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तीन गांव की सड़क बनेगी मुद्दा
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चकरनगर। बीहड़ क्षेत्र के नदियों किनारे बसे कांयछी, तिलियन खोड़न और नदा गांव आजादी के 75 साल पूरे होने के बाद भी एक रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।
इन सालों में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें सत्ता में आईं और चली गई। किसी भी सरकार ने सड़क बनवाने के लिए जोर नहीं लगाया। विधानसभा चुनाव में क्षेत्र के लिए यह अहम मुद्दा है।
17वीं विधानसभा की गठन के लिए प्रदेश में चुनाव का आगाज हो चुका है। बीहड़ के गांवों में आज भी रास्ते न होने के सवाल जनप्रतिनिधियों के लिए यक्ष प्रश्न बने हुए हैं।
रास्ता न होने के कारण आधे से अधिक गांव के लोग परिवार सहित समीपवर्ती गांवों में बस गए। गांव में अब वही लोग हैं जो खेतीबाड़ी से जुड़े हैं। गांव वाले पगडंडी से होकर दो किलोमीटर का बीहड़ी रास्ता तय करने को मजबूर है।
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यमुना नदी की बाढ़ में सदियों से गांव वाले महीनों तक पानी से घिरे रहते हैं। जरा सी बरसात होने के बाद गांव का बीहड़ी रास्ता दलदल के कारण मुसीबत बन जाता है।
गांव में बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने के लिए आज भी ग्रामीणों को दो से तीन किमी बीहड़ी कंदराओं से पैदल होकर साइकिल अथवा चारपाई से मुख्य मार्ग तक आना होता है।
तमाम जद्दोजहद होने के बावजूद भी आज भी गांव का रास्ता नहीं है। चंबल नदी के किनारे नदा गांव का रास्ता नदी का जलस्तर बढ़ने पर बंद हो जाता है। गांव वालों को 10 किलोमीटर का चक्कर देकर हनुमंतपुरा चौराहा होते हुए आना पड़ता है।
वर्ष 2004 में रास्ते के निर्माण के लिए स्वीकृति भी मिली, काम शुरू हुआ। इसके तत्काल बाद सेंचुअरी की वजह से काम आज तक बंद पड़ा हुआ है। तिलियन खोड़न गांव का रास्ता थोड़ी सी बरसात होने पर दलदल में तब्दील हो जाता है।
गांव में आने जाने के लिए महज कच्ची पगडंडी ही साधन है। भोले-भाले ग्रामीणों से जनप्रतिनिधि वर्षों से रास्ता बनवाने का आश्वासन देकर अपने पक्ष में मतदान करवाते आ रहे हैं।
ग्रामीण नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। प्रदेश और केंद्र में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही। सपा और बसपा की सरकारें बनीं। वर्तमान में केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार है।
फिर भी सेंचुअरी विभाग से इन गांव के रास्ते बनाने के लिए अनुमति नहीं मिली है। वीर सिंह यादव का कहना है कि धीरे-धीरे आज गांव वीरान हो चला है। आवागमन का साधन नहीं है।
आशुतोष तिवारी ने कहा कि चुनाव के समय गोलमोल बातें करके वोट हासिल कर लेते हैं। फिर लंबे समय के लिए वादों को भूल जाते हैं। भूरे सिंह चौहान का कहना है कि सत्ता में बैठे लोग कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।
सत्यवीर दिवाकर का कहना है कि केंद्र व प्रदेश दोनों में भाजपा की सरकार सत्तासीन है, इसके बावजूद रास्ता नहीं मिल पाया।
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इन सालों में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें सत्ता में आईं और चली गई। किसी भी सरकार ने सड़क बनवाने के लिए जोर नहीं लगाया। विधानसभा चुनाव में क्षेत्र के लिए यह अहम मुद्दा है।
17वीं विधानसभा की गठन के लिए प्रदेश में चुनाव का आगाज हो चुका है। बीहड़ के गांवों में आज भी रास्ते न होने के सवाल जनप्रतिनिधियों के लिए यक्ष प्रश्न बने हुए हैं।
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रास्ता न होने के कारण आधे से अधिक गांव के लोग परिवार सहित समीपवर्ती गांवों में बस गए। गांव में अब वही लोग हैं जो खेतीबाड़ी से जुड़े हैं। गांव वाले पगडंडी से होकर दो किलोमीटर का बीहड़ी रास्ता तय करने को मजबूर है।
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यमुना नदी की बाढ़ में सदियों से गांव वाले महीनों तक पानी से घिरे रहते हैं। जरा सी बरसात होने के बाद गांव का बीहड़ी रास्ता दलदल के कारण मुसीबत बन जाता है।
गांव में बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने के लिए आज भी ग्रामीणों को दो से तीन किमी बीहड़ी कंदराओं से पैदल होकर साइकिल अथवा चारपाई से मुख्य मार्ग तक आना होता है।
तमाम जद्दोजहद होने के बावजूद भी आज भी गांव का रास्ता नहीं है। चंबल नदी के किनारे नदा गांव का रास्ता नदी का जलस्तर बढ़ने पर बंद हो जाता है। गांव वालों को 10 किलोमीटर का चक्कर देकर हनुमंतपुरा चौराहा होते हुए आना पड़ता है।
वर्ष 2004 में रास्ते के निर्माण के लिए स्वीकृति भी मिली, काम शुरू हुआ। इसके तत्काल बाद सेंचुअरी की वजह से काम आज तक बंद पड़ा हुआ है। तिलियन खोड़न गांव का रास्ता थोड़ी सी बरसात होने पर दलदल में तब्दील हो जाता है।
गांव में आने जाने के लिए महज कच्ची पगडंडी ही साधन है। भोले-भाले ग्रामीणों से जनप्रतिनिधि वर्षों से रास्ता बनवाने का आश्वासन देकर अपने पक्ष में मतदान करवाते आ रहे हैं।
ग्रामीण नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। प्रदेश और केंद्र में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही। सपा और बसपा की सरकारें बनीं। वर्तमान में केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार है।
फिर भी सेंचुअरी विभाग से इन गांव के रास्ते बनाने के लिए अनुमति नहीं मिली है। वीर सिंह यादव का कहना है कि धीरे-धीरे आज गांव वीरान हो चला है। आवागमन का साधन नहीं है।
आशुतोष तिवारी ने कहा कि चुनाव के समय गोलमोल बातें करके वोट हासिल कर लेते हैं। फिर लंबे समय के लिए वादों को भूल जाते हैं। भूरे सिंह चौहान का कहना है कि सत्ता में बैठे लोग कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।
सत्यवीर दिवाकर का कहना है कि केंद्र व प्रदेश दोनों में भाजपा की सरकार सत्तासीन है, इसके बावजूद रास्ता नहीं मिल पाया।