक्ट वाले डॉक्टरों के आने तक बिना किसी जरूरत के अस्पताल में लिटा कर रखा जाता है। फिर धीरे धीरे कर मरीज के तीमारदारों से मोटी रकमजमा करायी जाती है। बार बार तय रकम से अधिक की वसूली की जाती है इसी को लेकर एक साल पहले एक निजी अस्पताल में मारपीट भी हो चुकी है।
किसी अस्पताल में नहीं लगा कास्ट एंड रेट का बोर्ड
जिले के सभी पंजीकृत अस्पतालों में मरीजों को फीस, दवा अलग अलग कई तरह के चार्ज के नाम पर लूटा जा रहा है। जबकि इसके लिए भी मानक निर्धारित किया गया है। सभी अस्पतालों को अपने यहां दी जाने वाली सुविधाओं इलाज व उस पर आने वाले खर्च आदि का रेट निर्धारित वाला बोर्ड लगाना चाहिए। इतना ही नही उसे समय समय पर मेन टेन भी करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। जैसा केस व मरीज उसे वैसे ही लूटा जा रहा है।
करायी जाएगी जांच
जिले में जो भी निजी अस्पताल व नर्सिंग होम संचालित हैं वह पहले से पंजीकृत हैं। लेकिन यदि किसी अस्पताल की ओर से मरीजों के इलाज में गड़बड़ी की जाती है या फिर वहां मानकों को पूरा नही किया जा रहा है तो उसकी जांच करायी जाएगी। - डॉ. मधु गैरोला, सीएमओ गोंडा।