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Etah News: विदेश में भी धाक जमा रही मारहरा की कारचोबी कला

Sun, 19 May 2024 01:09 AM IST
आगरा ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा Updated Sun, 19 May 2024 01:09 AM IST
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Marhara's handicraft art is gaining popularity even abroad
एटा। मारहरा जैसे छोटे कस्बे के घरों में चूल्हा-चौके की जद से महिलाएं बाहर निकल रही हैं। उनका हुनर देश के बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक धाक जमा रहा है। उनके द्वारा किए गए कारचोबी (जरी आर्ट) के काम पर दिल्ली, सिकंदराबाद, नोएडा के कारोबारी फिदा हैं। ऐसे पेशे को कस्बे की करीब 600 महिलाएं आय का जरिया बनाकर आत्मनिर्भर बनने की राह पर हैं।
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दरअसल, रेशमी धागों और छोटे-छोटे मोती आदि से कढ़ाई के माध्यम से कपड़े पर डिजाइन बनाने का काम कारचोबी (जरी आर्ट) कहलाता है। कपड़े के बैग, सूट, बैडशीट आदि की शान बढ़ाने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। मारहरा छोटा कस्बा है। जहां महिलाओं के लिए रोजगार का कोई साधन नहीं है। ऐसे में यह काम यहां की महिलाओं के लिए वरदान कहा जा सकता है।
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यही वजह है कि कुछ साल पहले तक 20-25 महिलाओं द्वारा किया जाने वाला यह काम अब घर-घर में अपनी पहुंच बना चुका है। करीब 600 महिलाएं इससे जुड़ गई हैं। इससे वह आत्मनिर्भर बन रही हैं और घर की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। यहां से तैयार माल को वापस दिल्ली, सिकंदरा, नोएडा आदि पहुंचा दिया जाता है। जिसे विभिन्न कारखानों में भेजकर उत्पाद तैयार किए जाते हैं और उनकी सप्लाई विदेशों तक होती है। संवाद
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एक पीस के मिलते हैं 150 से 200 रुपये
जरी आर्ट का यह काम पीस के हिसाब से होता है। ठेकेदार नोएडा, सिकंदराबाद, दिल्ली से कच्चा माल लाकर इन्हें देते हैं। इसे तैयार करने के लिए प्रति पीस 150 से 200 रुपये तय होता है। एक महिला दिन में एक से लेकर दो पीस दिन भर में तैयार कर लेती है। बाद में ठेकेदार तैयार माल को वापस उन्हीं स्थानों पर पहुंचा देते हैं।



काम-धंधे के मामले में पूरी तरह पिछड़े हुए इस कस्बे में कारचोबी का काम हम महिलाओं के लिए वरदान की तरह है। इससे हम अपने परिवार को मजबूत बनने में योगदान दे रहे हैं। - अंजू देवी



आज के दौर में केवल एक व्यक्ति की कमाई से घर अच्छी तरह चल पाना संभव नहीं होता है। यह अच्छी बात है कि जरी आर्ट के जरिए हमें घर बैठकर ही पैसे कमाने का मौका मिल रहा है। - शोभा शर्मा
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