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आरक्षण से पंचायतों की बदली तस्वीर, घमासान तय
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गोंडा में जिला पंचायत भवन।
- फोटो : GONDA
गोंडा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण तय से कई पंचायतों की सूरत बदल गई है। ब्लाक प्रमुखों के पदों में बड़े परिवर्तन होने से सियासतदानों ने गोटें बिछानी शुरू कर दी हैं।
वहीं पंचायतों के प्रधान पदों में बड़े स्तर पर आरक्षण में फेरबदल होने से 300 गांवों के धुरंधरों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। वह अपने करीबी को ही चुनाव जीता कर पंचायत की सरकार पर जमे रहने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं कई पंचायतों में लोगों को नई राह भी मिली है।
पहली बार पंचायतों के आरक्षण में दो-दो बार हुई कवायद से लोगों की एक माह से सांसे अटकी हुईं हैं। पहले चरण में तीन मार्च को जारी हुई आरक्षण के आधार पर लोगों ने तैयारी ही शुरू की थी कि फिर दूसरे नियमों से आरक्षण तैयार हो गया।
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जिले में 1204 पंचायतों का चुनाव अभी होना है, 10 पंचायतों का चुनाव बाद में होगा। ब्लाक प्रमुख के लिए कई बड़ों के परिवार के लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं। पहली बार तैयार हुए आरक्षण की सूची में झंझरी ब्लाक अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित थी।
इस बार झंझरी ब्लाक प्रमुख महिला ही हैं लेकिन सीट वर्ष 2015 में अनारक्षित थी। इस बार महिला हुई है, ऐसे में फिर से मौजूदा प्रमुुख ही मैदान में उतर सकती हैं। इसी तरह मुजेहना ब्लॉक इस बार पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित हैं। वहां ब्लाक प्रमुख की तैयार कर रहे एक बड़े नेता की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
एक बड़े नेता के परिवारजनों रूपईडीह ब्लाक में मतदाता बनकर तैयारी कर रहे हैं। इसी तरह कई और ब्लाकों में घमासान होना तय माना जा रहा है। इसी तरह पंचायतों में हुए बदलावों से पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे सियासतदानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
नए आरक्षण से पंचायतों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पंचायतों के आरक्षण पहले तय होने से लोगों ने प्रचार में ताकत झोंक दी थी। लाखों खर्च करके जमीन तैयार किए गए थे। लेकिन अब सीटों में बड़े स्तर पर परिवर्तन हो गया, जिससे अब उनकी खर्च किए पैसे पर पानी फिर गया है।
बेलसर के डिडसिया कला में अनारक्षित थी लेकिन अब वह अनुसूचित वर्ग की हो गई है। इसी तरह झंझरी के पूरे शिवा बख्तावर की सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी अब वह सामान्य हो गई है। इसी तरह पकवान गांव पहले ओबीसी था और अब अनूसूचित वर्ग का हो गया।
ऐसे ही 300 से अधिक गांवों में बड़े स्तर पर फेरबदल हो गए हैं, इससे लोगों के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसी तरह क्षेत्र पंचायत सदस्यो के पदों में भी परिवर्तन हो गए हैं और इससे लोगों के गणित बिगड़ गए हैं।
आरक्षण होने के बाद जिला पंचायत के 65 पदों पर तो घमासान सामान्य ही रहेगा। माना जा रहा है कि इससे अध्यक्ष जिला पंचायत का पद सामान्य होना है। इस पद पर लोगों ने मन बना लिया है कि कोई और मैदान में आने से रहा।
कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन से ही वर्ष 1995 के बाद से अध्यक्ष पद पर लोगों का निर्वाचन होता रहा है। केवल वर्ष 2015 में सपा के पूर्व मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह अपनी पुत्र वधू को अध्यक्ष बनाने में सफल रहे लेकिन कार्यकाल पूरा नही कर सके।
वर्ष 2017 में भाजपा सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर कैसरगंज सांसद की पत्नी केतकी सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। इस बार तो तय है कि कैसरगंज सांसद का दबदबा कायम रहेगा। इससे जिला पंचायत सदस्य के बजाए क्षेत्र पंचायत सदस्य के 1612 पदों पर लोगों की नजर टिकी है। जो प्रधान पद के दावेदारी से बाहर हो गए हैं वह क्षेत्र पंचायत सदस्य के लिए किस्मत अजमाने की तैयारी में हैं।
त्रिस्तरीय पंचायत निर्वाचन में पंचायतों के 18271 पदों के लिए चुनाव होंगे। 1214 प्रधान के पदों के आरक्षण तय हो रहा है और चुनाव 1204 प्रधान के पदों पर चुनाव होंगे। 10 पंचायतों में अभी चुनाव अभी नही होंगे। जिला पंचायत के 65 पदों, सदस्य के 15410 पदों तथा क्षेत्र पंचायत सदस्यों के 1612 पदों के लिए चुनाव होने हैं।
इसके लिए नामांकन के साथ ही मतदान की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। पंचायतों के आरक्षण तय होने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। गावों में चुनावी शोर बढ़ने लगा है और गावों में सियासी चौपाल हो गई है। चुनाव लड़ने वाले करीब 50 हजार से अधिक लोगों की निगाहें आरक्षण की सूची पर टिकी है।
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वहीं पंचायतों के प्रधान पदों में बड़े स्तर पर आरक्षण में फेरबदल होने से 300 गांवों के धुरंधरों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। वह अपने करीबी को ही चुनाव जीता कर पंचायत की सरकार पर जमे रहने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं कई पंचायतों में लोगों को नई राह भी मिली है।
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पहली बार पंचायतों के आरक्षण में दो-दो बार हुई कवायद से लोगों की एक माह से सांसे अटकी हुईं हैं। पहले चरण में तीन मार्च को जारी हुई आरक्षण के आधार पर लोगों ने तैयारी ही शुरू की थी कि फिर दूसरे नियमों से आरक्षण तैयार हो गया।
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जिले में 1204 पंचायतों का चुनाव अभी होना है, 10 पंचायतों का चुनाव बाद में होगा। ब्लाक प्रमुख के लिए कई बड़ों के परिवार के लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं। पहली बार तैयार हुए आरक्षण की सूची में झंझरी ब्लाक अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित थी।
इस बार झंझरी ब्लाक प्रमुख महिला ही हैं लेकिन सीट वर्ष 2015 में अनारक्षित थी। इस बार महिला हुई है, ऐसे में फिर से मौजूदा प्रमुुख ही मैदान में उतर सकती हैं। इसी तरह मुजेहना ब्लॉक इस बार पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित हैं। वहां ब्लाक प्रमुख की तैयार कर रहे एक बड़े नेता की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
एक बड़े नेता के परिवारजनों रूपईडीह ब्लाक में मतदाता बनकर तैयारी कर रहे हैं। इसी तरह कई और ब्लाकों में घमासान होना तय माना जा रहा है। इसी तरह पंचायतों में हुए बदलावों से पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे सियासतदानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
नए आरक्षण से पंचायतों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पंचायतों के आरक्षण पहले तय होने से लोगों ने प्रचार में ताकत झोंक दी थी। लाखों खर्च करके जमीन तैयार किए गए थे। लेकिन अब सीटों में बड़े स्तर पर परिवर्तन हो गया, जिससे अब उनकी खर्च किए पैसे पर पानी फिर गया है।
बेलसर के डिडसिया कला में अनारक्षित थी लेकिन अब वह अनुसूचित वर्ग की हो गई है। इसी तरह झंझरी के पूरे शिवा बख्तावर की सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी अब वह सामान्य हो गई है। इसी तरह पकवान गांव पहले ओबीसी था और अब अनूसूचित वर्ग का हो गया।
ऐसे ही 300 से अधिक गांवों में बड़े स्तर पर फेरबदल हो गए हैं, इससे लोगों के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसी तरह क्षेत्र पंचायत सदस्यो के पदों में भी परिवर्तन हो गए हैं और इससे लोगों के गणित बिगड़ गए हैं।
आरक्षण होने के बाद जिला पंचायत के 65 पदों पर तो घमासान सामान्य ही रहेगा। माना जा रहा है कि इससे अध्यक्ष जिला पंचायत का पद सामान्य होना है। इस पद पर लोगों ने मन बना लिया है कि कोई और मैदान में आने से रहा।
कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन से ही वर्ष 1995 के बाद से अध्यक्ष पद पर लोगों का निर्वाचन होता रहा है। केवल वर्ष 2015 में सपा के पूर्व मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह अपनी पुत्र वधू को अध्यक्ष बनाने में सफल रहे लेकिन कार्यकाल पूरा नही कर सके।
वर्ष 2017 में भाजपा सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और फिर कैसरगंज सांसद की पत्नी केतकी सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। इस बार तो तय है कि कैसरगंज सांसद का दबदबा कायम रहेगा। इससे जिला पंचायत सदस्य के बजाए क्षेत्र पंचायत सदस्य के 1612 पदों पर लोगों की नजर टिकी है। जो प्रधान पद के दावेदारी से बाहर हो गए हैं वह क्षेत्र पंचायत सदस्य के लिए किस्मत अजमाने की तैयारी में हैं।
त्रिस्तरीय पंचायत निर्वाचन में पंचायतों के 18271 पदों के लिए चुनाव होंगे। 1214 प्रधान के पदों के आरक्षण तय हो रहा है और चुनाव 1204 प्रधान के पदों पर चुनाव होंगे। 10 पंचायतों में अभी चुनाव अभी नही होंगे। जिला पंचायत के 65 पदों, सदस्य के 15410 पदों तथा क्षेत्र पंचायत सदस्यों के 1612 पदों के लिए चुनाव होने हैं।
इसके लिए नामांकन के साथ ही मतदान की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। पंचायतों के आरक्षण तय होने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। गावों में चुनावी शोर बढ़ने लगा है और गावों में सियासी चौपाल हो गई है। चुनाव लड़ने वाले करीब 50 हजार से अधिक लोगों की निगाहें आरक्षण की सूची पर टिकी है।