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देश की रक्षा में जान गवाने वाले शहीदों को भूला प्रशासन
अमर उजाला ब्यूरो एटा
Updated Mon, 25 Jan 2016 10:50 PM IST
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जैथरा ब्लॉक के नगला मोहन निवासी शस्त्र सीमा बल के जवान अनिल यादव 6 दिसंबर 2013 को असम में आतंकवादियों से लोहा लेते वक्त शहीद हो गए थे। लेकिन देश की रक्षा के लिए जान गवाने वाले शहीद के परिवार को केंद्र, प्रदेश सरकार से कोई मदद नहीं मिली। पत्नी नीता यादव का कहना है कि वो कई बार डीएम, एसडीएम, विधायक से मिलीं, लेकिन किसी ने गुहार नहीं सुनी। शहीद की दोनों बेटियां सेना में जाने का सपना देख रही हैं।
नीता मैनपुरी मे रहकर अपनी बेटी का इलाज कराते हुए उन्हें बेहतर शिक्षा दिला रही हैं। नीता ने बताया कि विगत 13 दिसंबर, 2013 को जब उनके पति का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो प्रशासन ने 15 बीघा भूमि का पट्टा, धुमरी में रहने के लिए प्लॉट, फ्री बिजली, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और केंद्र सरकार ने प्लॉट या रसोई गैस एजेंसी दिलाने का आश्वासन दिया था। लेकिन ये मांग पूरी करना तो दूर पति की प्रतिमा का गांव में अनावरण तक नहीं हुआ। पट्टा, प्लॉट और बच्चो की शिक्षा के लिए कई बार डीएम, एसडीएम और विधायक से मिलीं। भाई छोटे यादव ने बताया कि वो सीएम, विधायक रामेश्वर यादव से मिल चुके हैं। मुख्यमंत्री ने विधायक से बात करने को कहा, लेकिन उन्हें पार्टी से नहीं जुड़ने का ताना देकर टरका दिया। छोटे सिंह का दावा है कि इसके चलते प्रशासन ने 15 बीघा भूमि का पट्टा, धुमरी में प्लॉट, बच्चोें की शिक्षा के लिए कुछ नहीं किया।
आतंकियों ने हत्या कर दफनाया था शव
नीता यादव ने बताया कि छह दिसंबर, 2013 को असम प्रांत के चिरांग जिले में उनके पति पर दोस्त को छोड़ने जाते वक्त आतंकियों ने हमला किया था और विरोध करने पर हत्या कर शव बर्फ में दफना दिया था, लेकिन सुरक्षा बलों ने 12 दिसंबर को पार्थिव शरीर बर्फ के नीचे से ढूंढ़ निकाला था।
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शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने की राह तक रहे पिता
एटा। गांव घिलौआ निवासी शहीद पुष्पेंद्र यादव मात्र 22 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती होकर देश की सेवा में लग गया था। कारगिल युद्ध के दौरान वो जम्मू कश्मीर में तैनात था, लेकिन 30 अगस्त 1999 को पुष्पेंद्र यादव पाक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा पर शहीद हो गए थे। 17 साल बाद भी प्रशासन और स्थानीय लोग शहीद पुष्पेंद्र की गांव मे प्रतिमा नहीं लगा पाए, यही नहीं उनकी चौखट तक पहुंचने वाले रास्ते का निर्माण नहीं हुआ। पुष्पेंद्र की मां का देहांत हो चुका है, लेकिन पिता शोभाराम यादव शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने और रास्ता बनवाने को लेकर प्रशासन की राह ताक रहे हैं।
परिवार के लोगों ने ही लगवाई प्रतिमा
गांव छोटी जरारी निवासी वीर सपूत उमेश यादव के लिए शासन-प्रशासन के पास समय नहीं है। जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते करते शहीद हो गए। जिला प्रशासन और विभाग से मदद नहीं मिलने पर शहीद के परिवारीजनों ने ही उमेश यादव की प्रतिमा लगवाई। उमेश की शहादत के बाद उसके नाम से कोई सड़क बनी और न ही प्रशासन ने कोई सुविधा दी।
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नीता मैनपुरी मे रहकर अपनी बेटी का इलाज कराते हुए उन्हें बेहतर शिक्षा दिला रही हैं। नीता ने बताया कि विगत 13 दिसंबर, 2013 को जब उनके पति का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो प्रशासन ने 15 बीघा भूमि का पट्टा, धुमरी में रहने के लिए प्लॉट, फ्री बिजली, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और केंद्र सरकार ने प्लॉट या रसोई गैस एजेंसी दिलाने का आश्वासन दिया था। लेकिन ये मांग पूरी करना तो दूर पति की प्रतिमा का गांव में अनावरण तक नहीं हुआ। पट्टा, प्लॉट और बच्चो की शिक्षा के लिए कई बार डीएम, एसडीएम और विधायक से मिलीं। भाई छोटे यादव ने बताया कि वो सीएम, विधायक रामेश्वर यादव से मिल चुके हैं। मुख्यमंत्री ने विधायक से बात करने को कहा, लेकिन उन्हें पार्टी से नहीं जुड़ने का ताना देकर टरका दिया। छोटे सिंह का दावा है कि इसके चलते प्रशासन ने 15 बीघा भूमि का पट्टा, धुमरी में प्लॉट, बच्चोें की शिक्षा के लिए कुछ नहीं किया।
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आतंकियों ने हत्या कर दफनाया था शव
नीता यादव ने बताया कि छह दिसंबर, 2013 को असम प्रांत के चिरांग जिले में उनके पति पर दोस्त को छोड़ने जाते वक्त आतंकियों ने हमला किया था और विरोध करने पर हत्या कर शव बर्फ में दफना दिया था, लेकिन सुरक्षा बलों ने 12 दिसंबर को पार्थिव शरीर बर्फ के नीचे से ढूंढ़ निकाला था।
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शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने की राह तक रहे पिता
एटा। गांव घिलौआ निवासी शहीद पुष्पेंद्र यादव मात्र 22 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती होकर देश की सेवा में लग गया था। कारगिल युद्ध के दौरान वो जम्मू कश्मीर में तैनात था, लेकिन 30 अगस्त 1999 को पुष्पेंद्र यादव पाक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा पर शहीद हो गए थे। 17 साल बाद भी प्रशासन और स्थानीय लोग शहीद पुष्पेंद्र की गांव मे प्रतिमा नहीं लगा पाए, यही नहीं उनकी चौखट तक पहुंचने वाले रास्ते का निर्माण नहीं हुआ। पुष्पेंद्र की मां का देहांत हो चुका है, लेकिन पिता शोभाराम यादव शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने और रास्ता बनवाने को लेकर प्रशासन की राह ताक रहे हैं।
परिवार के लोगों ने ही लगवाई प्रतिमा
गांव छोटी जरारी निवासी वीर सपूत उमेश यादव के लिए शासन-प्रशासन के पास समय नहीं है। जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते करते शहीद हो गए। जिला प्रशासन और विभाग से मदद नहीं मिलने पर शहीद के परिवारीजनों ने ही उमेश यादव की प्रतिमा लगवाई। उमेश की शहादत के बाद उसके नाम से कोई सड़क बनी और न ही प्रशासन ने कोई सुविधा दी।