{"_id":"61aba383834eeb0174188479","slug":"4-rupees-medicine-compulsion-to-take-120-rupees-gonda-news-lko607426079","type":"story","status":"publish","title_hn":"4 रुपये की दवा, 120 रुपये में लेने की मजबूरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
4 रुपये की दवा, 120 रुपये में लेने की मजबूरी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोंडा। जिला अस्पताल परिसर के ही जन औषधि केंद्र में 4 रुपये में मिलने वाली शुगर की दवा मरीजों को मेडिकल स्टोर से 120 रुपये में, 146 रुपये में मिलने वाली लीवर की दवा 350 रुपये में और प्रोस्टेट की 24 रुपये में मिलने वाली दवा 525 रुपये मेें खरीदना पड़ रही है। मरीजों ने बताया कि डॉक्टर साहब दवा लिखते समय ही कड़ी हिदायत देते हैं कि सड़क पार मेडिकल स्टोरों से ही दवा लेना तभी फायदा मिलेगा।
जिला अस्पताल के डॉक्टरों की मनमानी के चलते ही मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई पीएम जन औषधि केंद्र योजना फेल साबित होने लगी है। शनिवार को जिला अस्पताल में इलाज कराने आई लक्ष्मी को जन औषधि केंद्र पर मात्र चार रुपये में मिलने वाली शुगर की दवा अस्पताल के सामने मेडिकल स्टोर से 120 रुपये में खरीदना पड़ा।
पूछने पर बताया कि डॉक्टर ने सड़क के उस पार से एक मेडिकल स्टोर से ही दने के लिए कहा था। जिला अस्पताल परिसर स्थित जन औषधि केद्र पर पता चला कि शुगर की दवा ग्लिमेपाइराइड टेबलेट्स मात्र चार रुपये में बिकती है। इसी फार्मूला पर तैयार शुगर की ब्रांडेड दवा लक्ष्मी मजबूरी में 120 रुपये में खरीदना पड़ी है।
विज्ञापन
कमीशन के खेल में ओपीडी में डॉक्टर मरीजों को सड़क पार चिन्हित मेडिकल स्टोरों से ही दवा खरीदने को निर्देशित करते हैं। ओपीडी के बाहर ही बेखौफ मौजूद मेडिकल स्टोर के दलाल मरीज को पकड़ कर मेडिकल स्टोर तक ले जाकर दवा खरीदने को मजबूर करते है।
ऐसे में मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए परिसर में ही संचालित जन औषधि केंद्र पर सन्नाटा ही पसरा रहता है। जन औषधि केंद्र के संचालक अनूप टंडन ने बताया कि जन औषधि केंद्र पर सभी प्रकार की लगभग तीन सौ प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं।
लेकिन कमीशन के चक्कर में डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं। वहीं, जो जागरूक मरीज जेनरिक दवाएं खरीदते भी है, उन्हें दवा सही न होने की बात कहते हुए डॉक्टर वापस करने का दबाव भी बनाते हैं।
अमर उजाला में कमीशन के खेल से फेल हो रहे जन औषधि केंद्र की खबर प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद अस्पताल प्रशासन इसकी रोकथाम में जुट गया है। प्रमुख अधीक्षक डॉ घनश्याम सिंह ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल के सभी डॉक्टरों को प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र पर मौजूद जेनरिक दवाएं ही लिखने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही ओपीडी परिसर में भी जन औषधि केंद्र का पोस्टर चस्पा कर मरीजों को दवा यही से खरीदने को जागरूक भी किया जाने लगा है।
प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक ने नियमित व संविदा पर तैनात सभी डॉक्टरों को निर्देशित किया है कि सभी लोग इलाज के दौरान आने वाले मरीजों को ओपीडी एवं भर्ती के समय पहले तो अस्पताल में उपलब्ध दवाएं ही लिखें। यदि अस्पताल में दवा उपलब्ध न हो तो ऐसी जेनरिक दवा ही लिखी जाए जिन्हें पीएम जन औषधि केंद्र से खरीदा जा सके। यहां से खरीदी गयी दवा को किसी भी हालत में वापस करने को न कहा जाए।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) भी 21 अप्रैल 2017 को सख्त आदेश जारी कर सभी डॉक्टरों को मरीज के पर्चे पर जेनरिक दवाएं ही लिखने का निर्देश दे चुकी है। एमसीआई ने इसके साथ ही कहा है कि दवाएं लिखते समय केवल सॉल्ट का नाम ही लिखा जाए, किसी कंपनी की दवा के ब्रांड का नाम पर्चे पर बिल्कुल भी न लिखा जाए। जिला अस्पताल के डॉक्टर एमसीआई के इस निर्देश का पालन भी नहीं कर रहे हैं।
विज्ञापन
जिला अस्पताल के डॉक्टरों की मनमानी के चलते ही मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई पीएम जन औषधि केंद्र योजना फेल साबित होने लगी है। शनिवार को जिला अस्पताल में इलाज कराने आई लक्ष्मी को जन औषधि केंद्र पर मात्र चार रुपये में मिलने वाली शुगर की दवा अस्पताल के सामने मेडिकल स्टोर से 120 रुपये में खरीदना पड़ा।
विज्ञापन
पूछने पर बताया कि डॉक्टर ने सड़क के उस पार से एक मेडिकल स्टोर से ही दने के लिए कहा था। जिला अस्पताल परिसर स्थित जन औषधि केद्र पर पता चला कि शुगर की दवा ग्लिमेपाइराइड टेबलेट्स मात्र चार रुपये में बिकती है। इसी फार्मूला पर तैयार शुगर की ब्रांडेड दवा लक्ष्मी मजबूरी में 120 रुपये में खरीदना पड़ी है।
विज्ञापन
कमीशन के खेल में ओपीडी में डॉक्टर मरीजों को सड़क पार चिन्हित मेडिकल स्टोरों से ही दवा खरीदने को निर्देशित करते हैं। ओपीडी के बाहर ही बेखौफ मौजूद मेडिकल स्टोर के दलाल मरीज को पकड़ कर मेडिकल स्टोर तक ले जाकर दवा खरीदने को मजबूर करते है।
ऐसे में मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए परिसर में ही संचालित जन औषधि केंद्र पर सन्नाटा ही पसरा रहता है। जन औषधि केंद्र के संचालक अनूप टंडन ने बताया कि जन औषधि केंद्र पर सभी प्रकार की लगभग तीन सौ प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं।
लेकिन कमीशन के चक्कर में डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं। वहीं, जो जागरूक मरीज जेनरिक दवाएं खरीदते भी है, उन्हें दवा सही न होने की बात कहते हुए डॉक्टर वापस करने का दबाव भी बनाते हैं।
अमर उजाला में कमीशन के खेल से फेल हो रहे जन औषधि केंद्र की खबर प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद अस्पताल प्रशासन इसकी रोकथाम में जुट गया है। प्रमुख अधीक्षक डॉ घनश्याम सिंह ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल के सभी डॉक्टरों को प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र पर मौजूद जेनरिक दवाएं ही लिखने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही ओपीडी परिसर में भी जन औषधि केंद्र का पोस्टर चस्पा कर मरीजों को दवा यही से खरीदने को जागरूक भी किया जाने लगा है।
प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक ने नियमित व संविदा पर तैनात सभी डॉक्टरों को निर्देशित किया है कि सभी लोग इलाज के दौरान आने वाले मरीजों को ओपीडी एवं भर्ती के समय पहले तो अस्पताल में उपलब्ध दवाएं ही लिखें। यदि अस्पताल में दवा उपलब्ध न हो तो ऐसी जेनरिक दवा ही लिखी जाए जिन्हें पीएम जन औषधि केंद्र से खरीदा जा सके। यहां से खरीदी गयी दवा को किसी भी हालत में वापस करने को न कहा जाए।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) भी 21 अप्रैल 2017 को सख्त आदेश जारी कर सभी डॉक्टरों को मरीज के पर्चे पर जेनरिक दवाएं ही लिखने का निर्देश दे चुकी है। एमसीआई ने इसके साथ ही कहा है कि दवाएं लिखते समय केवल सॉल्ट का नाम ही लिखा जाए, किसी कंपनी की दवा के ब्रांड का नाम पर्चे पर बिल्कुल भी न लिखा जाए। जिला अस्पताल के डॉक्टर एमसीआई के इस निर्देश का पालन भी नहीं कर रहे हैं।