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तीस हजार ने किसानी से की तौबा

Sun, 29 Mar 2015 11:50 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा Updated Sun, 29 Mar 2015 11:50 PM IST
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Thirty thousand ambitions of the harvest

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इससे फायदा तो दूर फसल की लागत तक नहीं निकल पाती, नतीजतन किसान कर्ज के बोझ में दब जाता है। यही कारण कारण है कि किसानों का खेती से मोहभंग होता जा रहा है।

ढाई दशक में जिले के तीस हजार किसानों ने खेती किसानी से तौबा कर ली। ये अपना गुजारा करने के लिए दूसरे काम में लग गए। तमाम लोग तो रोजी रोटी की तलाश में परदेस चले गए।

 देश भले ही कृषि प्रधान कहा जाए लेकिन यह प्रधानता धीरे-धीरे कम हो रही है। किसानों की घटती संख्या चिंता का विषय बन गई है। किसान खेती छोड़ परिवार के भरण पोषण के लिए अन्य उपाय खोज रहे हैं। सांख्यकी विभाग के आंकड़े इस बात का गवाह हैं।

वर्ष 1991 से गौर करें तो जिले में किसानों की संख्या एक लाख 76 हजार 179 थी। एक दशक बाद वर्ष 2001 में जब जनगणना हुई तो जिले में किसानों की संख्या घटकर एक लाख 50 हजार 478 रह गई। पिछली जनगणना यानी वर्ष 2011 में यह संख्या और नीचे आ गई। जिले में एक लाख 46 हजार 309 किसान ही रह गए।


जानकारों का कहना है कि खेती किसानी करना अब सरल नहीं है। हाड़तोड़ मेहनत और पूरी तरह से मौसम पर निर्भरता रहती है। समय पर बारिश न हो या फिर बेमौसम बारिश हो जाए, दोनों ही सूरतों में किसानों को न सिर्फ अपनी पूंजी गंवानी पड़ती है, बल्कि फाके के दिन शुरू हो जाते हैं।

हर कोई अपना रहन सहन बेहतर बनाना चाहता है। किसान भी लगातार ऐसा ही कर रहे हैं। खुद किसान भी मानते हैं कि सरकारों ने भी अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। किसान प्रेमचंद्र मूल रूप से महेवा ब्लाक के ग्राम मनियामऊ के हैं। उनका परिवार अब इटावा शहर में रह रहा है। अपना मकान बनवा लिया है। यह बात दीगर है कि वे अभी भी खेती से जुड़े हैं।

वे बताते हैं कि किसान की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। लिहाजा नई पीढ़ी खेती से जुड़ना नहीं चाहती।  किसानों की राय में जब तक ग्रामीण क्षेत्र का विकास शहरी तर्ज पर नहीं होगा। बुनियादी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी नहीं होगी। बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में शहर और गांव के बीच का भेद खत्म नहीं होगा। तब तक शहरी पलायन को रोकना संभव नहीं है। \
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