{"_id":"5ebd70d58ebc3e90ab20b505","slug":"people-came-from-gujarat-do-not-get-food-farrukhabad-news-knp560137848","type":"story","status":"publish","title_hn":"दुश्वारियां: न खाने को रोटी और न रहने को छत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दुश्वारियां: न खाने को रोटी और न रहने को छत
विज्ञापन
फर्रुखाबाद रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन। संवाद
- फोटो : FARRUKHABAD
फर्रुखाबाद में गुजरात के बड़ोदरा से आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन स्थानीय रेलवे स्टेशन पर 15 मिनट रुककर कन्नौज रवाना हो गई। ट्रेन में फर्रुखाबाद के 788 समेत देवरिया, कन्नौज और गोरखपुर के कुल 1517 यात्री सवार थे। सुबह 7.20 बजे प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंची ट्रेन से किसी को उतरने की अनुमति नहीं दी गई।
एहतियातन सिटी मजिस्ट्रेट अशोक मौर्य, सीओ सिटी मन्नीलाल गौंड, शहर कोतवाल वेदप्रकाश पांडेय, स्टेशन अधीक्षक योगेंद्र शाक्य, आरपीएफ, जीआरपी इंस्पेक्टर भारी पुलिस बल समेत ट्रेन आने से पहले मुस्तैद हो गया।
ट्रेन के स्टेशन पर रुकने के दौरान यात्रियों ने अपना दर्द बयां किया। कहा यदि रोटी और छत का जुगाड़ होता तो वे नहीं लौटते। अपने घर नमक-रोटी खाकर भी अच्छी नींद आएगी। देवरिया के रमेेश ने बताया कि वे बड़ोदरा में जींस कपड़ा बनाने की फैक्टरी में काम करते थे। सोचा था कि कुछ पैसे कमाकर घर भेजेंगे, मगर वहां खुद के रोटी के लाले पड़ गए। किराए की खातिर मकान मालिक रोज लड़ने को तैयार रहता। अब कुछ सुकून मिला है।
विज्ञापन
गोरखपुर के प्रेमराज कहते हैं, वे बड़ोदरा से 20 किमी दूर एक फैक्टरी में कई सालों से काम कर रहे थे। होली के बाद दोबारा कमाने पहुंचे तो लॉकडाउन हो गया। रोटी के लाले पड़ गए। गोरखपुर के हद्दपुर के पप्पू की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। घर में काम नहीं, तो नमक-रोटी मिल जाएगी। बड़े शहर में कुछ नहीं मिला। छोटे से कमरे में पांच लोग रहते थे। छिबरामऊ के हरिश्चंद्र कहते हैं रास्ते में कोई दिक्कत नहीं हुई। अब घर पहुंच जाऊंगा।
विज्ञापन
एहतियातन सिटी मजिस्ट्रेट अशोक मौर्य, सीओ सिटी मन्नीलाल गौंड, शहर कोतवाल वेदप्रकाश पांडेय, स्टेशन अधीक्षक योगेंद्र शाक्य, आरपीएफ, जीआरपी इंस्पेक्टर भारी पुलिस बल समेत ट्रेन आने से पहले मुस्तैद हो गया।
विज्ञापन
ट्रेन के स्टेशन पर रुकने के दौरान यात्रियों ने अपना दर्द बयां किया। कहा यदि रोटी और छत का जुगाड़ होता तो वे नहीं लौटते। अपने घर नमक-रोटी खाकर भी अच्छी नींद आएगी। देवरिया के रमेेश ने बताया कि वे बड़ोदरा में जींस कपड़ा बनाने की फैक्टरी में काम करते थे। सोचा था कि कुछ पैसे कमाकर घर भेजेंगे, मगर वहां खुद के रोटी के लाले पड़ गए। किराए की खातिर मकान मालिक रोज लड़ने को तैयार रहता। अब कुछ सुकून मिला है।
विज्ञापन
गोरखपुर के प्रेमराज कहते हैं, वे बड़ोदरा से 20 किमी दूर एक फैक्टरी में कई सालों से काम कर रहे थे। होली के बाद दोबारा कमाने पहुंचे तो लॉकडाउन हो गया। रोटी के लाले पड़ गए। गोरखपुर के हद्दपुर के पप्पू की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। घर में काम नहीं, तो नमक-रोटी मिल जाएगी। बड़े शहर में कुछ नहीं मिला। छोटे से कमरे में पांच लोग रहते थे। छिबरामऊ के हरिश्चंद्र कहते हैं रास्ते में कोई दिक्कत नहीं हुई। अब घर पहुंच जाऊंगा।