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Farrukhabad News: 22 साल पुराने जानलेवा हमले के मुकदमे में दो बरी, वादी पर कार्रवाई के आदेश
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फर्रुखाबाद। शमसाबाद के ललौर राजपूताना गांव में वर्ष 2004 के जानलेवा हमले के 22 साल पुराने मामले में अदालत ने दो आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। अपर सत्र न्यायाधीश अभिनितम उपाध्याय ने राजेंद्र सिंह उर्फ दुंदी और धर्मेंद्र सिंह उर्फ मुन्ना को बरी किया। इसके साथ ही, न्यायाधीश ने वादी राजकुमार सिंह के खिलाफ कथित मिथ्या साक्ष्य देने के आरोप में कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
यह मामला 21 जून 2004 को राजकुमार सिंह की तहरीर पर शमसाबाद थाने में दर्ज हुआ था। प्राथमिकी में राजेंद्र सिंह, धर्मेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह और लल्ला सिंह पर जानलेवा हमले का आरोप था। विवाद राजकुमार सिंह के बड़े भाई रघुराज सिंह के मकान निर्माण के दौरान धक्का लगने से शुरू हुआ था। फायरिंग में धर्मेंद्र उर्फ पंकज, शिमला देवी, रेनू और आरती घायल हुए थे। घायलों की मेडिकल जांच और एक्सरे रिपोर्ट भी अदालत में पेश की गईं। मुकदमे के दौरान लल्ला सिंह और नरेंद्र सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त हो गई।
गवाहों के विरोधाभासी बयान
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि वादी राजकुमार सिंह ने मुख्य बयान में चारों आरोपियों को घटना में शामिल बताया था। वहीं, जिरह के दौरान उन्होंने कहा कि राजेंद्र और धर्मेंद्र ने न तो फायरिंग की और न गाली-गलौज की। वहीं, शिमला देवी, आरती, रेनू देवी और पंकज सिंह उर्फ धर्मेंद्र ने घटना की पुष्टि तो की, लेकिन किसी आरोपी को फायरिंग करते देखने से इन्कार किया। अभियोजन के समर्थन में गवाही न देने पर इन्हें पक्षद्रोही घोषित किया गया।
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विवेचना में कमियां
अदालत ने विवेचना में भी कई कमियां पाईं। किसी भी आरोपी से कोई हथियार बरामद नहीं किया गया था। लाइसेंसी बंदूक की बरामदगी या लाइसेंस निरस्तीकरण का भी कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। इन परिस्थितियों के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
वादी पर मिथ्या साक्ष्य का आरोप
न्यायालय ने वादी राजकुमार सिंह के खिलाफ मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध का संज्ञान लिया है। अदालत ने इस संबंध में प्रकीर्णवाद दर्ज करने का आदेश दिया। राजकुमार सिंह को नोटिस जारी कर पूछा जाएगा कि न्यायालय में कथित मिथ्या साक्ष्य देने के लिए उन्हें क्यों न दंडित किया जाए।
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यह मामला 21 जून 2004 को राजकुमार सिंह की तहरीर पर शमसाबाद थाने में दर्ज हुआ था। प्राथमिकी में राजेंद्र सिंह, धर्मेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह और लल्ला सिंह पर जानलेवा हमले का आरोप था। विवाद राजकुमार सिंह के बड़े भाई रघुराज सिंह के मकान निर्माण के दौरान धक्का लगने से शुरू हुआ था। फायरिंग में धर्मेंद्र उर्फ पंकज, शिमला देवी, रेनू और आरती घायल हुए थे। घायलों की मेडिकल जांच और एक्सरे रिपोर्ट भी अदालत में पेश की गईं। मुकदमे के दौरान लल्ला सिंह और नरेंद्र सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त हो गई।
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गवाहों के विरोधाभासी बयान
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि वादी राजकुमार सिंह ने मुख्य बयान में चारों आरोपियों को घटना में शामिल बताया था। वहीं, जिरह के दौरान उन्होंने कहा कि राजेंद्र और धर्मेंद्र ने न तो फायरिंग की और न गाली-गलौज की। वहीं, शिमला देवी, आरती, रेनू देवी और पंकज सिंह उर्फ धर्मेंद्र ने घटना की पुष्टि तो की, लेकिन किसी आरोपी को फायरिंग करते देखने से इन्कार किया। अभियोजन के समर्थन में गवाही न देने पर इन्हें पक्षद्रोही घोषित किया गया।
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विवेचना में कमियां
अदालत ने विवेचना में भी कई कमियां पाईं। किसी भी आरोपी से कोई हथियार बरामद नहीं किया गया था। लाइसेंसी बंदूक की बरामदगी या लाइसेंस निरस्तीकरण का भी कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। इन परिस्थितियों के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
वादी पर मिथ्या साक्ष्य का आरोप
न्यायालय ने वादी राजकुमार सिंह के खिलाफ मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध का संज्ञान लिया है। अदालत ने इस संबंध में प्रकीर्णवाद दर्ज करने का आदेश दिया। राजकुमार सिंह को नोटिस जारी कर पूछा जाएगा कि न्यायालय में कथित मिथ्या साक्ष्य देने के लिए उन्हें क्यों न दंडित किया जाए।