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न अब वह होली, ना ही रहा वह हुड़दंग
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दिलदारनगर। होली का नाम ही सुन कर अंग अंग में जोश और उत्साह का संचार हो जाता है। चाहे अपना हो या पराया बस सभी को रंग से सराबोर कर देने का काम एक पखवारा पहले से ही शुरु हो जाता था। बदलते परिवेश में त्योंहार मनाने की भी परंपरा अब बदल गई। कमसार क्षेत्र की होली तो यूपी बिहार में भी मानी जाती थी। कभी पंद्रह दिन तक मनाई जाने वाली होली अब एक ही दिन तक सिमट कर रह गई। न तो वह फगुआ के गीत रह गए और न ही होली के वह हुड़दंग।
फागुन की गीत होली खेलत रंग बनाय ठाकुर धाम में गुनगुनाते हुए तथा अपने जमाने को याद करते हुए समाजसेवी रणजीत सिंह कहते है कि फागुन महीना शुरु होते ही गांवों की गलियों में शाम को झाल, मंजीरा, ढोलक आदि लेकर श्रृंगार रस से भरी फागुनी गीतों की बौछार होने लगती थी। बस जो भी आता उसी रंग में रंग जाता इससे भाईचारें को मजबूती मिलती। होली की इस ठिठोली से मुहल्लों की घरों से महिलाएं फागुनी गीतों को सुनने के लिए आतुर हो जाती थी। अब वह सब बात नहीं रह गई है। गीतों में फूहड़ता आ गई है। बेटी, महिला को साथ लेकर रास्ते से गुजरते समय शर्म आ जाय। इधर पुरानी परंपरा को जिंदा रखते हुए दिलदारनगर बाजार के अशोक कुमार गुप्ता कहते हैं कि आज के समय में लोग तनाव के बीच पर्व को मना रहे है। भाईचारें से लोग भटक गए है। अश्लीलता बढ़ गई हैं। पहले के गीतों में रामायण से लगायत महाभारत के ग्रंथों को जोड़ते हुए प्राकृतिक रूपों से जुड़ाव हुआ करता था। उस दौर में बहन हो, बेटी हो, पत्नी हो, बड़े-छोटे भाइयों के बीच रह कर फागुन गीतों में डूबकर होली की हुड़दंग होती थी। अब पूरा माहौल बदल गया है। गांवों में होली के पंद्रह दिन पहले से फ़ागुन गीतों की वातावरण बन जाता था। एक जगह बैठकर सबको सम्मान दिया जाता था। युवा पीढ़ी पुराने लोगों के बीच बैठने से कतरा रही है। युवा अश्लीलता को महत्व देते हुए शराबों के नशे में लिप्त हो रहे हैं।
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फागुन की गीत होली खेलत रंग बनाय ठाकुर धाम में गुनगुनाते हुए तथा अपने जमाने को याद करते हुए समाजसेवी रणजीत सिंह कहते है कि फागुन महीना शुरु होते ही गांवों की गलियों में शाम को झाल, मंजीरा, ढोलक आदि लेकर श्रृंगार रस से भरी फागुनी गीतों की बौछार होने लगती थी। बस जो भी आता उसी रंग में रंग जाता इससे भाईचारें को मजबूती मिलती। होली की इस ठिठोली से मुहल्लों की घरों से महिलाएं फागुनी गीतों को सुनने के लिए आतुर हो जाती थी। अब वह सब बात नहीं रह गई है। गीतों में फूहड़ता आ गई है। बेटी, महिला को साथ लेकर रास्ते से गुजरते समय शर्म आ जाय। इधर पुरानी परंपरा को जिंदा रखते हुए दिलदारनगर बाजार के अशोक कुमार गुप्ता कहते हैं कि आज के समय में लोग तनाव के बीच पर्व को मना रहे है। भाईचारें से लोग भटक गए है। अश्लीलता बढ़ गई हैं। पहले के गीतों में रामायण से लगायत महाभारत के ग्रंथों को जोड़ते हुए प्राकृतिक रूपों से जुड़ाव हुआ करता था। उस दौर में बहन हो, बेटी हो, पत्नी हो, बड़े-छोटे भाइयों के बीच रह कर फागुन गीतों में डूबकर होली की हुड़दंग होती थी। अब पूरा माहौल बदल गया है। गांवों में होली के पंद्रह दिन पहले से फ़ागुन गीतों की वातावरण बन जाता था। एक जगह बैठकर सबको सम्मान दिया जाता था। युवा पीढ़ी पुराने लोगों के बीच बैठने से कतरा रही है। युवा अश्लीलता को महत्व देते हुए शराबों के नशे में लिप्त हो रहे हैं।
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