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गेहूं की फसल में लग रहा गेरुआ रोग
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फतेहपुर। मौसम के उतार-चढ़ाव का असर किसानों की फसलों में दिखाई देने लगा है। खेतों में हरीभरी फसलें जो ओलावृष्टि व बारिश से बच गई हैं, उनमें अब कई प्रकार के रोग लगने लगे हैं। गेहूं की फसल में गेरुआ रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। किसान इनके बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञों से सलाह ले रहे हैं।
गेहूं और चना की फसल तैयार होने के अंतिम पायदान पर पहुंच गई है। गेहूं की फसल में बालियां निकल आई और उनमें दाना बनना शुरू हो गया है। अब सिंचाई के बावजूद भी गेहूं की पौध सूखने जैसी होने लगी है। बालियों के अंदर का दाना सिकुड़ रहा है। वहीं चना की फसल में कीटों के आसार बढ़ गए हैं। जो फली के अंदर दाना को खा रहे हैं और किसान का नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिला कृषि रक्षा अधिकारी सत्येंद्र सिंह बताते हैं कि जो फसलें अभी तैयार नहीं हुई हैं। उनमें बारिश के बाद तेज धूप निकल आए तो कीट व बीमारी लगने की संभावना अधिक हो जाती है। पौधों में फंगस इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है। तापमान, आद्र्रता और पौधों के विकास पर ही कीट या बीमारी का लगना निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि पौधों के नए पत्तों पर भी रोग का असर दिख सकता है।
वयस्क कीट सफेद रंग के होते हैं। ये कीट पौधों की पत्तियों का रस चूस लेते हैं। इससे पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं। ये कीट सभी सब्जियों में लगती है।
गेहूं, चना और मसूर की फसल में फली भेदक कीट घातक होता है। ये कीट फलियों में छेद बनाकर दानों को खाता रहता है। वहीं पीला मोजैक वायरस सफेद रंग की मक्खी से फैलता है। इसमें पत्तियां पीली होकर सूखने लगती है।
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गेरुआ रोग गेहूं की तैयार हो रही फसल पर लगता है। इस रोग में पत्तियों पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं। इससे पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं। इसकी वजह से बालियों के अंदर फल भी प्रभावित होते हैं। संक्रमित फल पीले पड़ जाते हैं। गेहूं में गेरुआ रोग का प्रकोप उसकी बालियों पर पड़ता है। बालियों में दानों का विकास सही से नहीं हो पाता है।
क्यूनॉलॉयस 25 प्रति ईसी या प्रोफेनोफास 50 प्रतिशत ईसी एक लीटर मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करने से फसलों को फायदा होगा। रस चूसने वाले कीटों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए थायोमेक्थोसम या डाइमिथोएट का छिड़काव करें।
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गेहूं और चना की फसल तैयार होने के अंतिम पायदान पर पहुंच गई है। गेहूं की फसल में बालियां निकल आई और उनमें दाना बनना शुरू हो गया है। अब सिंचाई के बावजूद भी गेहूं की पौध सूखने जैसी होने लगी है। बालियों के अंदर का दाना सिकुड़ रहा है। वहीं चना की फसल में कीटों के आसार बढ़ गए हैं। जो फली के अंदर दाना को खा रहे हैं और किसान का नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिला कृषि रक्षा अधिकारी सत्येंद्र सिंह बताते हैं कि जो फसलें अभी तैयार नहीं हुई हैं। उनमें बारिश के बाद तेज धूप निकल आए तो कीट व बीमारी लगने की संभावना अधिक हो जाती है। पौधों में फंगस इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती है। तापमान, आद्र्रता और पौधों के विकास पर ही कीट या बीमारी का लगना निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि पौधों के नए पत्तों पर भी रोग का असर दिख सकता है।
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वयस्क कीट सफेद रंग के होते हैं। ये कीट पौधों की पत्तियों का रस चूस लेते हैं। इससे पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं। ये कीट सभी सब्जियों में लगती है।
गेहूं, चना और मसूर की फसल में फली भेदक कीट घातक होता है। ये कीट फलियों में छेद बनाकर दानों को खाता रहता है। वहीं पीला मोजैक वायरस सफेद रंग की मक्खी से फैलता है। इसमें पत्तियां पीली होकर सूखने लगती है।
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गेरुआ रोग गेहूं की तैयार हो रही फसल पर लगता है। इस रोग में पत्तियों पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं। इससे पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं। इसकी वजह से बालियों के अंदर फल भी प्रभावित होते हैं। संक्रमित फल पीले पड़ जाते हैं। गेहूं में गेरुआ रोग का प्रकोप उसकी बालियों पर पड़ता है। बालियों में दानों का विकास सही से नहीं हो पाता है।
क्यूनॉलॉयस 25 प्रति ईसी या प्रोफेनोफास 50 प्रतिशत ईसी एक लीटर मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करने से फसलों को फायदा होगा। रस चूसने वाले कीटों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए थायोमेक्थोसम या डाइमिथोएट का छिड़काव करें।