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15 साल तक कर्मभूमि रही गोंडा-बलरामपुर की धरती
Updated Fri, 17 Aug 2018 11:04 PM IST
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डेढ़ दशक तक गोंडा-बलरामपुर रहा कर्मभूमि
गोंडा। बलरामपुर लोकसभा सीट से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल विहारी बाजपेयी की कई स्मृतियां यहां से जुड़ी हैं।
उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले उनके साथी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियों को जिले के अधिवक्ता मिर्जा शाहिद वेग ने अपनी पुस्तक अटल और बलरामपुर (अतीत के झरोखों से) करीने से संजोया है।
वर्ष 1957 से 1971 तक बलरामपुर उनकी कर्मभूमि रही तब बलरामपुर गोंडा जिले का हिस्सा था। 1997 में बलरामपुर अलग जिला बन गया लेकिन पुस्तक में उनसे जुड़ी यहां की कई स्मृतियां हैं।
अटल बिहारी बाजपेई ने अपना राजनीतिक सफर बलरामपुर से शुरू किया और वह 1957 में इसी लोक सभा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1967 में वह दूसरी बार इसी लोक सभा से सांसद चुने गये।
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उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर गोंडा के वरिष्ठ अधिवक्ता मिर्जा शाहिद बेग ने उन पर एक पुस्तक अटल और बलरामपुर अतीत के झरोखों से जनवरी 2004 में लिखी। इस किताब का विमोचन 7 फरवरी 2004 को फैजाबाद में एक बड़ी जनसभा में करते हुए अटल जी ने यह कहा था कि इस पुस्तक ने मुझे आज बलरामपुर व गोडा से जूुड़े उनके साथियों को करीब ला दिया है।
जब अटल जी को उतारने पड़े थे कपड़े
1957 में अटल जी जब बलरामपुर से संासद का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्हें कपड़े भी उतारने पड़े थे। हुआ यूं कि अटलजी इस चुनाव में अपने प्रचार के बाद पंडित पंदुमनाथ के घर ही आकर विश्राम व भोजन करते थे। एक रात ठंड ज्यादा थी। अटल जी को भूख व थकान थी।
पदुम नाथ के घर भोजन चौके में करना था। पहुंचने के बाद जैसे कान में आवाज आयी कि भोजन तैयार है। अटल जी चौके की तरफ लपके, तथी पदुम जी की आवाज ने उनके कदमों को रोक दिया और कहा कि यहां आंगा (वस्त्र) निकालकर भोजन करना पड़ेगा।
अटलजी ने मुस्कराते हुए कपड़े उतारे, धोती व खड़ाऊ पहनकर पैर धोये और भोजन किया। खाना खाने के बाद अटल जी बोल ही दिये-आप लोग भी अजीब हैं, जनता के बीच कांगेस के कपड़े उतराते हैं और अकेला पाकर मेरे।
सुबह तुम कहां थे गिलास देवता
1967 की बात है कि लोक सभा व विधान सभा के चुनाव साथ-साथ हो रहे थे। गोंडा में भी जनसंध के चुनाव प्रचार में वे हिस्सा लेते थे। गोंडा से त्रिवेनी सहाय एमएलए का चुनाव लड़ रहे थे। चुनावी सभा करने के बाद वह अपने एक कार्यकर्ता के घर पहुंचे तो उन्हें सुबह नास्ते में छोटे से गिलास में दूध पीने को मिला।
शाम को उसी कार्यकर्ता के घर पहुंच तो पीने के लिए पटियाला के गिलास में पीने का पानी दिया गया तो अपने स्वभाव के अनुसार मुस्कारते हुए पानी पिया, फिर हंस कर बोले- सुबह कहां थे तुम गिलास देवता।
फोटो-1-2-3
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गोंडा। बलरामपुर लोकसभा सीट से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल विहारी बाजपेयी की कई स्मृतियां यहां से जुड़ी हैं।
उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले उनके साथी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियों को जिले के अधिवक्ता मिर्जा शाहिद वेग ने अपनी पुस्तक अटल और बलरामपुर (अतीत के झरोखों से) करीने से संजोया है।
वर्ष 1957 से 1971 तक बलरामपुर उनकी कर्मभूमि रही तब बलरामपुर गोंडा जिले का हिस्सा था। 1997 में बलरामपुर अलग जिला बन गया लेकिन पुस्तक में उनसे जुड़ी यहां की कई स्मृतियां हैं।
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अटल बिहारी बाजपेई ने अपना राजनीतिक सफर बलरामपुर से शुरू किया और वह 1957 में इसी लोक सभा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 1967 में वह दूसरी बार इसी लोक सभा से सांसद चुने गये।
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उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर गोंडा के वरिष्ठ अधिवक्ता मिर्जा शाहिद बेग ने उन पर एक पुस्तक अटल और बलरामपुर अतीत के झरोखों से जनवरी 2004 में लिखी। इस किताब का विमोचन 7 फरवरी 2004 को फैजाबाद में एक बड़ी जनसभा में करते हुए अटल जी ने यह कहा था कि इस पुस्तक ने मुझे आज बलरामपुर व गोडा से जूुड़े उनके साथियों को करीब ला दिया है।
जब अटल जी को उतारने पड़े थे कपड़े
1957 में अटल जी जब बलरामपुर से संासद का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्हें कपड़े भी उतारने पड़े थे। हुआ यूं कि अटलजी इस चुनाव में अपने प्रचार के बाद पंडित पंदुमनाथ के घर ही आकर विश्राम व भोजन करते थे। एक रात ठंड ज्यादा थी। अटल जी को भूख व थकान थी।
पदुम नाथ के घर भोजन चौके में करना था। पहुंचने के बाद जैसे कान में आवाज आयी कि भोजन तैयार है। अटल जी चौके की तरफ लपके, तथी पदुम जी की आवाज ने उनके कदमों को रोक दिया और कहा कि यहां आंगा (वस्त्र) निकालकर भोजन करना पड़ेगा।
अटलजी ने मुस्कराते हुए कपड़े उतारे, धोती व खड़ाऊ पहनकर पैर धोये और भोजन किया। खाना खाने के बाद अटल जी बोल ही दिये-आप लोग भी अजीब हैं, जनता के बीच कांगेस के कपड़े उतराते हैं और अकेला पाकर मेरे।
सुबह तुम कहां थे गिलास देवता
1967 की बात है कि लोक सभा व विधान सभा के चुनाव साथ-साथ हो रहे थे। गोंडा में भी जनसंध के चुनाव प्रचार में वे हिस्सा लेते थे। गोंडा से त्रिवेनी सहाय एमएलए का चुनाव लड़ रहे थे। चुनावी सभा करने के बाद वह अपने एक कार्यकर्ता के घर पहुंचे तो उन्हें सुबह नास्ते में छोटे से गिलास में दूध पीने को मिला।
शाम को उसी कार्यकर्ता के घर पहुंच तो पीने के लिए पटियाला के गिलास में पीने का पानी दिया गया तो अपने स्वभाव के अनुसार मुस्कारते हुए पानी पिया, फिर हंस कर बोले- सुबह कहां थे तुम गिलास देवता।
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