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एक्सप्लेनर: रूस ने सबसे पहले भारत के सामने क्यों रखा ब्रिक्स का विचार, कैसे 11 साल बाद गठबंधन हो पाया साकार?
Fri, 11 Sep 2026 10:58 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 11 Sep 2026 10:58 AM IST
सार
12 सितंबर से शुरू हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन के बीच जानिए इसका इतिहास। रूस ने 1998 में भारत के सामने यह विचार क्यों रखा और जिम ओ'नील की थ्योरी कैसे जमीन पर उतरी।
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कैसे बना ब्रिक्स।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की शुरुआत कल (12 सितंबर) से होने जा रही है। इस बार सम्मेलन के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, समेत 20 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि भारत आ रहे हैं। इनमें कई देश ब्रिक्स के स्थायी सदस्य और कई देश ब्रिक्स के साझेदार के तौर पर शामिल हो रहे हैं। ब्रिक्स का लगातार बढ़ता यह दायरा इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि पहली बार जब इस संगठन के बारे में सोचा गया था, तब इसके लिए महज तीन देशों का विचार ही आया था। हालांकि, अगले कुछ वर्षों में इस गठबंधन की अवधारणा चार देशों से होते हुए आज असल स्वरूप में 20 देशों तक पहुंच चुकी है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ब्रिक्स का इतिहास क्या है? पहली बार इसका विचार किसे और कैसे आया? कैसे शुरुआत से ही भारत इस तरह के गठबंधन की अवधारणा में शामिल रहा? वह व्यक्ति कौन हैं, जिन्होंने दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था के तौर पर उभर रहीं अर्थव्यवस्थाओं के ब्रिक्स के तौर पर जुड़ने की अवधारणा दुनिया के सामने रखी? कैसे इस अवधारणा के सामने आने के आठ साल बाद ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्ष पहली बैठक के लिए एक साथ जुट गए? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ब्रिक्स का इतिहास क्या है? पहली बार इसका विचार किसे और कैसे आया? कैसे शुरुआत से ही भारत इस तरह के गठबंधन की अवधारणा में शामिल रहा? वह व्यक्ति कौन हैं, जिन्होंने दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था के तौर पर उभर रहीं अर्थव्यवस्थाओं के ब्रिक्स के तौर पर जुड़ने की अवधारणा दुनिया के सामने रखी? कैसे इस अवधारणा के सामने आने के आठ साल बाद ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्ष पहली बैठक के लिए एक साथ जुट गए? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- कब-किसे आया था ब्रिक्स जैसे गठबंधन का विचार?
1. पहली बार कब आया रणनीतिक विचार?ब्रिक्स के इतिहास और अवधारणा को देखा जाए तो सामने आता है कि इसकी वैचारिक नींव 1996 से 1998 के बीच पड़ी थी। दरअसल, यह वह दौर था, जब सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस संभलने की कोशिश कर रहा था। वहीं, अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के गठबंधन तेजी से उभर रहे थे। खासकर नाटो और जी7, जो कि रक्षा और आर्थिक संबंधों से जुड़े सबसे मजबूत गठबंधन माने जाते रहे।
2. भारत के सामने कब आया ब्रिक्स जैसे गठबंधन का विचार?
इन्हीं स्थितियों के बीच पहली बार रूस को एक ऐसे गठबंधन का ख्याल आया, जो कि पश्चिमी गठबंधनों से मुकाबले के लिए साथ खड़ा हो सकता है। रूसी सरकार का मकसद अमेरिका और पश्चिमी यूरोप पर रूस की जबरदस्त निर्भरता को खत्म करना और वैश्विक मामलों में सत्ता के केंद्रों में विविधता लाना था।
ब्रिक्स के संस्थापक देश।
- फोटो : अमर उजाला
बताया जाता है कि रूस के विदेश मंत्रालय ने पहली बार 1996 में इसकी अवधारणा सामने रखी थी। इसके बाद 1998 में ऐसे गठबंधन पर विचार करने और इसे असल स्वरूप देने के लिए रूस के विदेश मंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने जिम्मेदारी संभाली और 1998 में अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान सबसे पहले भारत के सामने ही ब्रिक्स जैसे गठबंधन का विचार सामने रखा। हालांकि, तब उनकी योजना में सिर्फ रूस, भारत और चीन ही थे। यानी प्रिमाकोव एक रणनीतिक यूरेशियाई त्रिकोण पर ज्यादा केंद्रित रहे।
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अब जानें- आर्थिक गठबंधन के तौर पर कैसे रखी गई ब्रिक्स की अवधारणा?
ब्रिक्स की एक आर्थिक गठबंधन के तौर पर साथ आने का विचार अमेरिका के सबसे बड़े बैंकों में से एक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने अपने शोध पत्र में गढ़ा था। तब उन्होंने ब्रिक (BRIC) का विचार रखा था, जिसमें- ब्राजील, रूस, भारत, चीन को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताया गया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध पेपर- बिल्डिंग बेटर ग्लोबल इकोनॉमिक ब्रिक्स (Building Better Global Economic BRICs) में तर्क दिया कि ये चार उभरती अर्थव्यवस्थाएं 2050 तक वैश्विक जीडीपी और विकास का मुख्य केंद्र बन जाएंगी और पश्चिमी जी7 देशों के आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देंगी।कैसे जमीन पर उतरा कूटनीतिक-आर्थिक गठबंधन बनाने का विचार?
2001 में जिम ओ'नील की ओर से निवेश के संदर्भ में ब्रिक शब्द गढ़े जाने के बाद रूस ने इस आर्थिक अवधारणा को एक राजनीतिक और कूटनीतिक मंच में जमीन पर उतारने का मौका देखा। इसके लिए बकायदा रूस की तरफ से राजनयिक स्तर पर कोशिशें शुरू की गईं और शुरुआत में अवधारणा वाले चार देशों के ही साथ आने की कवायद शुरू की गई। रूस के साथ भारत, चीन और ब्राजील ने अपनी बड़ी आबादी और बढ़ते सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को देखते हुए इस अवधारणा को एक वास्तविक आर्थिक सहयोग मंच में बदलना शुरू कर दिया।पहला कदम: विदेश मंत्रियों की पहल
सितंबर 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के इतर न्यूयॉर्क में चारों संस्थापक देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन के विदेश मंत्रियों की पहली अनौपचारिक बैठक हुई, जिसने कूटनीतिक सहयोग की नींव रख गई।
ब्रिक्स का मकसद।
- फोटो : अमर उजाला/AI
दूसरा कदम: कूटनीतिक सम्मेलन का आयोजन
मई 2008 में रूस के येकातेरिनबर्ग में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक स्वतंत्र बैठक आयोजित की गई।
तीसरा कदम: आर्थिक गठबंधन बनाने पर जोर
नवंबर 2008 में ब्राजील के साओ पाउलो में चारों देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक हुई, जहां वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने, वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में सुधारों के लिए संयुक्त रणनीति बनाई गई।
चौथा कदम: और फिर चार देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक मंच पर आए
16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में ब्रिक का पहला औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष स्तर का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें ब्राजील के लूला डा सिल्वा, रूस के दिमित्री मेदवेदेव, भारत के डॉ. मनमोहन सिंह और चीन के हु जिंताओ ने हिस्सा लिया। इसमें वैश्विक आर्थिक सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के ढाचांगत बदलावों पर सहमति बनी।
मई 2008 में रूस के येकातेरिनबर्ग में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक स्वतंत्र बैठक आयोजित की गई।
तीसरा कदम: आर्थिक गठबंधन बनाने पर जोर
नवंबर 2008 में ब्राजील के साओ पाउलो में चारों देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक हुई, जहां वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने, वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में सुधारों के लिए संयुक्त रणनीति बनाई गई।
चौथा कदम: और फिर चार देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक मंच पर आए
16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में ब्रिक का पहला औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष स्तर का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें ब्राजील के लूला डा सिल्वा, रूस के दिमित्री मेदवेदेव, भारत के डॉ. मनमोहन सिंह और चीन के हु जिंताओ ने हिस्सा लिया। इसमें वैश्विक आर्थिक सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के ढाचांगत बदलावों पर सहमति बनी।
पांचवां कदम: ब्रिक बना ब्रिक्स
पहली औपचारिक बैठक में ही इस गठबंधन में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने पर विचार किया गया। आखिरकार 2010 में दक्षिण अफ्रीका को भी इसमें जोड़ लिया गया और इस तरह ब्रिक एक साल बाद ही ब्रिक्स बन गया। इस गठबंधन ने गैर-पश्चिमी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया।
पहली औपचारिक बैठक में ही इस गठबंधन में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने पर विचार किया गया। आखिरकार 2010 में दक्षिण अफ्रीका को भी इसमें जोड़ लिया गया और इस तरह ब्रिक एक साल बाद ही ब्रिक्स बन गया। इस गठबंधन ने गैर-पश्चिमी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया।
कौन हैं जिम ओ'नील ने जिन्होंने ब्रिक्स आर्थिक गठबंधन का रखा था विचार?
- जिम ओ'नील मूलतः ब्रिटिश मूल के अर्थशास्त्री हैं। वे मौजूदा समय में ब्रिटेन के संसद के उच्च सदन- हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य (लाइफ पीयर) हैं।
- वे अंतरराष्ट्रीय वित्त, वैश्विक अर्थशास्त्र और निवेश रणनीतियों के क्षेत्र में अपने शोध के लिए विश्वभर में जाने जाते हैं।
- वे 1997 में गोल्डमैन सैक्स से जुड़े और 2001 में वैश्विक आर्थिक अनुसंधान के प्रमुख बने। इससे पहले वे 1995 से 2000 तक कंपनी के संयुक्त अनुसंधान प्रमुख रहे थे।
ब्रिक्स की अवधारणा रखने वाले जिम ओ'नील।
- फोटो : अमर उजाला
- 2010 से 2013 तक उन्होंने गोल्डमैन सैक्स एसेट मैनेजमेंट डिवीजन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने 800 अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति का प्रबंधन किया।
- बाद में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के नेतृत्व वाली सरकार में उन्होंने वित्त मंत्रालय के वाणिज्यिक सचिव (2015–2016) के तौर पर कार्य किया।
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क्या हैं जिम के आज के ब्रिक्स पर विचार?
- ओ'नील के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में भारत और चीन ने उनके द्वारा लगाए गए मूल आर्थिक विकास के अनुमानों से भी बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, वे भारत-चीन के साथ आने को ब्रिक्स के भविष्य के लिए अहम मानते हैं।
- वे मानते हैं कि रूस और ब्राजील का आर्थिक प्रदर्शन उनके अनुमानों की तुलना में काफी कमजोर और निराशाजनक रहा है और ब्रिक्स की आर्थिक ताकत अब मुख्य रूप से चीन और भारत पर ही केंद्रित है।
- ओ'नील ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि ब्रिक्स को खुद को पश्चिम-विरोधी ब्लॉक बनाने से बचना चाहिए, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी वैश्विक समस्याओं को सुलझाने के लिए ब्रिक्स और पश्चिमी देशों दोनों का मिलकर काम करना जरूरी है।